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अमित शाह को बड़ी जिम्मेदारी देने की तैयारी

नई दिल्ली 25 मई 2019 । नरेंद्र मोदी सरकार में अमित शाह को बड़ी भूमिका मिल सकती है। उन्हें वित्त मंत्रालय या रेल मंत्रालय की बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है। अमित शाह जिस प्रकार से संगठन को एक स्वरूप देने की क्षमता रखते हैं, पीएम मोदी उनकी इस क्षमता का लाभ उठा सकते हैं। वित्त मंत्रालय को संभालने की स्थिति में अरुण जेटली को संगठन में भेजा जा सकता है।

पीयूष गोयल : अरुण जेटली की बीमारी के बाद उन्हें वित्त मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया था। अब पीएम मोदी उन्हें या तो वित्त मंत्रालय का महत्वपूर्ण प्रभार दे सकते हैं या फिर वे पूरी तरह से रेल मंत्रालय देख सकते हैं। गोयल मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में सबसे सफल मंत्रियों में से एक रहे हैं।

सुषमा स्वराज : सुषमा स्वराज राज्यसभा से मोदी सरकार में एंट्री मार सकती हैं। इस बार उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा था। इसके बाद उन्होंने कहा था कि भले ही वे चुनावी राजनीति से अलग हो रही हैं, लेकिन राजनीति से दूर नहीं जा रही है। उन्हें अमित शाह के स्थान पर मोदी सरकार में राज्यसभा के दरवाजे इंट्री मिल सकती है। उनका विदेश मंत्री के रूप में कार्यकाल काफी शानदार रहा था।

राजनाथ सिंह : मोदी सरकार में राजनाथ सिंह को एक बार फिर स्थान मिलना तय है। वे एक बार फिर गृह मंत्री के पद पर नजर आ सकते हैं। राजनाथ सिंह ने एक बार फिर लखनऊ से शानदार जीत दर्ज की है। वे मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में अच्छा प्रदर्शन करने वाले मंत्रियों में रहे हैं। गृह मंत्री के रूप में उग्रवाद व नक्सलवाद से निपटने के उनके प्रयासों को काफी सराहना मिली है।

नितिन गडकरी : नितिन गडकरी को नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में बेहतरीन मंत्रियों में से एक माना जाता रहा है। उन्होंने भूतल परिवहन विभाग में इतना बेहतरीन कार्य किया है कि विपक्षी नेता भी उनकी तारीफ करते हैं। राज्यों में विपक्षी दलों की सरकार रहने के बाद भी वे अपनी योजनाओं को राज्यों में लागू कराने में कामयाब रहे। सड़क निर्माण कार्य में तेजी ने देश की गति को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है। नितिन गडकरी को नई तकनीक व सोच के लिए भी खूब पसंद किया जाता है।

30 मई को हो सकता है पीएम मोदी का शपथ ग्रहण
वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ( Narendra Modi ) ने एक बार फिर भारत के चुनावों में बाजी मार ली है। मोदी और भाजपा की इस शानदार विजय को देखकर पूरी दुनिया हैरान है। इस जीत ने उनके कद को काफी बढ़ा दिया है। करीब 130 करोड़ की जनसंख्या वाले देश ने एक बार फिर उन्हें सिर-आँखों पर बैठा लिया है। विदेशों में भी मोदी की इस बड़ी जीत की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सभी पड़ोसी देशों की मीडिया में मोदी छाए हुए हैं। इस बीच पीएम मोदी के शपथ ग्रहण की तारीख भी करीब-करीब तय हो गई है। आशा जताई जा रही है कि मोदी 30 मई को अपने दूसरे कायर्काल के लिए शपथ ले सकते हैं। देश और दुनिया की कई हस्तियों के इस शपथ ग्रहण में शामिल होने की उम्मीद है। अब सवाल यह उठता है कि कौन सी विदेशी हस्तियां पीएम मोदी के शपथ ग्रहण में शामिल हो सकती हैं।

मोदी के दूसरे कार्यकाल को लेकर विदेशी मुल्कों में संशय के साथ उम्मीद की किरण भी है। मोदी ने इस बार भारी बहुमत हासिल किया है। माना जा रहा है कि अपने पिछले कार्यकाल के अनुरूप सरकार पूरी मजबूती के साथ कड़े फैसले लेने को तैयार रहेगी। हालांकि अभी मोदी के राजतिलक में आने वाले विदेशी मुल्कों के प्रमुखों के नामों पर सस्पेंस बना हुआ है। लेकिन यह तय है कि इस खास समारोह से मोदी की विदेश नीति की दिशा तय होने वाली है।

