मुख्य पृष्ठ >> प्रदेश >> मध्यप्रदेश >> उज्जैन / भोपाल >> भाजपा के सांसदों की हालत खराब, मध्यप्रदेश में बदलेंगे 18 चेहरे

भाजपा के सांसदों की हालत खराब, मध्यप्रदेश में बदलेंगे 18 चेहरे

भोपाल 12 फरवरी 2019 । तीन राज्यों में मिली करारी हार के बाद भाजपा अब फूंक—फूंक कर कदम रखना चाह रही है। लेकिन उसकी मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। यही कारण है कि जब उसने अपने सांसदों की परफार्मेंस को जानने की कोशिश की तो उसके होश ही उड़ गए। अकेले मध्यप्रदेश में 18 सांसद ऐसे सामने आए हैं, जिनको दोबारा टिकट देने पर हार का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि इन सांसदों में नरेंद्र सिंह तोमर का नाम शामिल नहीं है। लेकिन माना जा रहा है कि ग्वालियर लोकसभा सीट पर उनको भी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। यहां पर विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा को काफी सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है। ऐसे में भाजपा के लिए राह आसान नहीं है।

भाजपा की 20 सीटें जीतने की कोशिश
पिछले दिनों भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने एक निजी कंपनी के जरिए सर्वे कराया है, जिसमें सामने आया है कि मध्यप्रदेश में उसके 18 सांसदों की स्थिति खराब है। अभी मध्यप्रदेश में भाजपा के 26 सांसद हैं, जबकि कांग्रेस के पास तीन सांसद ही हैं। दिल्ली में सत्ता में दोबारा काबिज होने के लिए भाजपा अपने गढ़ मध्यप्रदेश को कमजोर होते हुए नहीं देखना चाहती है। विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद भी यहां पर संभावनाएं देखी जा रही हैं, भाजपा के अंदरखाने कोशिश हो रही है कि यहां पर कम से कम 20 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की जाए। यही वजह है कि पहले उत्तर प्रदेश के मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह को चुनाव प्रभार दिया गया और अब उनके अलावा अनिल जैन को भी मध्यप्रदेश का जिम्मा दिया गया है। अनिल जैन को अमितशाह का करीबी माना जाता है और अब स्वतंत्रदेव सिंह उनको रिपोर्ट करेंगे। कुल मिलाकर कोशिश है कि मध्यप्रदेश में ज्यादा से ज्यादा करीबी से प्रत्याशियों का चयन हो, जिससे जीत हासिल करने में मदद मिले।

इन पैमानों पर जांचा गया सांसदों का काम
सांसदों के काम का सर्वे करने के दौरान देखा गया कि उनकी स्थानीय लोगों के बीच में स्वीकार्यता कितनी है। उन्होंने अपने गोद लिए गांवों में कितना काम किया है। वहां पर उनका प्रभाव बढ़ा है या फिर कम हुआ है। इसके साथ ही सांसदों के प्रभाव को भाजपा कार्यकर्ताओं के भी भीतर भी देखा गया है। यही वजह है कि कई जगहों पर प्रभावशाली चेहरों के भी टिकट काटने पर बात हो रही है। प्रहलाद पटेल और नरेंद्र सिंह तोमर को भले ही अभी पार्टी ने सुरक्षित की श्रेणी में रखा हो लेकिन अंदरखाने इनकी सीटों को बदलने पर विचार किया जा रहा है। प्रहलाद पटेल को दमोह से मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है।

जबकि नरेंद्र सिंह तोमर ग्वालियर—चंबल में मुश्किल में हैं। हालांकि पार्टी का एक धड़ा उन्हें ग्वालियर—चंबल में ही रखना चाह रहा है, उसका कारण साफ है कि अगर नरेंद्र सिंह इलाका छोड़कर जाते हैं तो उसका प्रभाव इलाके की चारों सीटों पर दिखाई देगा। ऐसे में भाजपा अब हर इलाके में एक बड़े नेता को मैदान में उतारने की रणनीति पर काम कर रही है। फिलवक्त तो अभी 18 सांसदों के लिए मुश्किलें साफ देखी जा रही हैं, जिनकी रिपोर्ट सही नहीं आई है। माना जा रहा है कि इन्हें पार्टी दोबारा मौका नहीं देगी।

