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103 विधानसभा सीटें कांग्रेस की मुसीबत

भोपाल 14 अगस्त 2018 । कांग्रेस भले ही मध्य प्रदेश में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है मगर आज भी 103 सीटें उसके लिए मुसीबत बनी हुई हैं। 24 सीटों पर पार्टी को लगातार 25 साल से हार का सामना करना पड़ रहा है। पिछले पांच विधानसभा चुनाव में 25 सीटों पर चार बार और 51 सीटों पर तीन बार कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशियों को हार मिली है। कई सीटों पर पार्टी ने अपने हारे हुए प्रत्याशियों को दोहराया तो कई सीटों पर निर्दलीय या दूसरे क्षेत्रीय दलों से विजयी प्रत्याशियों को मौका देने की नीति भी कांग्रेस की हार के इतिहास को नहीं बदल सकी।

राष्ट्रपति शासन के बाद 1993 से लेकर 2013 तक पांच बार विधानसभा चुनाव हुए हैं। इन चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन लगातार गिरा है। दिग्विजय सरकार जब 1993 में सत्ता में आई थी तब भी 17 जिलों की 24 सीटें ऐसी थीं जिन पर कांग्रेस प्रत्याशियों को हार मिली थी और इन सीटों पर आज तक पार्टी अपनी पकड़ मजबूत नहीं बना सकी है। तब से पांच विधानसभा चुनाव हो चुके हैं लेकिन आज भी कांग्रेस को इन सीटों पर अपने प्रत्याशी की जीत का इंतजार है।

‘शिव’ राज के खिलाफ कांग्रेस शिव की शरण में 

विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस नेता अब प्रचार का शंखनाद करने जा रहे हैं। भाजपा की शिवराज सरकार के खिलाफ चुनावी मैदान में उतरने के पहले कांग्रेस नेता भगवान शिव की शरण में हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ जहां केदारनाथ पहुंचे हैं तो चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भगवान पशुपतिनाथ के मंदिर में मत्था टेका। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह भी हरिद्वार के पारद शिवलिंग की पूजा अर्चना करने पहुंचे।

कमलनाथ (प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष) – कमलनाथ 16 अगस्त से बड़वानी जिले के राजपुर से चुनावी दौरे शुरू करने जा रहे हैं। नाथ राजपुर से जनसभाओं का सिलसिला शुरू करने वाले हैं। इसके पहले वे इन दिनों उत्तराखंड के प्रवास पर हैं। वे केदारनाथ के दर्शन करने गए हैं।

ज्योतिरादित्य सिंधिया (पूर्व केंद्रीय मंत्री व सांसद) – सिंधिया का चुनावी दौरा शुरू हो गया है और वे इन दिनों मालवा क्षेत्र में हैं। उन्होंने चुनावी दौरे के दौरान मंदसौर के पशुपतिनाथ मंदिर और प्राचीन मंदिर ओखा बावजी के दर्शन किए। 15 अगस्त को वे विदिशा व सागर जिले में जनसभाएं लेंगे।

मप्र में कांग्रेस को हल्का नहीं मान रही भाजपा

मध्य प्रदेश में नवंबर-दिसंबर के बीच होने वाले विधानसभा चुनाव में इस बार भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर होने की संभावना है। भाजपा हाईकमान के अध्ययन और विश्लेषण के मुताबिक 2003 से लेकर 2013 तक के चुनाव में हर बार माहौल या प्रतिपक्ष की कमजोरी के कारण मप्र में पार्टी आसानी से जीत गई लेकिन इस बार हाईकमान भी मप्र के चुनाव को चुनौती मानकर चल रहा है।

पार्टी नेताओं की सोच है कि गुजरात में कांग्रेस पिछले 22 सालों से वनवास पर है, पार्टी के पास न मजबूत संगठन बचा है न ही कोई बड़ा नेता फिर भी ऐसे बदतर हालात में कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर देकर 80 सीटें जीत ली। यही कारण है कि गुजरात से सबक लेकर ही भाजपा मप्र में अपनी चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देगी।

सिंधिया, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ताकत झोकेंगे

कांग्रेस मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह को हल्का नहीं मान रही है। चुनाव में करो या मरो की तर्ज पर ये पूरी ताकत झोंक देंगे। पार्टी मान रही है कि ऐसे हालात में भाजपा के लिए गुजरात से कठिन परिस्थितियां मप्र में बन सकती हैं।

भोपाल में ‘बेघर’ हुए दिग्विजय सिंह

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता दिग्विजय सिंह ने भोपाल स्थित अपना सरकारी बंगला खाली कर दिया है. भोपाल के श्यामला हिल्स से रविवार को 3 ट्रक में भरकर सामान शिफ्ट कर दिया गया.

