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मध्य प्रदेश में भाजपा-कांग्रेस के मिशन 2023, असंतुष्ट नेताओं पर नजर रखकर दबाव की राजनीति शुरू

भोपाल 23 अप्रैल 2022 । मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव में भले ही सवा एक साल से ज्यादा का समय है लेकिन मिशन 2023 के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख दल की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। असंतुष्टों पर नजर रखते हुए दोनों ही दल एक-दूसरे पर दबाव बनाने की राजनीति अपनाने लगे हैं। दो दिन से इस पर सियासत तेजी से चल रही है। विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव, इनके पहले जोड़-तोड़ की राजनीति तेजी से चलती है। असंतुष्टों पर दलों की नजर रहती है और इन्हें राजनीतिक माहौल बनाने के लिए मौके पर ही सदस्यता दिलाई जाती है। अमित शाह के भोपाल दौरे से इस राजनीति पर सियासत शुरू हो गई है और असंतुष्टों को लाने के लिए कुछ चुनावों से प्रमुख भूमिका निभा रहे भाजपा के मंत्री भूपेंद्र सिंह के बयान से इसमें गर्माहट आई है। भूपेंद्र सिंह ने शुक्रवार को कहा था कि कांग्रेस के कई विधायक और बड़े नेता भाजपा के संपर्क में हैं। जब मौका आएगा तो वे उन्हें पार्टी में ले लिया जाएगा। इसका आज कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने पलटवार किया है जिसमें उन्होंने कहा है कि कई भाजपा नेता उनके भी संपर्क में हैं। सही समय पर उनका फैसला लिया जाएगा।

पिछले चुनावों में कैसे बदला माहौल
गौरतलब है कि पिछले चुनावों के पहले असंतुष्टों के इधर-उधर होने से भाजपा और कांग्रेस ने माहौल को बदला था। पिछले कुछ लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा ने कांग्रेस को बड़े झटके दिए थे जिससे भागीरथ प्रसाद व उदयप्रताप सिंह जैसे नेताओं ने बाजी पलटी थी। इसी तरह खंडवा लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस के विधायक सचिन बिरला ने मंच पर कांग्रेस से दामन तोड़ लिया था। वहीं, विधानसभा चुनावों में भी भाजपा सांसद व पूर्व मंत्री सरताज सिंह ने कांग्रेस का दामन थाम लिया था लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में जाते ही सरताज सिंह फिर भाजपा में चले गए थे। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साले संजय सिंह ने भी विधानसभा चुनाव 2018 के ठीक पहले कांग्रेस का दामन थाम लिया था। पूर्व मंत्री संजय पाठक भी इसी तरह कांग्रेस का साथ छोड़ गए थे तो चौधरी राकेश सिंह की नाराजगी का भी भाजपा ने फायदा उठाते हुए उन्हें अपने साथ ले लिया था। मगर चौधरी राकेश सिंह बाद में ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रयासों से विधानसभा चुनाव के पास कांग्रेस में लौट आए थे लेकिन उनके भाजपा में जाते ही चौधरी के मुखर विरोधी अजय सिंह की वजह से काफी समय तक उनकी सदस्यता पर सवाल खड़े होते रहे।

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