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कोरोना की तीसरी लहर में संक्रमण की खतरनाक रफ्तार, जानिए लॉकडाउन क्यों बेअसर रहेगा

नयी दिल्ली 15 जनवरी 2022 । भारत में 27 दिसंबर से या फिर बीते 18 दिनों से कोरोना केस हर दिन बढ़ रहे हैं। 27 दिसंबर को 6,780 (मई 2020 के बाद यह सबसे कम संख्या है) मामले दर्ज हुए, जो 13 जनवरी को बढ़कर 1,93,418 हो गए। शुरुआत में औसत मौतें नहीं बढ़ रही थीं, लेकिन केरल को छोड़कर 4 जनवरी से बाकी राज्यों में बढ़ने लगीं। क्या इसका मतलब यह है कि हम संकट की ओर बढ़ रहे हैं, जैसा कि डेल्टा वैरिएंट के कारण दूसरी लहर के दौरान देखा गया था? क्या मौतों को कम करने के लिए लॉकडाउन लगाया जाना चाहिए? एचटी के विश्लेषण से पता चला है कि ऐसे उपाय जरूरी नहीं हो सकते हैं, बल्कि इनसे नुकसान पहुंच सकता है। हम बताते हैं कि ऐसा क्यों है। डेल्टा की तुलना में ओमिक्रॉन से कम मौतें
एक लहर की शुरुआत के लिए मार्कर के तौर पर 14 दिनों के औसत मामलों में दैनिक वृद्धि को देखा जाता है। इस तरह दूसरी लहर केरल के बाहर पिछले साल 12 फरवरी को शुरू हुई और तीसरी लहर 22 दिसंबर को शुरू हुई। 27 दिसंबर से हर दिन रोजोना के कोविड केस में औसत तौर पर बढ़ोतरी हुई है, लेकिन मौतों का सात दिन का औसत लगातार बढ़ता नहीं दिख रहा है। तीसरी लहर में मृत्यु दर बहुत कम
केस फैटिलिटी रेट (CFR) सिर्फ इसलिए कम नहीं है, क्योंकि डेली इंफेक्शन नीचे है। केरल के बाहर औसत मामले पहले से ही डेल्टा लहर के चरम के 52% पर हैं, जबकि औसत मृत्यु अभी भी डेल्टा लहर के शिखर के 3.3% पर है। आने वाले दिनों में ये दोनों प्रतिशत बढ़ने की संभावना है, क्योंकि मौतों में बढ़ोतरी आम तौर पर मामलों से दो सप्ताह के अंतराल पर दिखती है। अगर सीएफआर तुलनात्मक रूप से बहुत कम है, तो कुल मौतें भी काफी कम होंगी, भले ही करंट वेव का पीक डेल्टा वेव से मेल खाता है।

अस्पताल में भर्ती होने वालों की संख्या अधिक नहीं
सलाह देने या सावधानी बरतने का मतलब यह नहीं है कि लोगों को घरों के अंदर बंद कर देना चाहिए और बिजनेस बंद कर दें। ऐसा इसलिए है क्योंकि जहां अस्पताल में भर्ती होना महंगा है, वहीं मौजूदा लहर में बहुत कम लोगों को इसकी जरूरत पड़ी है। सीएफआर से पता चलता है कि हॉस्पिटल में भर्ती होने वालों की संख्या कम रहने की संभावना है। हॉस्पिटलाइजेशन से गरीबों की आर्थिक स्थिति खराब होगी
सरकारें तीसरी लहर में कम मृत्यु की संभावना के बावजूद सावधानी बरतने की सलाह दे रही हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि अस्पताल में भर्ती होने से लोगों पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के अनुसार, निचली 60% आबादी अस्पताल में भर्ती होने (बच्चे के जन्म को छोड़कर) के सबसे महंगे मामलों में करीब 30% का भुगतान उधार लेकर या संपत्ति बेचकर करती है। टॉप की 20% आबादी केवल 15% मामलों में ऐसा करती है।

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