बता दें कि इससे पहले हाइकोर्ट ने सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगले खाली कराने का आदेश दिया था जिसके बाद सरकार ने भी आदेश जारी कर पूर्व मुख्यमंत्रियों के सरकारी बंगले का आवंटन निरस्त कर दिया था. हालांकि बाद में नए आदेश जारी कर पूर्व मुख्यमंत्रियों को उनके बंगले फिर से दे दिए गए और असल खेल भी इसी में हुआ.

पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगला दोबारा अलॉट करते समय शिवराज सरकार ने बीजेपी के पूर्व मुख्यमंत्रियों का ध्यान तो रखा लेकिन कांग्रेस सरकार में सीएम रहे दिग्विजय सिंह को किनारे कर दिया.

पिछले महीने जब शिवराज सरकार ने जिन पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले फिर से अलॉट किये उनमें बीजेपी की उमा भारती, बाबूलाल गौर और कैलाश जोशी के नाम तो थे लेकिन 10 साल तक एमपी के मुख्यमंत्री रहे कांग्रेस के दिग्विजय सिंह का नाम नहीं था. कांग्रेस ने इस मुद्दे पर पहले भी शिवराज सरकार पर भेदभाव का आरोप लगाया था.

मिशन-47 के जरिये सत्ता पाने की फिराक में बीजेपी
मध्यप्रदेश चुनाव जीतने के लिए बीजेपी भले ही अबकी बार दो सौ पार की बात कर रही हो। लेकिन, जमीन पर ये काम कितना मुश्किल है ये उसे भी पता है। यही वजह है कि बीजेपी खासी चुनावी कवायद में लगी है और तरह-तरह की रणनीति बना रही है। ’मिशन-47’ भी बीजेपी की चुनावी रणनीति का खास हिस्सा है।
आप सोच रहे होंगे कि ये ’मिशन-47’ आखिर है क्या, तो आपको बता दें कि दरअसल ’मिशन-47’ का मतलब है प्रदेश की वो 47 सीटें है जो आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं और जिन्हें आदिवासी वोट बैंक पूरी तरह प्रभावित करता है। बीजेपी के दो सौ सीटें जीतने का दावा तब तक नहीं पूरा हो सकता जब तक कि इन 47 सीटों में से कम से कम 30 से 35 सीटों पर कब्जा ना जमाया जाए। ’मिशन-47’ के महत्व का अंदाजा सीएम शिवराज सिंह और राकेश सिंह के अलावा बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को भी है। यही वजह है कि बीजेपी ने ’मिशन-47’ को पूरा करने के लिए पार्टी के कई दिग्गजों को मैदान में उतार दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो विश्व आदिवासी दिवस पर आदिवासी बाहुल्य जिलों में घोषित हुई छुट्टी और बड़े स्तर पर हुए कार्यक्रमों के पीछे भी बीजेपी की यही रणनीति काम कर रही थी।

आदिवासी सम्मेलन के बहाने, वोटरों को रिझाने में जुटे शिवराज
शिवराज सरकार ने विश्व आदिवासी दिवस पर प्रदेश के सभी आदिवासी अंचल के जिलों में बड़े पैमाने पर कार्यक्रम आयोजित करवाये। धार के कार्यक्रम में तो स्वयं सीएम शिवराज ने मोर्चा सभांलते हुये आदिवासी समाज के लिये सौंगातों का पिटारा खोल दिया। जबकि अन्य जिलों में शिवराज के मंत्रियों सहित भाजपा के तमाम सांसदों की टीम जुटी हुई थी। इससे साफ होता है कि बीजेपी आगामी चुनाव में इन आदिवासी सीटों के प्रति कितनी गंभीर है।
सरकार में प्रतिनिधित्व कम, सीटें ज्यादा
2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को प्रदेश की सत्ता तक पहुंचाने में प्रदेश की आदिवासी सीटों का सबसे महत्वपूर्ण योगदान रहा था। 47 सीटों में से भाजपा के 30 विधायक चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। लेकिन, शिवराज सरकार में आदिवासियों को वह स्थान प्राप्त नहीं हुआ, जिसकी उन्हें उम्मीद थी। दरअसल शिवराज मंत्रिमंडल में इस वर्ग के फिलहाल सिर्फ तीन मंत्री कुंवर विजय शाह, ओमप्रकाश धुर्वे व अतंर सिंह आर्य ही शामिल हैं, जबकि शहडोल लोकसभा चुनाव जीतने के बाद ज्ञान सिंह ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। ऐसे में मंत्रिमंडल में कम स्थान मिलना भी इस वर्ग की नाराजगी की एक बड़ी वजह मानी जा रही है।

व्यापमं से भी बड़ा करोड़ों के ई-टेंडर घोटाले को शिवराज सरकार द्वारा जांच के नाम पर दबाने का खेल जारी