वोटों का अंतर हरा रहा 10 सीटें
अगर विधानसभा चुनाव में मिले वोटों की बात करें तो वह भी कांग्रेस को तकरीबन 12 सीटों पर जीत दर्ज कर रहा है। ऐसे में भाजपा सीधे नौ सीटें हारती हुई नजर आ रही है। लेकिन अगर आंकड़ों को देखते हैं तो कांग्रेस की गुना—अशोकनगर सीट पर भाजपा का वोट प्रतिशत ज्यादा है। ऐसे में भाजपा अपनी जीती हुई सीटों में से करीब 10 सीटों पर सीधे हार देख रही है।

इन सांसदों पर मुश्किल हाल

मुरैना सांसद अनूप मिश्रा
मुरैना—श्योपुर लोकसभा सीट पर भाजपा को विधानसभा चुनावों के दौरान भारी नुकसान झेलना पड़ा है। मुरैना की सभी सीटों पर उसे हार का सामना करना पड़ा है। एट्रोसिटी एक्ट यहां पर बड़ा मुद्दा है, ऐसे में अनुप मिश्रा का लगातार क्षेत्र से दूरी भी एक मसला बनकर खड़ा हुआ है। इसके साथ ही अभी भितरवार सीट पर मिली हार के बाद उनका दावा भी कमजोर हुआ है।

भिंड सांसद भागीरथ प्रसाद
कांग्रेस के प्र्त्याशी घोषित होने के बाद पार्टी छोड़कर पिछले चुनाव में भाजपा में शामिल हुए। चुनाव जीते, लेकिन क्षेत्र से लगातार दूरी होने के कारण स्थानीय विरोध बना हुआ है। भाजपा कार्यकर्ता ही विरोध कर रहे हैं। उनकी एलीट छवि ने पार्टी को यहां पर नुकसान पहुंचाया।

सागर से लक्ष्मीनारायण यादव
खुद के बेटे को सुरखी सीट से नहीं जिता पाए। इसके साथ ही क्षेत्र में निष्क्रियता भी एक बड़ा मुद्दा है। ऐसे में यहां पर चेहरा बदलना तय है। स्थानीय कार्यकर्ता भी इनका विरोध कर रहे हैं।

टीकमगढ़ से वीरेंद्र खटीक
केंद्र सरकार में मंत्री होने के बाद भी क्षेत्र में कोई विकास नहीं कर सके। लो प्रोफाइल नेता होने के बाद भी स्थानीय लोगों को उपलब्ध नहीं होते हैं। क्षेत्र में सक्रियता का अभाव है। यही कारण है कि बुंदेलखंड के लोगों में सांसद को लेकर नाराजगी है।

खजुराहो से नागेंद्र सिंह
नागेंद्र सिंह अभी हाल में हुए विधानसभा चुनावों में विधायक बनकर वापस विधानसभा पहुंच गए हैं। ऐसे में उनकी टिकट की दावेदारी कमजोर मानी जा रही है। लेकिन जो रिपोर्ट आई है, उसमें नागेंद्र सिंह की हालत भी स्थानीय लोगों में खराब आई है। सर्वे के मुताबिक नागेंद्र सिंह अपनी लोकसभा सीट में कमजोर प्रत्याशी बनकर उभरेंगे।

सतना से गणेश सिंह
स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी। लोगों से दूरी सबसे बड़ी वजह

सीधी से रीति पाठक
हाई—प्रोफाइल स्टाइल सबसे बड़ी वजह, जिसके चलते कार्यकर्ताओं से दूरी हो गई है। स्थानीय लोगों का विरोध भी एक बड़ा कारण।

