मुख्य पृष्ठ >> प्रदेश >> मध्यप्रदेश >> उज्जैन / भोपाल >> नेता प्रतिपक्ष छोड़ भाजपा ने शुरू किया विधानसभा अध्यक्ष पर मंथन

नेता प्रतिपक्ष छोड़ भाजपा ने शुरू किया विधानसभा अध्यक्ष पर मंथन

भोपाल 31 दिसंबर 2018 । मध्य प्रदेश में चौथी बार सरकार बनाने में नाकाम हुई भाजपा अब विधानसभा अध्यक्ष के लिए अपना उम्मीदवार खड़ा करने के मूड में हैं। सूत्रों के मुताबिक संघ ने भी पार्टी को इस बारे में हरी झंडी दी है। बीजेपी के पास 109 विधायक हैं, वहीं कांग्रेस के पास 114 विधायकों की संख्या है, जबकि उसे बाहर से अन्य पार्टियों के विधायकों का समर्थन प्राप्त है। हालांकि, पार्टी की ओर से इस बारे में कोई आधिकारिक ऐलान अभी नहीं किया गया है। लेकिन ऐसे संकेत मिलते हुए दिखाई दे रहे है, अगर बीजेपी ऐसा करती है तो कांग्रेस के लिए परेशानी हो सकती है।ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि सियासी दांवपेच में कौनसी पार्टी बाजी मारती है।

दरअसल, 15 सालों बाद कांग्रेस सरकार बनाने में कामयाब हो गई है और मुख्यमंत्री के साथ मंत्रिमंडल का भी विस्तार हो चुका है। सभी मंत्रियों को विभाग भी बांटे जा चुके है और अब बस विधानसभा और उपाध्यक्ष का फैसला होना है। चुंकी 7 जनवरी से विधानसभा का का पहला सत्र शुरु होने जा रहा है, ऐसे में कांग्रेस की गुटबाजी और अंदरुनी खींचतान का फायदा उठाकर भाजपा अध्यक्ष पद के लिए अपना उम्मीदवार खड़ा करने की तैयारी में है, क्योंकि विधायकों की संख्या में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। भाजपा के कई वरिष्ठ विधायकों ने भी संघ को यह सुझाव दिया है। हालांकि भाजपा की तरफ से कौन उम्मीदवार होगा, यह अभी तय नहीं है।वही इस खबर के कांग्रेस में हड़कंप मच गया है।अगर भाजपा अपनी तरफ से कोई उम्मीदवार खड़ा करती है तो वह कांग्रेस के लिए चुनौती साबित हो सकता है। फिलहाल कांग्रेस की ओर से विधानसभा अध्यक्ष के लिए सीनियर एनपी प्रजापति का नाम आगे चल रहा है। हालांकि इस पर अभी अंतिम मुहर लगना बाकी है।

*ऐसे समझे गणित*
अगर सदन के मौजूदा सियासी गणित की बात करें तो कांग्रेस के खुद के 114 विधायक सदन में हैं। सपा के 1, बसपा के 2 और चार निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सदन में सरकार के पक्ष में कुल विधायकों की संख्या 121 है, वहीं बीजेपी 109 विधायकों के साथ विधानसभा में विपक्ष में मौजूद है।जिस तरह कांग्रेस के अंदर और उसको समर्थन देने वाले पार्टियों और निर्दलीय विधायकों में खींचतान मची हुई है, उससे कांग्रेस के लिए विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव जीतना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।
*नेता प्रतिपक्ष का मामला अटका*
वही दूसरी तरफ भाजपा ने नेता प्रतिपक्ष का फैसला अभी टाल दिया है। भाजपा संगठन की मानें तो वह ब्राह्मण वर्ग से किसी नेता को नेता प्रतिपक्ष की कमान सौंपना चाहता है। इस वर्ग में नरोत्तम मिश्रा और गोपाल भार्गव दो बड़े नाम हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी यही सोच है कि नेता प्रतिपक्ष की कमान अगड़ी जाति को सौंपी जाए।इस वजह से भाजपा का एक वर्ग पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को नेता प्रतिपक्ष नहीं बनाना चाहता है।हालांकि भाजपा में नेता प्रतिपक्ष पद के लिए भी कई दावेदार हैं। माना जा रहा है कि नेता प्रतिपक्ष पद का निर्णय भाजपा फिलहाल टाल सकती है और पहले सत्र में नेता प्रतिपक्ष के बिना ही कांग्रेस को घेरने की तैयारी करेगी।
*ऐसे चुना जाता है विधानसभा स्पीकर*
जब भी किसी प्रदेश में चुनाव होते हैं और नई सरकार बनती है तो विधानसभा में सबसे पहला काम होता है अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चयन। आमतौर पर सत्ताधारी पार्टी या गठबंधन का कोई विधायक ही स्पीकर होता है। सबसे वरिष्ठ सदस्य को स्पीकर चुना जाता है और ध्वनिमत से विधायक अपनी स्वीकृति देते हैं। स्पीकर का काम विधानसभा की कार्रवाई को संचालित करना है। वह संविधान के नियमों के मुताबिक सदन संचालित करता है। जब स्पीकर मौजूद नहीं होता है तो उपाध्यक्ष सदन संचालित करता है। सभी सदस्य स्पीकर का सम्मान करते हैं और उनकी हर बात ध्यान से सुनते हैं। स्पीकर अगली सरकार के बनने तक इस पद पर रहता है। स्पीकर को पद से हटाने के लिए सदन में प्रस्ताव लाना होता है। इसके लिए 14 दिन पूर्व ही नोटिस दिए जाने का नियम है।

नेता प्रतिपक्ष और विधानसभा उपाध्यक्ष पद के लिए सियासत तेज

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में डेढ़ दशक बाद सत्ता से बेदखल हुई भाजपा में अब नेता प्रतिपक्ष और विधानसभा उपाध्यक्ष पद को लेकर सियासत तेज हो गई है। पार्टी का प्रदेश संगठन इस मुद्दे पर मौन है, संसदीय दल और विधायक दल की बैठक में इसका फैसला होगा। दोनों ही पद के लिए दिल्ली की हरी झंडी का इंतजार किया जा रहा है।

मध्यप्रदेश विधानसभा का सत्र 7 जनवरी से शुरू होना है, इसलिए नेता प्रतिपक्ष और विधानसभा उपाध्यक्ष के चयन को लेकर संभावित दावेदार अपनी लॉबिंग में जुट गए हैं। इन दोनों पदों के अलावा भाजपा संगठन द्वारा विधानसभा अध्यक्ष पद के लिए भी अपना प्रत्याशी उतारने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। इसके पीछे पार्टी का तर्क है कि इस बहाने कांग्रेस के बहुमत संबंधी दावे का विधानसभा के फ्लोर पर अपने आप ही परीक्षण हो जाएगा। विस अध्यक्ष पद के चुनाव में भाजपा प्रत्याशी को मैदान में उतारने से नुकसान कुछ भी नहीं होगा, लेकिन इससे सत्तापक्ष को परेशान करने का एक मौका भाजपा को मिल जाएगा।

शेयर करें :

इसे भी पढ़ें...

ये तो छोड़कर चले गए थे…अशोक गहलोत ने सचिन पायलट गुट के विधायकों पर कसा तंज

नयी दिल्ली 4 दिसंबर 2021 । अशोक गहलोत और सचिन पायलट राजस्थान कांग्रेस में सबकुछ अच्छा …