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नागरिकता और अनुच्छेद 370 के बाद अब मोदी सरकार ला सकती है ये दो बड़े बिल

नई दिल्ली 14 दिसंबर 2019 । केंद्र सरकार लगातार देश में बदलाव की दिशा में काम करते हुए एक के बाद एक दशकों पुराने मुद्दों के समाधान के लिए नए-नए प्रावधान और बिल लेकर आ रही है। तीन तलाक, अनुच्छेद 370 और नागरिकता संशोधन के अलावा कईं महत्वपूर्ण बिलों को लोकसभा में पास कर कानून बनाने के बाद अब केंद्र सरकार इस देश से जुड़ो दो और बड़े बिलों को लाने की तैयारी में है। यह ऐसे बिल हैं जिनके बारे में सुनकर आपके ही नहीं विपक्षी दलों के भी होश उड़ने वाले हैं। यह बिल देश की जनसंख्या और नागरिक अधिकारों को लेकर हैं।

जानकारी के अनुसार, संसद में नागरिकता बिल के पास होने के बाद अब केंद्र सरकार जनसंख्या नियंत्रण कानून और समान नागरिक संहिता को लेकर बिल लाने की कोशिश में है। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि अंदरखाने इसे लेकर चर्चा भी शुरू हो गई है। हालांकि, फिलहाल इसे लेकर सरकार और पार्टी के किसी भी पदाधिकारी या अधिकारी की तरफ से कोई बयान नहीं आया है।

खबर है कि पिछले हफ्ते जब शाह नागरिकता बिल पर पार्टी नेताओं से चर्चा कर रहे थे तब उस बैठक में समान नागरिक संहिता को लेकर बात निकली थी और कहा गया था कि इसे अच्छा समर्थन मिलेगा। हालांकि, जनसंख्या नियंत्रण और समान नागरिक संहिता कानून को लेकर लंबे समय से चर्चा चली आ रही है। जब भी कोई बड़ा कानून लागू होता है तो इन दोनों मुद्दों पर भी बिल लाने का जिक्र भी होता है।

यह कयास इसलिए भी लगाए जा रहे हैं क्योंकि कुछ नेताओं का मानना है कि प्रधानमंत्री ने अपने भाषणों में जनसंख्या नियंत्रण का जिक्र किया था और जब भी वो किसी मुद्दे पर चर्चा करते हैं तो उसे लेकर कदम भी उठाते हैं। प्रधानमंत्री ने 73वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से कहा था कि तेजी से बढ़ती आबादी पर हमें आने वाली पीढ़ी के लिए सोचना होगा। इसके बाद जनसंख्या नियंत्रण पर बिल के कयास लगने लगे हैं। वहीं दूसरी तरफ समान नागरिक संहिता पुराना मुद्द है।

नागरिकता कानून पर आया संयुक्त राष्ट्र का बयान, कहा- इसकी प्रकृति ही ‘मूल रूप से भेदभावपूर्ण’

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार निकाय ने भारत के नए नागरिकता कानून को लेकर शुक्रवार को चिंता जताते हुए कहा कि इसकी प्रकृति ही ‘मूल रूप से भेदभावपूर्ण’ है. नए नागरिकता कानून में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर मुस्लिम उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का प्रावधान है. संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार निकाय के प्रवक्ता जेरेमी लॉरेंस ने जिनेवा में कहा, ‘हम भारत के नए नागरिकता (संशोधन) कानून 2019 को लेकर चिंतित हैं, जिसकी प्रकृति ही मूल रूप से भेदभावपूर्ण है.’
उन्होंने कहा, ‘संशोधित कानून भारत के संविधान में निहित कानून के समक्ष समानता की प्रतिबद्धता को और अंतराष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार नियम तथा नस्लीय भेदभाव उन्मूलन संधि में भारत के दायित्वों को कमतर करता दिखता है, जिनमें भारत एक पक्ष है जो नस्ल, जाति या धार्मिक आधार पर भेदभाव करने की मनाही करता है.’

