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‘बंद शाहीन बाग’ से BJP खोलना चाहती है ‘जीत का रास्ता’

नई दिल्ली 24 जनवरी 2020 । दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस ने अभी तक किसी को भी मुख्यमंत्री पद का दावेदार नहीं घोषित किया है. दूसरी ओर दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में आम आदमी पार्टी बार भी पहले जैसा ‘करिश्मा’ करने की जुगत में है. कई मूलभूत सुविधाएं जैसे बिजली, पानी को मुफ्त देने की योजनाओं के बूते आम आदमी पार्टी को मैदान में मजबूती से खड़ा रखा है. दूसरी ओर बीजेपी ने भी एक बड़े चुनावी प्रचार की रूप रेखा तय की है जिसमें करीब कई छोटी-बड़ी रैलियां शामिल हैं. बीजेपी ने स्टार प्रचारकों की लिस्ट भी जारी की है जिसमें पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा शामिल हैं. जेपी नड्डा अपने कार्यकर्ताओं से कहते हैं कि दिल्ली का चुनाव पहले कागज पर उतारो फिर जमीन पर उतरेगा. इसीलिए भाजपा युवा मोर्चा को जिम, कोचिंग, अखाड़ा, लाइब्रेरी में संपर्क तेज करने को कहा है और बड़े नेताओं को हर गली नुक्कड़ पर उतारने की तैयारी है. क्या मुद्दों से जूझ रही है BJP
लेकिन पूरे चुनाव में बीजेपी मुद्दों से जूझती नजर आ रही है. इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली में आयोजित रैली के दौरान गृहमंत्री अमित शाह कहते हैं कि विधानसभा में भी पीएम मोदी को ही बड़ा चेहरा बताया. तो दूसरी एक बीजेपी सांसद और प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी को कहते सुना गया कि जितना केजरीवाल सरकार ने दिया है उससे 5 गुना ज्यादा ही देंगे. वहीं उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली में बीजेपी सरकार आने पर दी जा रही मुफ्त योजनाएं बंद नहीं की जाएंगी. कुल मिलाकर पार्टी नेताओं के बयानों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बीजेपी को अभी तक केजरीवाल सरकार की ओर दी जा रही मुफ्त योजनाओं की काट नहीं मिल पाई है.

‘शाहीन बाग’ से है क्यों उम्मीद
बीजेपी की कोशिश है कि नागरिकता कानून के विरोध में चल धरने के जरिए वोटों का ध्रुवीकरण किया जाए. इसका अंदाजा बीजेपी नेता और विधानसभा चुनाव प्रत्याशी कपिल मिश्रा के बयान से अंदाजा लगाया जा सकता है. कपिल मिश्रा ट्विटर पर कहते हैं, ‘AAP और कांग्रेस ने शाहीन बाग जैसे मिनी पाकिस्तान खड़े किए हैं. जवाब में 8 फरवरी को हिंदुस्तान खड़ा होगा. जब जब देशद्रोही भारत मे पाकिस्तान खड़ा करेंगे. तब तब देशभक्तों का हिंदुस्तान खड़ा होगा.’ बीजेपी को अंदाजा है कि नागरिकता कानून और एनआरसी के मुद्दे पर जितना विरोध बढ़ेगा, चुनाव में उसे फायदा हो सकता है.

बंद ‘शाहीन बाग’ से जीत का रास्ता खोलने की कोशिश
दूसरी ओर बीजेपी की पूरी रणनीति है कि शाहीन बाग में चल रहे प्रदर्शन के चलते सरिता विहार और कालिंदी कुंज का वाला रास्ता बंद है, वह चुनाव तक यथास्थिति में बना रहे क्योंकि इससे उस इलाके में रहने वालों का भी गुस्सा बढ़ रहा है और वे इसके लिए प्रदर्शन कर चुके हैं. इसके साथ ही इसे खुलवाने के लिए स्थानीय लोग आंदोलन की भी तैयारी में है. दूसरी ओर यह रास्ता बंद होने से दिल्ली-नोएडा को जोड़ने वाले एक और रास्ते डीएनडी पर भी लंबा जाम देखने को मिल रहा है. जिससे लोगों का गुस्सा बढ़ रहा है. हाईकोर्ट ने भी दिल्ली पुलिस से मामला के देखने के लिए कहा है लेकिन ऐसा लग रहा है कि दिल्ली पुलिस भी फिलहाल इंतजार कर रही है.

