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आर्मी चीफ बिपिन रावत का पाक को सख्त संदेश

नई दिल्ली 13 सितम्बर 2019 । जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को पिछले महीने खत्म किए जाने के बाद से पाकिस्तान द्वारा भारत के खिलाफ चलाए जा रहे दुष्प्रचार और उकसावे वाले बयानों के बीच सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने बड़ा बयान दिया है। पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर को लेकर सेनाध्यक्ष रावत ने कहा है कि आर्मी पीओके को लेकर किसी भी अभियान के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि सरकार के निर्देश पर सेना किसी भी कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है। पीएमओ में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह के पीओके को लेकर दिए बयान के सवाल पर बिपिन रावत ने कहा कि इस पर फैसला सरकार को लेना है। उन्होंने कहा, ‘अन्य संस्थाएं तो जैसा सरकार कहेगी, वैसी तैयारियां करेंगी।’ सेना की तैयारी को लेकर पूछे जाने पर बिपिन रावत ने कहा कि सेना तो हमेशा किसी भी कार्रवाई के लिए तैयार ही रहती है।

जनरल रावत ने कहा कि पीओके को लेकर सरकार के बयान से खुशी हुई है। उन्होंने कहा कि इस पर फैसला सरकार को लेना है, लेकिन हम निर्देश के आधार पर तैयार हैं। इससे पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी पीओके को लेकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान से अब कोई भी बातचीत पीओके को लेकर ही होगी। यही नहीं 6 अगस्त को होम मिनिस्टर अमित शाह ने भी संसद में 370 पर विपक्ष के सवालों का जवाब देते हुए संसद में कहा था कि हम जान दे देंगे, लेकिन पीओके लेकर रहेंगे। सुरक्षा बलों को कुछ मौका दें कश्मीर के लोग: रावत
पीओके को लेकर सेना प्रमुख जनरल बिपिन सिंह रावत ने कहा, ‘सरकार को पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (POK) को लेकर फैसला लेना है, सेना किसी भी स्थिति के लिए तैयार है।’ जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाए जाने के फैसले का आर्मी चीफ ने स्वागत किया। उन्होंने कहा कि कश्मीर के लोग भी हमारे देश के ही हैं। वे हमारे ही लोग हैं। कश्मीर के लोगों को शांति बहाल करने के लिए सुरक्षा बलों को कुछ मौका देना चाहिए। उन्होंने 30 साल तक आतंकवाद झेला है, अब उन्हें कुछ वक्त शांति के लिए भी देना चाहिए।’

कश्मीर में इस बार सभी के अनुमान धराशायी होते क्यों दिख रहे हैं?

जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुछेद 370 को हटे एक महीने से ज़्यादा वक़्त बीत गया है. जहां राज्य के कुछ हिस्से, जैसे जम्मू शहर, अब सामान्य होते दिखाई दे रहे हैं, वहीं कश्मीर घाटी में तनाव अभी भी वैसा ही है जैसा इसे हटाये जाने के तुरंत बाद था. मोबाइल फोन, इंटरनेट और हजारों लोग यहां अभी भी बंद हैं और घाटी के अलग-अलग हिस्सों से प्रदर्शनों की खबरें भी लगातार ही आ रही हैं.

हालांकि सरकार ने कर्फ्यू में थोड़ी नरमी बरती है और लैंडलाइन फोन चालू कर दिये हैं. लेकिन इसके बावजूद कश्मीर में समान्य जीवन ठप्प पड़ा हुआ है और सरकार की तरफ से बरती जाने वाली नरमी का ज़मीन पर कोई असर होता दिखाई नहीं दे रहा है.

सरकार ने स्कूल, कॉलेज, दफ्तर खोल देने का ऐलान कर दिया है, लेकिन इनमें लोगों की उपस्थिति न के बराबर है. बाकी, दुकानें यहां अभी भी बंद हैं, कारोबार ठप्प पड़े हुए हैं और सड़कों पर ट्रेफिक के नाम पर सिर्फ कुछ निजी गाडियां ही चलती दिखाई देती हैं.

ऐसे में सवाल यह पैदा होता है कि आगे क्या? सत्याग्रह ने पिछले 15 दिन से कश्मीर घाटी के कई इलाकों में घूमकर लोगों और जानकारों से बात करके इस एक सवाल का जवाब खोजने की काफी कोशिश की, लेकिन इसका कोई संतोषजनक जवाब उसे नहीं मिल पाया है.