आपको याद होगा जब नरेंद्र मोदी ने 2014 में शपथ ली थी तो उन्होंने अपने शपथ ग्रहण समारोह में कई विदेशी हस्तियों को बुलाया था। इनमें सार्क देशों के प्रमुखों के साथ कई और भी देशों के प्रतिनिधि शामिल थे। उस समय पूरी दुनिया के लिए मोदी अनजान थे। 15 वर्षों तक एक राज्य के सीएम रहकर वह पीएम तक पहुंचे थे। उनके विरोधियों का आकलन था कि विदेश नीति के मामले में मोदी कच्चे खिलाड़ी साबित होंगे। उस समय मोदी ने सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया था। यह सभी पड़ोसी देश थे। इसमें तत्कालीन अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई ने समारोह में भाग लिया था।उनकी स्वीकार्यता को भविष्य में भारत के साथ काम करने में अफगानिस्तान की रुचि के रूप में देखा गया। बांग्लादेश ने निमंत्रण स्वीकार किया गया था, मगर शेख हसीना जापान की पूर्व-योजनाबद्ध यात्रा पर थीं।

भूटान के प्रधान मंत्री त्शेरिंग तोबगे ने समारोह में भाग लिया और 27 मई को दोनों के द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा करने की योजना बनाई। मालदीव के तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन अब्दुल गयूम ने भी इस समारोह में भाग लिया। मॉरीशस के प्रधानमंत्री नवीन रामगुलाम भी समारोह में शामिल हुए। नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री सुशील कोइराला ने भी निमंत्रण स्वीकार किया। पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को निमंत्रण देने पर पीएम मोदी की खूब आलोचना भी हुई और कहा गया कि वह आतंकवाद के आगे हथियार डाल रहे हैं, लेकिन असल में अपने सभी मतभेद भुलाकर पड़ोसियों को आमंत्रित करना विदेश नीति के लिहाज से एक बेहद सार्थक और सकारात्मक कदम था।

इस बार मोदी के राजतिलक में सार्क देशों के अलावा कई अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल हो सकते हैं। इसमें इजरायल के राष्ट्रपति बेंजामिन नेतन्याहू ( Benjamin Netanyahu ) का नाम सबसे आगे चल रहा है। बता दें कि वह भी कुछ दिन पहले ही चुनाव जीतकर आये हैं। इसके अलावा फ्रांस के राष्ट्रपति इमुनल मेक्रोन, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, जापान के राष्ट्रपति शिजों एबे भी इस शपथ ग्रहण समारोह का हिस्सा बन सकते हैं। इन नेताओं के आने के बारे में अभी अंतिम रूप से कुछ कहा जा सकता, लेकिन ये वो नेता हैं जिनसे पीएम मोदी के व्यक्तिगत संबंध हैं। अगर इन नेताओं ने आने की रजामंदी दे दी तो इस बार मोदी के राजतिलक की भव्यता दोगुनी हो सकती है।

हालांकि मोदी के शपथ ग्रहण समारोह का निमंत्रण कई अन्य देशों को भी देंगे। सऊदी शाह सलमान, यूएई के अमीर जायद अल नहान भी इस समारोह में शामिल हो सकते हैं। पीएम मोदी अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भी इस समारोह का न्योता भेज सकते हैं लेकिन उनके आने पर संदेह है। अमरीकी राष्ट्रपति दुनिया का सबसे ताकतवर नेता होता है और इतने शॉर्ट नोटिस पर कहीं भी उसका जाना सम्भव नहीं होता। यह भी दीगर बात है कि अमरीकी राष्ट्रपति का दुनिया में एक कद है और वो इतनी जल्दी कहीं जाने का निर्णय नहीं ले सकता। उसके साथ सुरक्षा और विश्व कूटनीति जैसे कई प्रोटोकॉल भी होते हैं। एक सामान्य शिष्टाचार के तहत शपथ ग्रहण समारोहों में विदेशी राजदूतों के माध्यम से उनके राष्ट्र प्रमुखों को न्योता दिया जाता है। लेकिन इनमें केवल उन्हीं देशों के प्रमुख आते हैं जिन देशों से आपसी संबंध प्रगाढ़ होते हैं।

इस शपथ ग्रहण में शामिल होने या न होने के क्रम में जिस नाम पर सबसे अधिक चर्चा है, वह है पाकिस्तान के पीएम इमरान खान ( Imran Khan ) का। ऐसा माना जा रहा है कि सार्क देशों के राष्ट्र प्रमुखों को आमंत्रित करने के क्रम में पीएम मोदी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को भी न्योता दे सकते हैं। हालांकि हाल में भारत और पाकिस्तान के बीच जो रिश्ते रहे हैं उससे यह बहुत मुश्किल लगता है, लेकिन अगर इस बार इमरान खान को न्योता दिया गया तो उनके लिए यह बेहतरीन मौका होगा कि वह दोनों देशों की कड़वाहट को दूर करें। इस दौरे के बाद इमरान खान और पाकिस्तान एक नई शुरुआत कर सकते हैं।