दिल्ली में विदेश मंत्रालय ने कहा था कि नया कानून भारत में पहले से ही रह रहे कुछ पड़ोसी देशों के उत्पीड़ित धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देने के लिए तेजी से विचार करने की बात कहता है. मंत्रालय ने कहा था कि प्रत्येक देश को विभिन्न नीतियों के जरिए अपने नागरिकों को सत्यापित करने और गणना करने का अधिकार है.
लॉरेंस ने कहा कि भारत में नागरिकता प्रदान करने के व्यापक कानून अभी भी हैं, लेकिन ये संशोधन नागरिकता हासिल करने के लिए लोगों पर भेदभावपूर्ण असर डालेगा.

उन्होंने कहा कि प्रवास की स्थिति को देखे बिना, सभी प्रवासी सम्मान, संरक्षण और अपने मानवाधिकारों की पूर्ति के हकदार हैं. लॉरेंस ने कहा कि मात्र 12 महीने पहले ही भारत ने ‘ग्लोबल कॉम्पैक्ट फॉर सेफ, रेगुलर एंड ऑरडरली माइग्रेशन’ का समर्थन किया था. इसके तहत राज्य बचनबद्ध है कि वह सुरक्षा की स्थिति में प्रवासियों की जरूरतों पर प्रतिक्रिया देगा, मनमानी हिरासत और सामूहिक रूप से देश निकाले से बचेगा और सुनिश्चित करेगा कि प्रवासियों से संबंधित व्यवस्था मानवाधिकार आधारित हो. प्रवक्ता ने उत्पीड़ित समूहों का संरक्षण देने के लक्ष्य का स्वागत करते हुए कहा कि यह मजबूत राष्ट्रीय शरण प्रणाली के जरिए होना चाहिए था जो समानता और भेदभाव नहीं करने पर आधारित है.

उन्होंने कहा कि यह उन सभी लोगों पर लागू होना चाहिए जिन्हें वास्तव में उत्पीड़न और अन्य मानवाधिकारों के हनन से संरक्षण की जरूरत है और इसमें नस्ल, जाति, धर्म, राष्ट्रीयता और अन्य का भेद नहीं होना चाहिए. लॉरेंस ने कहा, ‘हम समझते हैं कि भारत का उच्चतम न्यायालय नए कानून की समीक्षा करेगा और उम्मीद करते हैं कि भारत कानून की अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों के साथ अनुकूलता पर सावधानीपूर्वक विचार करेगा.’

Centre vs States on Citizenship Act as 3 CMs Declare Won’t Implement Law, Govt Says ‘They’ve No Power’

As a growing number of state governments refuse to implement the contentious Citizenship Amendment Act on the grounds that it is an attempt by the ruling BJP to strip the country of its secular credentials, the Centre has pointed out they do not have a choice in the matter as the matter of citizenship comes under the union list.

“The states have no powers to deny implementation of a central law which is in the Union List,” a senior home ministry official told CNN-News18 after chief ministers in West Bengal, Kerala and Punjab declared they would not implement the law in their respective states.

The official pointed out that in the seventh schedule of the Constitution, there are three lists. While the states have a say on matters in the state and concurrent lists, any legislation passed by the Parliament on a subject in the union list will have to be implemented throughout the country.

Defence, External Affairs, Railways, Naturalisation and Citizenship are some of the subjects in the union list, which has 97 items.

While Bengal CM Mamata Banerjee had voiced her opposition to the Citizenship (Amendment) Bill even before it was passed by the Parliament on Wednesday, her counterparts in Kerala and Punjab – Pinarayi Vijayan and Amarinder Singh respectively – on Thursday said they will not allow the law be implemented in their state.

The controversial bill, which for the first time offers a legal route to gain Indian citizenship on the basis of religion, had received the presidential nod at midnight on Thursday and came into force with immediate effect.