अध्यक्ष कमलनाथ ने बताया कि मध्यप्रदेश के कई विभागों में टेंडर व्यवस्था में भ्रष्टाचार रोकने के लिए ई-टेंडर व्यवस्था लागू कर मध्यप्रदेश ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल बनवाया गया था। इसके माध्यम से विभिन्न विभागों के कार्यों के लिए ई-टेंडर व्यवस्था लागू की गई थी। इसी के अंतर्गत नल-जल समूह योजना के तहत गांवों में पानी पहुंचाने के लिए बनी परियोजनाओं के लिये 1000 करोड़ रूपये के तीन टेंडरों में टेंपरिंग कर रेट बदलने का मामला जून माह में सामने आया था।
आश्चर्यजनक है कि इसमें से दो टेंडर राजगढ़ क्षेत्र की उन पेजयल परियोजनाओं के हैं, जिनका शिलान्यास देश के प्रधानमंत्री के हाथ से 23 जून को ही होना था। प्रदेश में भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था के लिए ई-टेंडर व्यवस्था लागू की गई थी, लेकिन मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार एक व्यवस्था बन चुकी है। इसलिए ई-टेंडर में भी टेंपरिंग कर भ्रष्टाचार का रास्ता खोज लिया गया। जल निगम के ई-टेंडर में टेंपरिंग सामने आने के बाद प्रदेश में जल संसाधन, लोक निर्माण विभाग, महिला बाल विकास विभाग, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग, नर्मदा घाटी विकास विभाग, मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम सहित अन्य विभागों में भी टेंडरों मंे गड़बड़ी की बातें सामने आयीं। संपूर्ण मामले की जांच मामला सामने आने के तीन दिन बाद ईओडब्ल्यू को सौंपी गई। उसी समय कांगे्रस ने कहा था कि ईओडब्ल्यू को जांच सौंपकर शिवराज सरकार मामले को दबाना चाहती है। इस पूरे मामले की जांच सीबीआई को सौंपना चाहिए व अभी तक के सभी विभागों के सारे ई-टेंडरों को इस जांच के दायरे में लेना चाहिए। इस मांग को लेकर मैंने प्रदेश के मुख्यमंत्री को एक पत्र भी लिखा। चलती जांच में इस गड़बड़ी को उजागर करने वाले मेप आईटी के प्रमुख को पहले छुट्टी पर भेज दिया गया, फिर बाद में उन्हें हटा दिया गया। इससे ही सरकार की इस घोटाले को लेकर मंशा व घबराहट उजागर हो गई थी।
नाथ ने बताया कि प्रारंभिक जांच में इस गड़बड़ी के तार मुंबई से जुड़े होना बताया गया, लेकिन बाद में जांच में यह बात सामने आयी कि भोपाल में ही बैठकर इस गड़बड़ी को अंजाम दिया गया। जांच में भोपाल के नये आईपी एड्रेस पाये गये, जिनके माध्यम से यह गड़बड़ी की बात सामने आयी। यह बात भी सामने आयी कि इन आईपी एड्रेस के माध्यम से कई विभागों में भी गड़बड़ी के सबूत भी मिले हैं। प्रारंभिक 1000 करोड़ के ई-टेंडर से जुड़ा यह मामला बाद में लाखों करोड़ों तक पहुंच गया। पिछले चार वर्षों के सारे ई-टेंडर संदेह के घेरे में आ गये। लेकिन दो माह बीत जाने के बाद भी अभी तक किसी एफआईआर व गिरफ्तारी की बात सामने नहीं आयी है और न ही कोई बड़ा खुलासा इस मामले में अभी तक हुआ है। जबकि ई-टेंडरों में गड़बड़ी में कई बातें सामने आ चुकी हैं। आश्चर्यजनक यह है कि ई-प्रोक्योरमेंट का काम देखने वाली एमपीएसईडीसी के छह प्रबंध निदेशक 15 माह में बदल दिये गये हैं। जो खुद एक बड़े भ्रष्टाचार के खेल को इंगित कर रहे हैं।
कांगे्रस ने शुरू से ही इस मामले को उठाया। मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर सीबीआई जांच की मांग की। विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से इस पर चर्चा कराना चाही, लेकिन शिवराज सरकार इस मामले में शुरू से ही मौन रही और इस मामले को रफा-दफा करने और दबाने में लगी रही। कांगे्रस पुनः मांग करती है कि इस घोटाले के संबंध में चल रही जांच प्रक्रिया में दो माह की जांच में क्या-क्या गड़बड़ियां सामने आयी हैं, किन-किन की संलिप्तता उजागर हुई है, दोषियों पर क्या कार्यवाही की गई है, भविष्य में इस तरह की गड़बड़ियों को रोकने के लिए क्या कदम उठाये गये हैं, शिवराज सरकार स्पष्ट करे।

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