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SC के फैसले से आडवाणी-उमा-जोशी समेत कई बड़े नेताओं को राहत

नई दिल्ली 26 सितम्बर 2018 । आरोपों का सामना कर रहे नेताओं के चुनाव लड़ने पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने चार्जशीटेड नेताओं के चुनाव लड़ने से रोक लगाने से इनकार कर दिया है. कोर्ट का कहना है कि इस मामले पर संसद को ही कानून बनाना चाहिए. कोर्ट के इस फैसले से मौजूदा दौर के कई बड़े नेताओं को राहत मिली है. इन नेताओं में बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी भी शामिल हैं. ये वे नेता हैं जिनके खिलाफ किसी न किसी मामले में आरोपपत्र दाखिल हो चुका है लेकिन कोर्ट का फैसला नहीं आया है.

किन बड़े नेताओं को राहत…

> लालकृष्ण आडवाणी, बीजेपी

> मृरली मनोहर जोशी, बीजेपी

> उमा भारती, बीजेपी

> महेश गिरी, बीजेपी

> पी. करुणाकरन, सीपीएम

> पी. के. श्रीमथी, सीपीएम

> पप्पू यादव, जन अधिकार लोकतांत्रिक पार्टी

अयोध्या में बाबरी मस्ज़िद गिराए जाने के मामले में लखनऊ की सीबीआई अदालत के आदेश के बाद बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती पर आपराधिक मुकदमा चला था.

आपराधिक मामलों के बारे में बड़ी बातें…

> 1765 सांसद-विधायकों पर कुल 3045 आपराधिक केस

> 541 में से कुल 53 सांसदों के खिलाफ आपराधिक केस

> 23 पहली बार के सांसदों पर मामले दर्ज

> उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा दागी नेता

कोर्ट ने क्या दिया है फैसला?

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि चार्जशीट के आधार पर जनप्रतिनिधियों पर कार्रवाई नहीं की जा सकती है. चुनाव लड़ने से रोकने के लिए सिर्फ चार्जशीट ही काफी नहीं है.

कोर्ट ने कहा है कि हर नेता को अपने आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी चुनाव लड़ने से पहले चुनाव आयोग को देनी चाहिए. कोर्ट ने कहा है कि इस मसले संसद को कानून बनाना चाहिए.

सांसदों-विधायकों के मुकदमे लड़ने पर रोक नहीं, SC ने कहा- बार काउंसिल का ऐसा नियम नहीं
सांसद या विधायक बनने के बाद भी नेताओं के वकील के तौर पर प्रैक्टिस करने पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने से इनकार किया है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, ए.एम. खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की तीन सदस्यीय बेंच ने कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया में नेताओं के केस लड़ने पर किसी तरह की रोक का प्रावधान नहीं है। बीजेपी लीडर और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से इस मामले में दायर पीआईएल पर 9 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस याचिका में सांसद और विधायकों पर कार्यकाल के दौरान अदालत में मुकदमे लड़ने पर रोक की मांग की गई थी।

इससे पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पक्ष रखते हुए कहा कि सांसद और विधायक निर्वाचित प्रतिनिधि होते हैं, लेकिन वे सरकार के नियमित कर्मचारी नहीं होते। केंद्र सरकार के तर्क को सुनने के बाद शीर्ष अदालत ने नेताओं के मुकदमे लड़ने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि इस तर्क के जवाब में उपाध्याय की ओर से पक्ष रख रहे शेखर नाफाडे ने कहा कि कोई भी विधायक और सांसद सरकार के खाते से सैलरी पाते हैं। बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के तहत सरकार से सैलरी पाने वाले एंप्लॉयी चुनाव नहीं लड़ सकते हैं।

इसके जवाब में शीर्ष अदालत ने कहा कि एंप्लॉयी और सरकार के बीच मालिक और नौकर का संबंध होता है, लेकिन भारत सरकार किसी सांसद के लिए मास्टर नहीं है। गौरतलब है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के केस लड़ने पर रोक से इनकार की मांग वाली याचिका में कहा गया था कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

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