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सांसद निधि के 12000 करोड़ रुपये खर्च ही नहीं हुए

नई दिल्ली 31 अगस्त 2018 । सांसद निधि पर दिल्ली में 30 अगस्त को प्रस्तावित समीक्षा बैठक में इस धनराशि को खर्च करने और इसके इस्तेमाल पर नजर रखे जाने वाले कामकाज पर चर्चा होगी। ऐसे में यह मसला अहम होगा कि सांसद विकास निधि की भारी भरकम राशि खर्च ही नहीं हो पा रही है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक आम लोगों के विकास पर खर्च होने वाले करीब 12 हजार करोड़ रुपये सांसदों की सुस्ती के चक्कर में या तो खर्च नहीं हो रहे या फिर अटके पड़े हैं।

लोकसभा और राज्यसभा के सांसद अपनी निधि के करीब पांच हजार करोड़ रुपये खर्च ही नहीं कर पाए हैं। इसलिए करीब सात हजार करोड़ की अगली किस्त जारी नहीं हुई। धनराशि खर्च न कर पाने वालों में लगभग सभी राज्यों के सांसद शामिल हैं। इनमें दिग्गजों के भी नाम हैं। यहां तक कि बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश, जिन्हें विकास की सबसे ज्यादा जरूरत की श्रेणी में रखा जाता है, उन राज्यों में भी सांसद निधि के करीब 1600 करोड़ रुपये खर्च नहीं हो पाए हैं। इससे जाहिर तौर पर लोग विकास के लाभ से वंचित रह गए। गुरुवार को होने वाली समीक्षा बैठक में राज्यों से संबंधित नोडल अधिकारी और साथ ही मिनिस्ट्री ऑफ प्लानिंग एंड इम्प्लीमेंटेशन अधिकारी भी शामिल रहेंगे।

उपयोग प्रमाण पत्र ही नहीं पहुंचते

किसी सांसद का कार्यकाल खत्म होने के 18 महीने के भीतर उसके इलाके का काम पूरा कर सर्टिफिकेट जिला या नोडल अधिकारी को जमा कराना होता है। इसे यूटिलाइजेशन सर्टिफेकेट (उपयोग प्रमाण पत्र) कहते हैं। साथ ही कामकाज के ऑडिट का भी प्रमाण पत्र ऑडिटर से लेना होता है।सांसद निधि के कामकाज के यही प्रमाण पत्र या तो पहुंचते नहीं हैं और अगर पहुंचते भी हैं तो आधे-अधूरे होते हैं। किसी में सांसद का नाम नहीं होता तो किसी में ऑडिटर की मुहर नहीं होती है। इसके चलते प्रमाण पत्र पास नहीं होते हैं और आम जनता के विकास के हिस्से के करोड़ों रुपये फंसे रहते हैं।

पूर्व सांसदों के खाते भी चालू

सांसद का कार्यकाल खत्म होने के बाद 18 महीने के भीतर काम पूरा करना होता है, लेकिन आलम यह है कि 14वीं और 15वीं लोकसभा तथा राज्यसभा के मिलाकर कुल 1156 सांसदों के कामकाज का खाता अभी तक बंद नहीं हुआ है। इन सांसदों की निधि से होने वाले विकास कार्यों के बाद जरूरी कागजात देने की जिम्मेदारी नहीं निभाई गई।

सांसद निधि पर होगी डिजिटल नजर

सांसद निधि के दायरे में किए जाने वाले विकास कार्यों पर अब तकनीक के जरिए नजर रखी जाएगी। इसके लिए सांसद जिन जगहों पर विकास कार्यों की सिफारिश करेंगे, उसकी जियो टैगिंग की जाएगी और मोबाइल एप के जरिए कामकाज में हो रही प्रगति की जानकारी रखी जाएगी। उन कार्यों की स्थिति की जानकारी सरकार के साथ मतदाता को भी मिलेगी। मोबाइल एप से फोटो, वीडियो भी अपलोड किए जाएंगे। इसका मकसद पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करना है।

आने वाले दिनों में सभी डिजिटल जानकारियां ह्यएमपीएलएडी पोर्टलह्ण से जोड़ी जांएगी। मिनिस्ट्री ऑफ प्लानिंग एंड इम्प्लीमेंटेशन के मुताबिक सांसदों का यह रवैया बेहद चिंताजनक है। सांसदों के रकम न खर्च कर पाने का खामियाजा इलाके की जनता को उठाना पड़ता है।

इसलिए रुकती है किस्त

सांसदों को साल में ढाई-ढाई करोड़ रुपये की दो किस्तें मिलती हैं। लोकसभा के सांसदों को कुल 10 और राज्यसभा के सांसदों को 12 किस्तें मिलती हैं। फंड जिस भी मद में खर्च करने के लिए लिया जाता है, उसे एक साल के भीतर खर्च करना होता है। प्रमाण पत्र जमा न कराने पर अगली किस्त रोक दी जाती है।

बड़े पैमाने पर सांसद निधि रुकीं

दरअसल, पैसा खर्च न होने की वजह से सांसद निधि की अगली किस्त भी फंस जाती है। देशभर में सांसद निधि की कुल 2920 किस्तें अटकी हैं। सांसद निधि की एक किस्त 2.5 करोड़ रुपये होती है। इस तरह इन किस्तों को अगर रकम में जोड़ें तो यह आंकड़ा 7,320 करोड़ रुपये का होता है। अटकी हुई किस्तें सर्वाधिक उत्तर प्रदेश की हैं।

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