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क्या जल्द ही अमित शाह की जगह शिवराज सिंह चौहान ले सकते हैं?

भोपाल 20 दिसंबर 2018 । मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के शपथ ग्रहण समारोह में सबसे ज्यादा चर्चा पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की रही. तेरह साल तक मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बने रहने के बाद जिस अदा के साथ उन्होंने अपनी कुर्सी छोड़ी उसे भाजपा के अंदर और बाहर बेहद पसंद किया गया. शपथ ग्रहण समारोह में जिस आत्मीयता के साथ उन्होंने राहुल गांधी से हाथ मिलाया और कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया का हाथ ऊंचा किया उसकी उम्मीद कांग्रेस के धुरंधर नेताओं तक को नहीं थी. इसलिए शिवराज सिंह चौहान की तारीफ कश्मीर के उमर अब्दुल्ला से लेकर मुंबई के मिलिंद देवड़ा तक सभी ने की.

भोपाल में जो हुआ उसका गहरा असर दिल्ली में भी महसूस किया रहा है. भाजपा और संघ में एक खेमा ऐसा है जो 2019 के चुनाव से पहले शिवराज सिंह को दिल्ली लाना चाहता है. सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि भाजपा में एक विकल्प की चर्चा भी अंदरखाने चल रही है. इस चर्चा की धुरी में मूलत: तीन प्रकार के लोग हैं. पहले, संघ के वे नेता और पदाधिकारी जो नरेंद्र मोदी और अमित शाह को सर्वशक्तिमान होने से रोकना चाहते हैं और भाजपा में ‘पावर बैलेंस’ करने की वकालत करते हैं. दूसरे, भाजपा के वे नेता जो लालकृष्ण आडवाणी के करीबी थे और बाद में सुषमा स्वराज को उनकी उत्तराधिकारी मानने लगे. तीसरे, वे पत्रकार जो भाजपा से संबंध रखते हैं या रखना चाहते हैं लेकिन इस वक्त के दिल्ली दरबार में ऐसा संभव नहीं है. संघ से जुड़े एक नेता बताते हैं कि भाजपा की सबसे ताकतवर कमेटी संसदीय बोर्ड में दिल्ली की राजनीति करने वाले नेताओं के अलावा सिर्फ शिवराज सिंह चौहान ही ऐसे हैं जिनका अपना जनाधार है. ऐसे में वे भी खुद को दिल्ली से ज्यादा दूर नहीं रख पाएंगे.

तीन राज्यों में चुनाव हारने के बाद संघ के नेतृत्व की तरफ से सरकार के शीर्ष नेतृत्व तक एक बात पहुंचाए जाने की भी खबर है. संघ के कुछ बड़े अधिकारी चाहते हैं कि ऐसा नहीं दिखना चाहिए कि भाजपा में सिर्फ दो नेताओं की ही चलती है. इन्हीं नेता ने कुछ पत्रकारों को बताया, ‘भाजपा पूरे देश की पार्टी है सिर्फ गुजरात की नहीं. इसलिए गुजरात से मोदी-शाह के अलावा, मध्य प्रदेश से शिवराज सिंह, उत्तर प्रदेश से राजनाथ सिंह-योगी आदित्यनाथ, राजस्थान से वसुंधरा राजे जैसे नेताओं की एक कोर टीम दिखनी चाहिए.’

विधानसभा चुनाव में हुई हार की शुरुआती समीक्षा से एक बात निकलकर सामने आई हैं. भाजपा और संघ दोनों ही ये मानते हैं कि ये चुनाव लहर वाला चुनाव नहीं था. इस वक्त देश में न मोदी लहर है और न मोदी विरोध की लहर. अलग-अलग सीटों पर अलग-अलग मुद्दे और उम्मीदवारों के आधार पर चुनाव लड़ा गया. भोपाल में बैठने वाले एक पत्रकार बताते हैं कि मध्य प्रदेश में एक नहीं 230 चुनाव हुए, और यहां हर सीट का अपना-अपना समीकरण बैठा.

2019 के बारे में संघ की अपनी ग्राउंड रिपोर्ट भी एक महत्वपूर्ण बात कहती है. संघ के एक प्रचारक बताते हैं, ‘इस वक्त परिवार के अंदर भी मत विभाजन है. अगर पति-पत्नी एक पार्टी को वोट देते हैं तो बेटा-बेटी दूसरी पार्टी को. इसलिए बहुत जरूरी है कि अगले चुनाव से पहले परिवारों को जोड़ने का सूत्र तैयार हो जाए.

ऐसे में संघ को लगता है कि अब सिर्फ किसी लहर और हिंदू कार्ड भरोसे रहने से काम नहीं चलेगा. जहां तक हिंदू कार्ड की बात है तो इसे राहुल गांधी अब भाजपा से ज्यादा अच्छे तरीके से चल रहे हैं. वे खुद को जनेऊधारी ब्राह्मण कहने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं. इसलिए संघ एक नई सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले को बनाने में जुटा है. राहुल गांधी जनेऊधारी ब्राह्मण हैं तो भाजपा को एक ऐसा नेतृत्व तैयार करना है जो पिछड़ी जाति का हो. नरेंद्र मोदी पिछड़ी जाति के हैं ही और संघ को लगता है कि अगर भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी पिछड़ी जाति से हो तो यह रामबाण राम मंदिर से ज्यादा कारगर साबित हो सकता है. इसलिए संघ ने अंदरखाने ही सही शिवराज को अमित शाह की कुर्सी पर बिठाने की बात छेड़ दी है.