शहडोल से ज्ञान सिंह
भाजपा पर दबाव बनाकर उपचुनाव में सांसद बने थे। सांसद बनने को लेकर मन से तैयार नहीं थे और यही वजह रही कि इन्होंने इलाके में काम नहीं किया और उसका नुकसान यह है कि इनकी दावेदारी कमजोर हो गई है और स्थानीय स्तर पर इनका समर्थन कम हुआ है।

मंडला से फग्गन सिंह कुलस्ते
आदिवासी चेहरा, लेकिन बड़े नेता होने के बाद भी काम नहीं करना मुश्किल बन रहा है। भोपाल से लेकर दिल्ली तक पहुंच होने के बाद भी इलाके में इसका प्रभाव नहीं दिखा पाए।

बालाघाट से बोध सिंह भगत
कमलनाथ का इलाका, यहां पर कभी बोध सिंह मजबूत नेता के तौर पर जाने जाते थे, लेकिन अबकी दफा उनकी जमीन खिसकती नजर आ रही है। उन्हें स्थानीय विरोध के चलते कमजोर उम्मीदवार के तौर पर देखा जा रहा है।

राजगढ़ से रोडमल सिंह नागर
इस सीट पर कांग्रेस की ओर से दिग्विजय सिंह के परिवार से कोई उम्मीदवार मैदान में उतरेगा। ऐसे में नागर कमजोर प्रत्याशी के तौर पर देखे जा रहे हैं। यही वजह है कि पार्टी इनके टिकट काटने पर विचार कर रही है।

देवास से मनोहर उंटवाल
विधायक का चुनाव जीतकर किनारे हो गए हैं। लेकिन पूरी लोकसभा सीट पर भाजपा को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है। ऐसे में पार्टी इनके नाम को किनारे करने पर विचार कर रही है। नए चेहरे की तलाश हो रही है।

उज्जैन से चिंतामणि मालवीय
भाजपा के बड़बोले सांसद हैं। लेकिन स्थानीय स्तर पर कमजोर होती पकड़ के चलते पार्टी की पसंद से उतरते नजर आ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर गुटीय राजनीति में फंसकर कमजोर हुए हैं।

मंदसौर से सुधीर गुप्ता
पहली बार टिकट मिला, मीनाक्षी नटराजन को हराकर लोकसभा के भीतर आए। लेकिन उसके बाद इलाके में पकड़ बनाने में कमजोर साबित हुए। स्थानीय विरोध एक बड़ी वजह।

धार से सावित्री ठाकुर
भाजपा को स्थानीय स्तर पर नुकसान झेलना पड़ा है। सांसद का प्रभाव कमजोर हुआ है। पहली बार सांसद बनी थीं लेकिन उस प्रभाव को बरकरार रखने में कामयाब नहीं रहीं।

भोपाल से आलोक संजर
भोपाल जैसी सुरक्षित सीट से सांसद बने थे। इस बार गुटीय संतुलन के चलते कमजोर हुए हैं। पूरी संसदीय सीट पर प्रभाव छोड़ने में कामयाब नहीं रहे।

बैतूल से ज्योति धुर्वे
काम से ज्यादा विवादों में रहीं, जिसके चलते प्रभाव कमजोर हुआ है। स्थानीय स्तर पर संगठन और कार्यकर्ताओं से दूरी भी एक बड़ी वजह है।

खंडवा से नंदकुमार सिंह चौहान
पूर्व प्रदेश अध्यक्ष होने के बाद भी स्थानीय गुटीय राजनीति को पोषण देने के कारण अब खुद ही कमजोर नजर आ रहे हैं। पार्टी मानकर चल रही है कि वापस टिकट देने से दूसरे लोग ही भितरघात करेंगे, ऐसे में पार्टी को नुकसान होगा।

शेयर करें :

इसे भी पढ़ें...

फतह मुबारक हो मुसलमानो, भारत के खिलाफ जीत इस्लाम की जीत…जश्न मनाने के बदले जहर उगलने लगा पाक

नई दिल्ली 25 अक्टूबर 2021 । खराब बल्लेबाजी और खराब गेंदबाजी की वजह से टीम …