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Article 370 पर उलेमा बोर्ड पीएम मोदी के साथ, PoK को भारत में मिलाने के लिए मांगी 3 दिन की छूट

नई दिल्ली 20 अगस्त 2019 । जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 यानी Article 370 और Article 35A हटाने के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मुस्लिम संगठनों का भी साथ मिलने लगा है. ऑल इण्डिया उलेमा बोर्ड ने पीएम मोदी के इस कदम को ऐतिहासिक करार दिया है. खासकर ऐसे समय में जब जम्मू-कश्मीर मुद्दे ( kashmir Issue) को लेकर विपक्षी दल बंटे हुए हैं और वे केंद्र सरकार के इस कदम की आलोचना करने से परहेज नहीं कर रहे हैं. ऑल इण्डिया उलेमा बोर्ड (All India Ulema Board ) ने एक बयान में कहा है कि पकिस्तान और चीन की फितरत एक समान है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जम्मू-कश्मीर को लेकर जो कदम उठाए हैं वे देशहित में हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बैठक को संबोधित करते हुए

उलेमा बोर्ड के उपाध्यक्ष नूर उल्लाह युसूफ जई ने एक कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में कहा कि यदि उन्हें (मुस्लिमों को ) 3 दिन का वक्त दे दिया जाए तो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) को भी अपने हिस्से में जोड़ लिया जाएगा. पाक अधिकृत कश्मीर पर कब्जा करते हुए उसे भारत में जोड़ने का काम मुस्लिम समाज के लोगों के स्तर से ही किया जाएगा.

आर्टिकल 370 के तहत कश्मीर के लिए था विशेष प्रावधान

कश्मीर के 1948 में भारत में विलय के बाद से आर्टिकल 370 इस राज्य में लागू था, जो इस राज्य को स्वायत्तता का दर्जा देता था और इसके लिए विशेष प्रावधान था. इसे हटाने की मांग कई दशकों से उठती रही थी. दरअसल संविधान में आर्टिकल 370 के संशोधन की स्थिति पर साफ साफ कुछ नहीं कहा गया था. लिहाजा केंद्र सरकार ने इसी का लाभ उठाते हुए ये कदम उठाया है.

क्या है अनुच्छेद 35A?

-अनुच्छेद 35A से जम्मू-कश्मीर राज्य के लिए स्थायी नागरिकता के नियम और नागरिकों के अधिकार तय होते हैं.

-14 मई 1954 के पहले जो कश्मीर में बस गए थे वही स्थायी निवासी.

– स्थायी निवासियों को ही राज्य में जमीन खरीदने, सरकारी रोजगार हासिल करने और सरकारी योजनाओं में लाभ के लिए अधिकार मिले हैं.

-किसी दूसरे राज्य का निवासी जम्मू-कश्मीर में जाकर स्थायी निवासी के तौर पर न जमीन खरीद सकता है, ना राज्य सरकार उन्हें नौकरी दे सकती है.

-अगर जम्मू-कश्मीर की कोई महिला भारत के किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से शादी कर ले तो उसके अधिकार छिन जाते हैं, हालांकि पुरुषों के मामले में ये नियम अलग है.

आर्टिकल-370 हटने के बाद कैसे बदल गई कश्मीर की सियासी फिजा

नई दिल्ली-जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेश बनाने और आर्टिकल 370 हटाने के लगभग दो हफ्ते बाद ही वहां की बदली हुई सियासी फिजा को भी महसूस किया जाने लगा है। मौजूदा माहौल में यह स्पष्ट नजर आने लगा है कि कश्मीर की राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव होने जा रहा है। केंद्र सरकार के ऐतिहासिक झटके से उबरने के बाद घाटी में सक्रिय अलगाववादी और मुख्यधारा की पार्टियों के खेमों से जो संकेत मिल रहे हैं, उससे जाहिर है कि अब वे लोग अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर सोचना शुरू कर चुके हैं। अबतक घाटी की राजनीति में सक्रिय रहे दूसरी और तीसरी पीढ़ी के अलगाववादी नेता इस सच्चाई को स्वीकार करने लगे हैं कि हालात को स्वीकार करके आगे बढ़ने में ही कश्मीर की और उसके सियासतदानों की भलाई है।

