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बाबा महाकाल नगर में होते हुए भी कितनी दूर चले गए

उज्जैन 30 अगस्त 2019 । आराम से दर्शन करने, थोड़ी देर मंदिर में बैठने, शाम को मंदिर प्रांगण में खेलने, ऐसा प्रतीत होता था मानो बाबा महाकाल हमारे कोई खास मित्र हैं, जिनके यहाँ बेरोकटोक कभी भी चले जाओ, अनुभूति होती थी की कुछ तो सत्कर्म किये होंगे जो बाबा महाकाल ने हमे अपने इतने निकट रख रखा है, और ये अनुभूति हो भी क्यो नही, आखिर हम उज्जैन वाले हैं, बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन की प्रजा हैं हम, जिस प्रजा का हाल जानने बाबा महाकाल श्रावण माह में, कार्तिक माह में भ्रमण पर निकलते हैं, हमारे तो दर्शन मात्र से सारे दुख, गीले, शिकवे दूर हो जाते थे, बाबा के मनमोहक दर्शन करते ही एक आवरण में गुम हो जाते थे, लगता था जन्म सफल हो गया।

फिर धीरे धीरे सदी बदलने लगी, 20 वी सदी से हम 21 वी सदी में प्रवेश करने लगे, ऐसा लगा कुछ बदल रहा है, कुछ नया हो रहा है, मन मे खुशी भी थी कुछ नया देखने की, और देखते ही देखते बहुत कुछ बदल गया, जिस प्रकार बाबा महाकाल हमारे साथ थे उन्हें कोई अपहरण करने लगा, हमे मंदिर जाकर बाबा महाकाल के दर्शन करने में अड़चन आने लगी, जिस मंदिर प्रांगण में हम बैठते थे, खेलते थे उस तक हमारी पहुँच कमजोर होने लगी, सुबह 4 बजे से रात 10:30 बजे तक जहाँ हम बेरोकटोक आते जाते थे वहाँ हमे रोका टोका जाने लगा, शुरुआत में तो हमे लगा शायद मंदिर का जीर्णोद्धार हो रहा है, इस लिए रोक टोक हो रही है, फिर धीरे धीरे मंदिर में एक प्रशासनिक कार्यालय खुलने लगा, कार्यालय में अधिकारी बैठने लगे, पुलिस प्रशासन भी मंदिर में बढ़ने लगा, और देखते ही देखते बाबा महाकाल हमारे नगर में होते हुए भी हमसे कितनी दूर चले गए हमे पता ही नही चला, पहले और अब में ज़मीन आसमान का अंतर हो गया, मंदिर के सरल रास्तों को कठिन बना दिया गया, मंदिर के अंदर पहले 2-3 हार फूल, मूर्ति तस्वीरों की दुकान लगती थी, अब मंदिर में प्रशासन की दुकान लगने लगी, पहले मंदिर प्रांगण में श्रद्धा भक्ति का माहौल होता था, अब लगता है किसी प्रशासनिक कार्यालय में आगये, पहले बाबा महाकाल के दर्शन हेतु हर व्यक्ति सामान्य रूप से जाता था, अब दर्शन भी वर्ग के हिसाब से होने लगे।

सामान्य दर्शनार्थी जिनके लिए दर्शन व्यवस्था को इतना कठिन बना दिया गया के बेचारा जाने से पहले डर जाता है, भीड़ न होते हुए भी लंबा घुमावदार रास्ता, बाबा के दर्शन करते ही एक जोरदार धक्का, मंदिर प्रांगण में बैठने पर रोक टोक, हर प्रकार से ऐसा व्यवहार होता है की ये अगली बार मंदिर आये ही नही।
फिर आते हैं 250 रुपये दे कर दर्शन करने वाले, जिनके लिए पैसे लेकर रास्ता थोड़ा छोटा कर दिया जाता है, और मंदिर में टिकट दिखा कर इन्हें थोड़ी आज़ादी मिल जाती है।
फिर आते हैं प्रशासनिक दर्शनार्थी, अब इन लोगों के कब्जे में तो पूरा महाकाल मंदिर है, कभी भी, कही भी, कैसे भी पूरे मंदिर में भ्रमण करने का इन्हें और इनके परिवारजन को पूरा सर्वाधिकार है।
फिर एक और आते हैं वी आई पी जिन्हें देश की जनता नेता, समाजसेवी, देश का भला करने वाले लोग के नाम से जानती है, इन्हें मंदिर के अंदर बाकायदा इज्जत और सम्मान से ले जाया जाता है, प्रशासनिक अधिकारी अपने कर्मचारियों को इनके आगे पीछे लगा देते हैं, वातानुकूलित कमरे में पहले ये बैठ कर चाय की चुस्कियां लेते हैं, तब तक प्रशासनिक अधिकारी बाबा महाकाल के आसपास से आम दर्शनार्थियों की भीड़ को हटा देते हैं, फिर ये बाबा महाकाल के समीप जा कर आराम से बैठ कर दर्शन करते हैं, जैसे बाबा महाकाल के साथ कोई मीटिंग करने आये हो, बाबा महाकाल से कुछ लेन देन की बात करने आये हो, आराम से जब तक मन नही भरता या यूं कहो सौदा नही पटता तब तक बाबा महाकाल के गर्भगृह में ये जमे ही रहते हैं, आम दर्शनार्थी तब तक 40-50 कदम दूर कर दिए जाते हैं, अब उन आम दर्शनार्थियों को बाबा महाकाल के दर्शन हो भी रहे है या नही ये तो वो ही जानते हैं, जब तक ये वी आई पी मंदिर के गर्भगृह में रहते हैं मंदिर का माहौल ऐसा कर दिया जाता है जैसे आपने तो मंदिर जा कर कोई बहुत बड़ा ज़ुर्म कर दिया हो।

अब इन सब बातों से परे मेरे बाबा महाकाल तो ठहरे भोले, अब उनके लिए क्या सामान्य, क्या अधिकारी, क्या प्रशासन, क्या वी आई पी उनके लिए तो सब बराबर है, तो ये बात इन अपहरणकर्ताओं को क्यों समझ मे नही आती है, क्यों ये मंदिर को अपने बाप की जागीर समझते हैं, क्यो ये मंदिर को एक प्रशासनिक कार्यालय बना कर बैठे हैं, अगर बाबा महाकाल किसी मे फर्क नही करते हैं तो इन्हें किसने ये अधिकार दिया की दर्शन व्यवस्था को ये इनके हिसाब से चलाएँगे।

क्षमा करना मित्रों मन में एक मलाल है, आज उज्जैन नगर में पैदा होने के बावजूद, बाबा महाकाल की प्रजा का नागरिक होने के बावजूद कभी कभी सालों में बाबा के दर्शन प्राप्त करने का मौका मिल जाता है, इस लिए ये मलाल आज तुम्हारे सामने रखने की इच्छा रख रहा हूं।

और बाबा महाकाल के मंदिर के बाहर से ही बाबा महाकाल से विनती करता हूं की कृपया इन अपहरणकर्ताओं से खुद को छुड़ाओ और हम जैसे आमजन को भी दर्शन दो, हमारी व्यथा को सुन कर निराकरण करो।

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