पवन वर्मा के बाद क्या अब प्रशांत किशोर को बाहर का रास्ता दिखाएंगे नीतीश कुमार? जानें क्या हैं सियासी समीकरण

बिहार के मुख्यमंत्री और JDU अध्यक्ष नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने उम्मीद के मुताबिक पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन वर्मा (Pawan Verma) को दो टूक शब्दों में कह दिया कि जहां उन्हें अच्छा लगे वहां चले जाएं. इसके बाद अब राजनीतिक अटकलें इस बात को लेकर शुरू हो गई हैं कि प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) को वह पार्टी से बाहर का रास्ता कब दिखाएंगे? लेकिन उस घड़ी और उसके सही समय को लेकर उत्सुक नेताओं का कहना है कि वह समय नीतीश कुमार के अनुरूप होगा. जैसे पार्टी में शामिल करने का दिन उन्होंने खुद तय किया था, विदाई की भी तारीख वह अपनी सुविधा के अनुसार तय करेंगे. सवाल है कि नीतीश कुमार पवन वर्मा और प्रशांत किशोर सरीखे बिना जनाधार वाले नेताओं से पीछा क्यों छुड़ाना चाहते हैं? इसका सीधा जवाब यही है कि जिस दिन प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक मस्तिष्क से निकाल दी, उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया. हालांकि उन्हें मालूम था कि इसका सीधा असर उनकी राजनीतिक पूंजी, जो उनकी धर्मनिरपेक्ष नेता की छवि है, पर पड़ेगा. उसी तरह अब वह एक बार फिर भाजपा के सहयोग से बिहार का मुख्यमंत्री निर्वाचित होना चाहते हैं. इसे लेकर इस वर्ष में वे ऐसा कोई विवाद नहीं चाहते, जिसका असर उनके चुनाव पर पड़े. नीतीश कुमार को लगता है कि एक ऐसे समय में जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने एक नहीं तीन-तीन बार केवल अपनी पार्टी के बयानवीर नेताओं को शांत कराने के लिए ये घोषणा कर दी कि विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ा जाएगा. इसके बाद उनकी तरफ से भाजपा के किसी नीति सिद्धांत से संबंधित कोई आलोचना करने वाले बयान या ट्वीट नहीं होना चाहिए. इसके अलावा नीतीश कुमार का अपना आकलन है कि जब भाजपा और रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी उनके साथ है और सामने तेजस्वी यादव हैं तब उन्हें न तो पवन वर्मा के अंग्रेजी चैनल में भागीदारी और न प्रशांत किशोर के चुनावी नुस्खों की कोई जरूरत है. इसके समर्थन में वे अपने सिपहसालारों को लोकसभा का प्रचार और परिणाम दिखाते हैं, जब उन्होंने प्रशांत किशोर को हाशिये पर रखकर 40 लोकसभा सीटों में से 39 सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की थी. हालांकि इस जीत को लेकर भाजपा अभी भी मानती है कि ये नरेंद्र मोदी का चुनाव था और वोट भी उनके नाम पर डाले गए थे. लेकिन नीतीश को फिलहाल भाजपा का साथ पसंद है, क्योंकि वह राजद के साथ सरकार चलाने के दौरान कटु अनुभव को आज तक नहीं भूले हैं. ऐसा नहीं है कि भाजपा उन्हें माथे पर बिठाकर रखती है, जैसे बाढ़ राहत मदद में भी बिहार को बहुत कम राशि केंद्र से मिली. इसके अलावा केंद्र बिहार के अधिकांश योजनाओं को खारिज कर देता है, लेकिन फिलहाल नीतीश इन सब चीजों को तूल नहीं देना चाहते. यही कारण है कि नीतीश कुमार नागरिकता कानून हो या एनपीआर, इन पर हो रहे विरोध के बावजूद भाजपा की आलोचना में कुछ नहीं बोलेंगे. उन्हें मालूम है कि भाजपा के नए नागरिक कानून और एनपीआर के बाद मुस्लिम समाज उनसे नाराज़ है और शायद विधानसभा में वोट मिलना मुश्किल हैं. पसमांदा वोट बैंक जो उन्होंने बनाया उस पर भाजपा के एक निर्णय से सब कुछ ज़ीरो हो गया, लेकिन साथ-साथ समाज में हिंदू ध्रुवीकरण से उन्हें अपनी नैया पार होने में कोई दिक्कत नहीं लगती. इसलिए मुस्लिम लोगों पर भाजपा से संबंधित संगठन के लोग गोली चलाते हैं और ज़िंदा व्यक्ति को जला देते हैं, जैसा सीतामढ़ी में दो साल पूर्व या फुलवारीशरीफ़ में पिछले महीने हुआ, नीतीश ऐसी घटनाओं को रफा दफा करने में ज़्यादा विश्वास रखते हैं. इसलिए प्रशांत किशोर को भी मालूम है जिस दिन नीतीश अपने मनमुताबिक भाजपा से सीटों का समझौता करने में कामयाब होंगे, उसके 24 घंटे के अंदर पार्टी की कार्यकारिणी का गठन कर उन्हें जिन्हें उन्होंने भविष्य माना था उसे बिहार की राजनीति से बाहर फेंकने में देर नहीं करेंगे. नीतीश जानते हैं उनके इस कदम से भाजपा और उनके अपने कैबिनेट के लोगों को सबसे ज़्यादा खुशी होगी. नीतीश कुमार का ये अपना चुनावी साल है, इसलिए वह किसी भी हद तक BJP के साथ-साथ सुर ताल के साथ कदम ताल भी मिलाकर चलना चाहते हैं.

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