घाटी में अबतक कैसी राजनीति चल रही थी?
पिछले 30 साल से कश्मीर घाटी हिंसक अलगाववाद और आतंकवाद झेलने को मजबूर थी। अलगाववादी भारतीय संविधान की संप्रभुता कबूलने को तैयार नहीं थे और भारत से अलगाव की बात कर रहे थे। कश्मीर की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी नेशनल कांफ्रेंस की राजनीति राज्य के लिए 1953 से पहले वाली स्वायत्तता की मांग पर टिकी थी। दूसरी बड़ी पार्टी पीडीपी की राजनीति नरम-अलगाववाद और धार्मिक कट्टरता के भरोसे चल रही थी। दूसरी छोटी पार्टियां भी इसी तरह की राजनीति करती रही थीं। इन पार्टियों ने समय-समय पर राष्ट्रीय पार्टियों के साथ तालमेल करके चुनाव भी लड़ा और सरकारें भी बनाईं। लेकिन, 5 अगस्त को केंद्र सरकार के फैसले ने सारी परिस्थितियों और राजनीतिक हालातों को ही बदल दिया और सबको नए सिरे से सोचने को मजबूर कर दिया है।

क्षेत्रीय दलों का सियासी एजेंडा बेमानी हुआ
टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक खबर के मुताबिक अब अलगाववादी हों या कश्मीर की मुख्यधारा की पार्टियों से जुड़े लोग, सब अंदरखाने यह मान रहें कि उनके लिए परिस्थितियां पूरी तरह से बदल चुकी है। क्षेत्रीय राजनीति में आने की चाहत रखने वाले एक युवा राजनीतिक कार्यकर्ता मुदासिर के अनुसार, “नई दिल्ली ने अब जम्मू और कश्मीर के बाकी भारत के साथ रिश्तों को लेकर सारी अस्पष्टता खत्म कर दी है। हम अब देश के बाकी हिस्से की ही तरह हैं, उस विशेष राज्य से अलग जिसका भविष्य भारत और पाकिस्तान के बीच अनिश्चित था। मामला सुलझ चुका है और यहां से पार्टियां अलगाववाद, नरम-अलगाववाद और स्वायत्ता की बजाय शासन के मुद्दों पर लड़ेंगी। कश्मीर में सभी क्षेत्रीय दलों का राजनीतिक एजेंडा आज बेमानी हो चुका है। “

अलगाववादियों का भी बदला अंदाज
ताज्जुब की बात ये है कि कश्मीर में आए बदलाव के दो हफ्ते बाद ही हुर्रियत के अंदरखाने से भी हालात को कबूल करने के संकेत उभर रहे हैं। हुर्रियत के भीतर के लोग बताते हैं कि उसकी युवा पीढ़ी अब मुख्यधारा में शामिल होना चाहती है। वह आगे कश्मीर को खून से लाल होते नहीं देखना चाहती। श्रीनगर के हजरतबल इलाके के एक अलगाववादी ने अपना नाम नहीं जाहिर होने की शर्त पर बताया “यह महसूस किया जाने लगा है कि पाकिस्तान और भारत दोनों की फंडिंग पर चले अलगाववाद से कश्मीरी समाज को मदद नहीं मिली है। रक्तपात से सबसे ज्यादा कश्मीरियों को ही नुकसान हुआ है, जबकि अलगाववादियों की टॉप लीडरशिप और उनके बच्चों ने ठाठ से जीवन गुजारा है। आज दूसरी और तीसरी पीढ़ी के अलगाववादी कश्मीर की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहेंगे।”

कैसी होगी अब्दुल्ला की नई राजनीति?
नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी की लीडरशिप के लिए आने वाला वक्त आसान नहीं रहने वाला लगता है। खासकर राज्य की सत्ता पर कई दशकों तक राज कर चुके अब्दुल्ला परिवार के लिए इस बदलाव को स्वीकार करना आसान नहीं है। नेशनल कांफ्रेंस के सूत्रों की मानें तो फारूक अब्दुल्ला बदले हालात में केंद्र शासित प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की लड़ाई लड़ना चाहते हैं, लेकिन उनके बेटे उमर अब्दुल्ला अभी इसके लिए तैयार नहीं लग रहे हैं। पार्टी के एक कार्यकर्ता के मुताबिक, “अब्दुल्ला परिवार के लिए नई सच्चाई को स्वीकार करना थोड़ा कठिन है। जम्मू और कश्मीर जैसे बड़े राज्य में उन्होंने जो राजनीतिक ताकत देखी है उसमें कटौती को कबूल करना उनके लिए आसान नहीं है। अब सभी क्षेत्रों पर कश्मीर का आधिपत्य समाप्त हो चुका है। ये अब्दुल्ला के लिए विशेष रूप से नुकसानदेह है। वे और कोई भी क्यों मुख्यमंत्री के अधिकारों में कटौती को स्वीकारने के लिए तैयार होगा? “

