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लोक संगीत की सुमधुर ध्वनियों के बीच शुरू होगा भगोरिया महोत्सव।

थांदला  3 मार्च 2020 । झाबुआ,आलीराजपुर अंचल का प्रमुख आदिवासी लोकपर्व भगोरिया इस वर्ष 3 मार्च से आरंभ होकर 9 मार्च तक चलेगा। वर्ष में एक बार मनाए जाने वाले इस पर्व के कारण हफ्तेभर तक क्षेत्र में उल्लास छाया रहता है। पर्व मनाने के लिए पलायन स्थलों से भी ग्रामीण बड़ी संख्या में अपने गांव लौटेंगे। लगभग चार दर्जन स्थानों पर भगोरिया मेला लगेगा। जिस दिन का संस्कृति प्रेमी बेसब्री से इंतजार करते है, वह पर्व अब निकट आ चुका है। आज 3 मार्च से यहां भगोरिया की धूम आरंभ हो जाएगी। इसमें मस्ती व उल्लास रहेगा तो आदिवासी संस्कृति की झलक भी नजर आएगी। पेट की आग बुझाने के लिए क्षेत्र की 60 प्रतिशत से अधिक जनता पलायन करती है। रोजगार की तलाश में दूर-दूर तक जाने वाले ग्रामीण जहां कहीं भी होंगे, भगोरिया की महक उन्हें अपने गांव लौटने के लिए वापस मजबूर करेगी। वार्षिक मेले भगोरिया की प्रमुख विशेषता यह है कि 7 दिनों तक लगातार यह चलता है। हर दिन कहीं न कहीं भगोरिया मेला रहता है। इन मेलों में गांव के गांव उमड़ पड़ते है। छोटे बच्चे से लेकर वृद्घ तक अनिवार्य रूप से इसमें सहभागिता करते है। ढोल, मांदल, बांसुरी जैसे वाद्य यंत्रों की मीठी ध्वनि और लोक संगीत के बीच जब भगोरिया मेले में सामूहिक नृत्य का दौर चलता है तो चारों ओर उल्लास ही उल्लास बिखर जाता है। साथ ही होती है झूला-चकरी की मस्ती व पान तथा अन्य व्यंजनों की भरमार। चाहे जितने जीवन में संघर्ष हो लेकिन सब कुछ भूलकर हर ग्रामीण भगोरिया की मस्ती में डूबा दिखाई पड़ता है। रियासत काल से चल रही महुए की मादक महक , ताड़ी का सुरूर , टेसू की रंगीनियाँ अनायास ही अपने वतन आने को मजबूर कर देती है. अब ना महुआ की शराब पीने वाले बचे है ना अपनी संस्कृति को ज़िंदा रखने वाले . आधुनिकता के रंग में सरोबार युवतियाँ ब्यूटी पार्लर की दीवानी हो गई तो युवकों ने जीन्स , टी शर्ट और सस्ती व्हिस्की और बीयर के जहरीले मिश्रण में खुद को डुबो रखा है . इस पर्व में अब मांदल , ढोल , थाली , केंद्री जैसे वाद्य साधन बहुत सीमित हो गए है . रही सही कसर बाहर से आने वाले मीडिया बंधुओ ने इस संस्कृति को बदनाम कर दिया . इसे प्रणय पर्व , वेलेंटाईन डे के नाम से बहु प्रचारित कर रहे है . आदिवासी बालाओं को गुलाल लगाओ और पान खिला कर भगा ले जाओ पर ही मीडिया ने अपना ध्यान केन्द्रित किया हुआ है . जो पूर्णतया गलत होकर इनकी संस्कृति को विकृत रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. इन पर प्रतिबंध लगाना चाहिए . धुलेंडी के सात दिन पहले से यह पर्व आरंभ हो जाता है। रियासत काल से ही यह पारंपारिक त्योहार यहां चल रहा है। पर्व को लेकर अलग-अलग इतिहास भी बताए जाते है। कुछ इतिहासकार कहते है कि ग्राम भगोर से यह पर्व आरंभ हुआ, इसलिए इसका नाम भगोरिया पड़ गया। कुछ लोगों का मानना है कि होली के पूर्व लगने वाले हाटों को गुलालिया हाट कहा जाता था। इसमें खूब गुलाल उड़ती थी। बाद में होली के पूर्व मनाए जाने वाले इन साप्ताहिक हाटों को भगोरिया कहा जाने लगा। मान्यता चाहे जो हो, लेकिन मैदानी हकीकत यह है कि यह वार्षिक पर्व अपनी संस्कृति की सुगंध हमेशा से चारो ओर बिखेर रहा है। झाबुआ-आलीराजपुर जिले के भगोरिया पर्व 3 मार्च : बखतगढ़, आम्बुआ, अंधारवड़, पिटोल, खरड़ू, थांदला, तारखेड़ी और बरवेट। 4 मार्च : चांदपुर, बरझर, बोरी, उमरकोट, माछलिया, करवड़, बोरायता, कल्याणपुरा, खट्टाली, मदरानी और ढेकल। 5 मार्च : फुलमाल, सोंडवा, जोबट, पारा, हरिनगर, सारंगी, समोई और चैनपुरा। 6 मार्च : कठ्ठीवाड़ा, वालपुर, उदयगढ़, भगोर, बेकल्दा, मांडली और कालीदेवी। 7 मार्च : मेघनगर, रानापुर, नानपुर, उमराली, बामनिया, झकनावदा और बलेड़ी। 8 मार्च : झाबुआ, छकतला, सोरवा, आमखूंट, झीरण, ढोलियावाड़, रायपुरिया, काकनवानी, कनवाड़ा और कुलवट। 9 मार्च : आलीराजपुर, आजादनगर, पेटलावद, रंभापुर, मोहनकोट, कुंदनपुर, रजला, बडगुड़ा और मेड़वा। आलीराजपुर के भगोरिया 3 मार्च : बखतगढ़, आम्बुआ, — मंगलवार 4 मार्च : चांदपुर, बरझर, बोरी, — बुधवार 5 मार्च : फुलमाल, सोंडवा, जोबट,— गुरूवार 6 मार्च : कठ्ठीवाड़ा, वालपुर, उदयगढ़, — शुक्रवार 7 मार्च : नानपुर, उमराली — शनिवार 8 मार्च : झाबुआ, छकतला, सोरवा, आमखूंट, झीरण, कनवाड़ा और कुलवट। — रविवार 9 मार्च : आलीराजपुर, आजादनगर, — सोमवार (होलिका दहन दिवस )

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