बीते दिनों पुलवामा हमले के बाद भारत और पाक के बीच तल्ख तेवर दिखाई दिए थे। इसके बाद एयरस्ट्राइक ने मामला और खराब कर दिया। बता दें कि पाकिस्तान को मोदी के पांच साल के कार्यकाल में भारत के हमले का डर सताता रहा है। अब अगर मोदी फिर से सत्ता में आए तो कश्मीर और आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को कई मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है। कुछ दिन पहले ही पाकिस्तान के पीएम इमरान खान ( Imran Khan ) ने इस बात की आशा जताई थी कि अगर मोदी सरकार आई तो कश्मीर के मुद्दे पर फैसला करने में आसानी होगी। अब यह तो वक्त ही बताएगा कि मोदी के दूसरे कार्यकाल में भारत के साथ पाकिस्तान के रिश्तों पर क्या असर होगा लेकिन इतना तय है कि पाकिस्तान से साथ पहले से चल रही मोदी सरकार की आक्रमक विदेश नीति जारी रहेगी। अगर इमरान इस शपथ ग्रहण में शामिल होते हैं तो उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में एक नया अध्याय लिख दिया जाए।

दीदी का अब बचना मुश्किल

लोकसभा चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान पीएम नरेन्द्र मोदी ने श्रीरामपुर की एक रैली में कहा था कि दीदी 23 मई को नतीजे आने के बाद पश्चिम बंगाल में कमल खिलेगा और देखना आपके एमएलए आपका साथ छोड़ देंगे। टीएमसी के 40 विधायक मेरे संपर्क में हैं और दीदी आपका बचना मुश्किल है। मोदी का यह कथन सही साबित होता दिख रहा है। चुनाव नतीजे के दूसरे ही दिन एक पार्टी विधायक का साथ छूट गया। पार्टी विधायक शुभ्रांसु राय को तृणमूल कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से ६ साल के लिए निकाल दिया गया। पार्टी नेता पार्थ चटर्जी ने बताया कि पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए उनको निकाला गया है।
वैसे पश्चिम बंगाल में मोदी-दीदी की लड़ाई में आखिरकार मोदी ही भारी साबित हुए हैं। भाजपा ने राज्य में ऐतिहासिक प्रदर्शन किया है। पार्टी ने दीदी के दुर्ग में सेंध लगाते हुए पहली बार अपनी सीटों की संख्या दो से दहाई अंकों में पहुंचा दी है। नतीजे वास्तव में चौंकाने वाले रहे हैं। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने 22 सीटों तो भाजपा ने 18 सीटों पर जीत दर्ज की है। कांग्रेस को महज 2 सीटें मिली है, जबकि वामपंथी दल (लेफ्ट) का राज्य में सूपड़ा साफ हो गया है। पार्टी की स्थापना के बाद पहली बार ऐसा हुआ है। मोदी की सुनामी ऐसी चली कि ममता बनर्जी के कैबिनेट मंत्री सुब्रत मुखर्जी जैसे दिग्गज हार गए।

राज्य में शाह का मिशन बंगाल 22 सीटें प्लस लगभग कामयाब हुआ तो ममता दीदी का जादू घटता नजर आया। इस बार शुरू से ही मोदी-शाह की जोड़ी ने तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता को टक्कर देने के लिए पूरी ताकत झोंकी थी। वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी खुलकर मोदी-शाह को चुनौती दी थी। मोदी और शाह ने यूपी के बाद बंगाल में सबसे ज्यादा रैलियों को संबोधित किया। मोदी और दीदी के बीच इस चुनाव में जमकर तकरार देखने को मिली। मोदी ने मुख्यमंत्री को स्पीड-ब्रेकर दीदी के रूप में करार दिया, ममता बनर्जी ने उन्हें एक्सपायरी बाबू कहकर प्रतिशोध लिया। भाजपा ने ममता की तुष्टिकरण नीति को मुद्दा बनाया। लेफ्ट और कांग्रेस की जगह खुद को विपक्ष के तौर पर स्थापित किया। राज्य की जनता को भी भाजपा के रूप में विकल्प पार्टी मिली। यह वजह है राज्य में भाजपा को बड़ी काययाबी मिली। यदि भाजपा यही रफ्तार बरकरार रखती है तो पार्टी 2021 के विधानसभा चुनाव में भी उलटफेर कर सकती है।

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