पीडीपी के लिए गेम ओवर!
पीडीपी की दिक्कत ये है कि जमात-ए-इस्लामी जैसी प्रतिबंधित पाकिस्तान परस्त संगठन के नेता जेल में जो पहले पार्टी को सक्रिय सहयोग देते रहे थे। पीडीपी चीफ महबूबा मुफ्ती के एक बेहद करीबी राजनेता ने बताया कि वो भी बदले हालातों में अपना विकल्प तलाश रही हैं। उसके अनुसार “पीडीपी के सत्ता तक पहुंचने में जमात का वोट ही मुख्य आधार रहा। लेकिन, अलगाववादियों और जमात पर हुई कार्रवाई के चलते पीडीपी खत्म हो चुकी है। आज की बात करें तो ऐसा लगता है कि पार्टी कई टुकड़ों में बंट जाएगी। पार्टी में बहुत कम ही लोग अब उनकी भारत-विरोधी राजनीति के साथ रहना भी चाहते हैं। सभी जानते हैं कि पुराना राजनीतिक खेल अब खत्म हो चुका है। “

कौन होगा बदले कश्मीर का नया किंगमेकर
कश्मीर की बदली हुई सियासी फिजा में नए लोगों और युवा पीढ़ी को मौका मिलने की उम्मीद है। इसमें उनकी अच्छी-खासी तादाद है जो पिछले दिनों में पंचायत चुनावों में कश्मीर की लोकल पॉलिटिक्स में सफलता पूर्वक उभरे हैं। एक ऐसे ही युवा स्थानीय नेता ने बताया है कि “बहुत सारे युवा, ऊर्जावान और प्रगतिशील कश्मीरी, जिन्होनें तब चुनाव लड़ा जब सबने बायकॉट कर दिया था, वे बहुत बड़ी ताकत बनकर उभरेंगे।” इन युवा नेता में आईएएस की नौकरी छोड़ने वाले शाह फैसल भी शामिल हैं, जिन्होंने अपनी एक राजनीतिक पार्टी भी बनाई हुई है। फैसल के एक नजदीकी दोस्त ने कहा भी है कि अब्दुल्ला और मुफ्ती की राजनीति के बाद बनी अनिश्चितता की स्थिति में उन्हें सबसे ज्यादा फायदा होने वाला है। उधर बीजेपी के सूत्र बता रहे हैं कि वह पीपुल्स कांफ्रेंस के सज्जाद लोन का समर्थन जुटाने की भी कोशिश कर सकती है, जो पहले भी मोदी सरकार का समर्थन कर चुके हैं।

whats happening in country ?

While we are so busy debating on 370 etc,  we miss to notice what’s happening to our country !!!

1 – Jet Airways closed
2 – Air India in Rs 7600 crore loss
3 – BSNL 54,000 jobs in danger
4 – No money to pay salary for HAL employees
5 – Postal departent loss of Rs 15000 crores
6 – 1 million to be laid off in Auto Industry
7 – 12.76 lakhs houses unsold in 30 major cities
8 – Aircel is dead
9 – JP Group finished
10 – Most profitable company in India – ONGC is now making losses
11 – 36 largest debtors missing from country.
12 – Rs 2.4 lakh crores loan waive off to a few corporates
13 – PNB continous losses.
14 – All banks incurring huge losses
15 – External debt on country 500+ Billion Dollars
16 – Railways on sale
17 – Rent Heritages including Red Fort
18 – Largest car maker Maruti cuts production
19 – Rs 55000 crores car inventory lying at factories, with no buyers.
20 – Builders all over stressed. Some committing Suicide, no buyers Construction Stopped due Mat cost rise (GST at 18% to 28%)
21 – OFB under corporatization affecting over 1.5 lac employee & families.
22 – Millions unemployed due to Demonetization
23 – Highest unemployment in 45 years.
24 – 5 airports sold to Adani.
25 – Highest domestic stagflation.
26 – Record HNI individuals leaving India
27 – Videocon bankrupt.
28 – Tata Docomo perished
29 – CCD founder VG Siddhartha Sucide due to huge debt

Note: Nothing is shown in media. It’s our duty to let all others know the real picture.

……….                                         ……..

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