दक्षिण कश्मीर के एक वकील, आसिफ अहमद, के शब्दों में बात कही जाये तो, ‘कश्मीर घाटी, जहां दशकों से अनिश्चितता एक सामान्य नियम है, इतनी ढुलमुल कभी नहीं थी.’

आसिफ कहते हैं कि शायद ही कोई इस समय यह अनुमान लगा सकता है कि आगे क्या होने वाला है और ‘मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि प्रशासन भी आम लोगों जितना ही बेखबर है.’

उनकी इस बात की पुष्टि पुलिस के एक बड़े अधिकारी भी करते हैं. केंद्रीय कश्मीर में तैनात ये पुलिस अधिकारी कहते हैं कि वे हालात को दैनिक आधार पर देख रहे हैं और जो करने की ज़रूरत होती है वह कर देते हैं.

‘मेंने अपनी पूरी नौकरी में कश्मीर में इतनी अनिश्चितता कभी नहीं देखी है’ अपना नाम गोपनीय रखने की शर्त पर ये पुलिस अधिकारी सत्याग्रह को बताते हैं.

अब दूसरा सवाल यह है कि ऐसा है तो क्यों है? लोगों से बात करके इस चीज़ के कई पहलू सामने आते हैं.

कश्मीर में उतने विरोध प्रदर्शन नहीं हुए

‘इस बार के प्रदर्शन 2016 में बुरहान वानी के मारे जाने के बाद हुए प्रदर्शनों से दस गुना ज़्यादा हो सकते हैं.’ सूत्रों के अनुसार, अनुच्छेद 370 को हटाये जाने से कुछ दिन पहले, कश्मीर में तैनात सुरक्षा बलों को यही बताया गया था. 2016 में हुए प्रदर्शनों में 100 से ज़्यादा लोग मारे गए थे और हजारों घायल हुए थे.

प्रदर्शन इस बार भी हो तो रहे हैं, लेकिन अनुमान से काफी कम. जानकारी के मुताबिक इनमें अब तक कम से कम दो लोगों की मौत हुई है और सौ से ज्यादा लोग घायल हैं. हालांकि सरकार ने अभी इनमें से किसी भी चीज़ की पुष्टि नहीं की है.

इस बार प्रदर्शनों के उतना न होने की एक वजह सुरक्षा एजेंसियों द्वारा पहले से की गयी तैयारी भी है. इसके तहत तमाम नेताओं सहित हजारों लोगों की गिरफ्तारियां की गई हैं, संचार को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है और लोगों के आंदोलन करने पर सख्त प्रतिबंध लगाये गये हैं.

लेकिन जानकार कहते हैं कि सिर्फ ये सब चीज़ें बड़े पैमाने पर प्रदर्शन न होने को ठीक से नहीं समझाती हैं.

‘प्रतिबंध कश्मीर में नए नहीं हैं और कश्मीर में लोग इनके बावजूद सड़कों पे आते रहे हैं. लोगों का इस बार सड़कों पे न आना, वो भी 370 हटाये जाने पे, मेरी समझ से बाहर है.’ कश्मीर के एक वरिष्ठ पत्रकार, सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं कि शायद आने वाले वक़्त में समझ में आ जाये कि ऐसा क्यों हो रहा है, ‘कश्मीर में 1987 के चुनाव में धांधली के बाद लगभग तीन साल तक कुछ नहीं हुआ था. और फिर 1990 में जो हुआ वो पूरी दुनिया ने देखा था और अभी भी चल ही रहा है.’

वजह जो भी हो, हक़ीक़त यह है कि तनाव तो यहां भरपूर है लेकिन कुछ जगहों को छोड़कर इस वक़्त कश्मीर घाटी में हिंसा नहीं हो रही है. इसी वजह से सरकार धीरे-धीरे प्रतिबंध हटा पा रही है, इस आशा में कि हालात अब कुछ ही दिनों में सामान्य हो सकते हैं. लेकिन इस आशा की राह में कई बेहद बड़ी आशंकाएं भी हैं.

आखिरी लड़ाई

सत्याग्रह ने पिछले दो हफ्तों में कश्मीर के अनंतनाग, पुलवामा, श्रीनगर, बडगाम, शोपियां और कई अन्य जिलों में जाकर दर्जनों लोगों से बात की. इनमें दुकानदार, सरकारी मुलाजिम, ट्रांसपोर्टर्स और अन्य लोग शामिल हैं.

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