Terming the bill as an attack on the secular and democratic character of India, Kerala Chief Minister Pinarayi Vijayan said that his state has no place for such an “unconstitutional” law.

The law makes it easier for non-Muslim migrants from Bangladesh, Pakistan and Afghanistan to obtain Indian citizenship. It has been accused by rights groups and opposition parties of being discriminatory and violating the constitutional right to equality.

The President’s assent for it was given despite massive protests in the northeast, particularly Assam, which has prompted the governments there to impose curfew in several towns and cities and call in the army to control the situation.

Amarinder Singh said the Congress, with the majority it commands in the Punjab assembly, will block the “unconstitutional” bill from being implemented in the state. “This law is of a very divisive nature. Mamata Banerjee has repeatedly vowed that she would not let the law be implemented in Bengal and on Friday announced she would hold a mega protest rally in Kolkata on December 16.

Madhya Pradesh and Chhattisgarh governments have also indicated that they would not implement the law, but officially they said they would back the position taken by the Congress high command.

Sources in the MP government said the states are aware of the constitutional position, but argued that the role of the state can’t be negated completely. “Civil disobedience is a tool available to us,” an official said.

As per the records available with union home ministry, Rajasthan, West Bengal, Assam, Delhi and Punjab have the majority of persecuted Hindus, Sikhs, Jains, Buddhist, Christians and Parsis from Afghanistan, Pakistan and Bangladesh. Apart from Assam, all of them are opposition-ruled states.

नागरिकता संशोधन बिल मोदी सरकार का ऐतिहासिक निर्णय,बिल पास होने पर सिंधी समाज ने की आतिशबाजी

विधेयक 2019 (सीएबी) को संस्कृति कला एवं प्रकोष्ठ के नगर सहसंयोजक मंगेश श्रीवास्तव ने मोदी सरकार का ऐतिहासिक निर्णय बताते हुए कहा कि बंटवारे के बाद पुरखों की जमीन यहां छोड़कर पाकिस्तान में रह रहे लोगों पर देश की सरकार का ध्यान अब गया है।
मंगेश श्रीवास्तव ने कहा कि पाकिस्तान में महिलाएं बिंदिया, मेहंदी नहीं लगा सकती, मंगलसूत्र भी नहीं पहन सकती। वहां बेबस महिलाओं की चीखें गूंजती हैं। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में नागरिकता विधेयक पेश कर लाखों पीड़ितों की आशाओं को पुनर्जीवित किया है। सिंधु घाटी में रह रहे लोग पाकिस्तान से मुक्ति चाह रहे हैं, वहां इस बात को लेकर आंदोलन हो रहा है, नेहरूजी ने 1950 में एक समझौता किया था जिसके तहत दोनों देशों में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का भरोसा दिया गया था, आज हमारे देश में तो अल्पसंख्यक खुश है लेकिन पड़ोसी देश में मंदिर और गुरूद्वारे तोड़े जा रहे हैं। लूट और हत्याएं हो रही हैं। संस्कृति एवं कला प्रकोष्ठ के नगर सहसंयोजक मंगेश श्रीवास्तव ने कहा कि इस बिल से शिवसेना का चेहरा भी उजागर हो गया है, जहां हिंदुओं के लिए लड़ने वाली शिवसेना ने कांग्रेस की गोद में बैठकर पाकिस्तान का साथ दिया वहीं नागरिकता संशोधन बिल में अपना मत नहीं देकर यह स्वीकार कर लिया कि वह पूरी तरह से कांग्रेस की एवं सोनिया गांधी की गोद में बैठ चुकी है।

नागरिकता संशोधन बिल पास होने पर सिंधी कॉलोनी चौराहे पर पार्षद रिंकू दीपक बेलानी के नेतृत्व में सिंधी समाज के महिला पुरुषों ने खुशी जाहिर की एवं मिठाइयां वितरित कर सभी का मुंह मीठा किया। साथ ही आतिशबाजी कर सरकार का धन्यवाद किया। देश में रह रहे नागरिकों को जो असुविधा होती थी उससे छुटकारा मिला एवं पड़ोसी देश से जो लोग विगत वर्षों से यहां पर रह रहे थे उन्हें बार-बार वीजा के लिए जाना पड़ता था उन्होंने विशेष तौर पर खुशियां जाहिर की। इस मौके पर विशेष तौर पर पार्षद रिंकू दीपक बेलानी, दीपा खत्री, रितेश लालवानी,किशन भाटिया, सुनील नवलानी, किशोर मुलानी सहित सैकड़ों महिला पुरुषों ने सिंधी कॉलोनी चौराहे पर आतिशबाजी कर एवं मिठाई वितरित कर खुशी जाहिर की।

मध्यप्रदेश में लागू नहीं होगा नागरिकता संशोधन कानून पंजाब के बाद कांग्रेस शासित मध्यप्रदेश ने भी इंकार किया पाकिस्तान से प्रताडि़त होकर आए हजारों हिन्दू और सिख मध्यप्रदेश में नागरिकता मिलने का इंतजार कर रहे हैं
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी नागरिकता संशोधन कानून लागू करने से इंकार कर दिया है इससे पहले पंजाब के मुख्यमंत्री अमरेन्द्र सिंह ने भी इस कानून को लागू करने से मना कर दिया था इस कानून की आलोचना राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी की है लेकिन अभी गहलोत ने नागरिकता संशोधन कानून को लागू नहीं करने के बारे में कुछ भी नहीं कहा है पंजाब के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के इंकार करने के बाद यह सवाल उठा है कि क्या राजस्थान में भी यह कानून लागू नहीं होगा ? हालांकि नागरिकता देने के बारे में फैसला लेने का अधिकार केन्द्र सरकार को है राज्य अपने स्तर पर कोई निर्णय नहीं ले सकते हैं लेकिन इन दिनों देश में जिस तरह की राजनीति चल रही है उसमें राज्य सरकारें कई मुद्दों पर अपने स्तर पर निर्णय ले रही हैं यदि मध्य प्रदेश और पंजाब की तरह कांग्रेस शासित राजस्थान में भी नागरिकता संशोधन कानून को लागू नहीं किया जाता है तो बड़ी संख्या में पाकिस्तान से आए हिन्दू और सिख परिवारों के समक्ष समस्या खड़ी हो जाएगी पाकिस्तान की सीमा से लगे जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर और जयपुर तक में सिख और हिन्दू शरणार्थी बनकर रह रहे हैं पाकिस्तान से आए ऐसे परिवार लंबे अरसे से भारत की नागरिकता की मांग कर रहे हैं हालांकि ऐसे परिवारों ने अब पक्के मकान बना लिए हैं और राजस्थान में रहकर सरकार की अनेक सुविधाएं भी प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन स्पष्ट कानून के अभाव में भी भारत की नागरिकता ऐसे परिवारों को नहीं मिली थी केन्द्र सरकार ने ऐसे परिवारों की परेशानी का देखते हुए ही नागरिकता कानून में संशोधन किया है हालांकि इस कानून में संशोधन के बाद पाकिस्तान से आए ऐसे परिवारों को भारत की नागरिकता मिल जानी चाहिए, लेकिन यदि राज्य सरकारों का असहयोग रहा तो फिर नागरिकता मिलने में परेशानी होगी
कानून लागू करना अनिवार्य :
राज्यों के विरोध को देखते हुए ही 13 दिसम्बर को गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि नागरिकता संशोधन कानून देश के सभी राज्यों को अनिवार्य तौर पर लागू करना होगा। गृह मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि किसी भी राज्य को यह अधिकार नहीं कि वह इस कानून को राज्य में लागू करने से इंकार कर दें

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