शिवराज सिंह चौहान भी फिलहाल कमलनाथ की सरकार को गिराने या अस्थिर करने के झंझट में नहीं पड़ना चाहते. उनके करीबी एक अफसर ने भोपाल में कुछ प्रभावशाली लोगों को बताया कि येदियुरप्पा जैसी कोशिश वे नहीं करेंगे क्योंकि उनकी उम्र भले येदियुरप्पा से कम है लेकिन मुख्यमंत्री पद का अनुभव उनसे कहीं ज्यादा है.

शिवराज सिंह चौहान के पक्ष में तीन बातें हैं जिनसे उम्मीद बनती है कि वे अगले कुछ महीनों में भाजपा में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. पहली, वे पिछड़ी जाति के लोकप्रिय नेता हैं. नरेंद्र मोदी के अलावा भाजपा के ज्यादातर पिछड़ी जाति के नेता मास लीडर नहीं माने जाते. इसलिए भाजपा में नरेंद्र मोदी- अमित शाह की जोड़ी की जगह संघ मोदी-शिवराज की जोड़ी को फिट करना चाहता है.

दूसरी बात, शिवराज सिंह हिंदी भाषी राज्य के नेता हैं जो भाजपा का कोर वोट बैंक है. अगर शिवराज खुलकर केंद्रीय नेतृत्व में आएंगे तो इसका असर मध्य प्रदेश के अलावा उत्तर प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र तक हो सकता है. तीसरी बात यह कि मोदी-शाह की जोड़ी के बारे में संघ को बार-बार यह शिकायत मिलती है कि यह जोड़ी मैनेजमेंट में ‘मास्टर’ है लेकिन अपने हों या विरोधी इनसे मेल-जोल बनाए रखने में ‘डिजास्टर’ हैं. संघ के एक सूत्र बताते हैं कि न चाहते हुए भी भाजपा की छवि एक ऐसी पार्टी की हो गई है जो दो लोगों के इर्द-गिर्द घूम रही है. अगर 2019 से पहले संवादहीनता की यह स्थिति बदली नहीं गई तो इससे बड़ा नुकसान हो सकता है.

इसके उलट शिवराज सिंह चौहान की ताकत ही संवाद स्थापित करना है. उन्हें नाराज़ होते हुए लोगों ने देखा ही नहीं. अपने हों या विरोधी, गांव हो या शहर, शिवराज भीड़ में आम बन जाते हैं. आम लोगों से सीधा रिश्ता जोड़ना, बहन-भाई, मामा-भांजा-भांजी जैसे संबंध बोलचाल में ले आना, शिवराज की सबसे बड़ी खासियत है. उनकी ऐसी ही कुछ खासियतों के चलते संघ के एक नेता ने हाल ही में भाजपा के एक नेता से कहा था – हालात ऐसे बन रहे हैं जिनमें नरेंद्र मोदी को अमित शाह से ज्यादा शिवराज सिंह चौहान की जरूरत पड़ने वाली है.’

शिवराज अचानक क्यों पहुंचे दिग्विजय के घर
आमतौर पर राजनीति में अक्सर यह देखने में आता है कि लोग अपने नेताओं के लिए आपस में भिड़ जाते हैं, लेकिन राजनीति में इससे इतर भी तस्वीर कहीं देखने को मिलती है। राजनीति के बारे में वैसे भी कहा जाता है कि यहां समाज के सामने ज़रूर पांचों अंगुलियां अलग होती हैं, लेकिन बंद कमरे में वे सभी एक हो जाती हैं।

कुछ ऐसा ही इन दिनों मध्यप्रदेश की राजनीति में देखने को मिल रहा है। यहां राजनीतिक शिष्टाचार की मिसाल रोज देखने को मिल रही है। चुनाव के दौरान जिन नेताओं ने एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाए थे, चुनाव संपन्न होने के बाद अब वे ही नेता एक-दूसरे से गलबहियां कर रहे हैं और खूब ठहाके भी लगा रहे हैं। नेता इस बात की मिसाल पेश कर रहे हैं कि राजधर्म को इस तरह से भी निभाया जा सकता है।

प्रदेश में विधानसभा चुनाव संपन्न होने के बाद ही सियासत की तस्वीर भी अब आकर्षक लगने लगी है। सबसे पहले भोपाल में कांग्रेस विधायक आरिफ अकील पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले पर पहुंचे और उनकी खैर खबर पूछी।

इसके बाद कमलनाथ के शपथग्रहण समारोह में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से कुछ इस तरह से मिले कि जैसे दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि मित्र हों।

वहीं कमलनाथ की शपथ के बाद प्रदेश के सामने जो तस्वीर आई, वह भी कुछ इसी तरह की थी। इसमें सिंधिया, शिवराज और कमलनाथ तीनों ने ही हाथ पकड़कर एक मजबूत राजनीति का संदेश दिया।

राजनीति में एक अभूतपूर्व मिसाल इस मंगलवार भी देखने को मिली। जब दो पूर्व मुख्यमंत्री आपस में मिले, बल्कि इसके साथ ही उन्होंने आम लोगों के लिए भी एक बड़ा संदेश छोड़ा।

प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मंगलवार सुबह पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के निवास पर पहुंचे और उनसे मुलाकात की। इस दौरान दोनों की दोस्ती एक बार फिर सार्वजनिक रूप से जाहिर हुई। वहीं शाम होते-होते पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह के घर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान भी जा पहुंचे। यहां दिग्विजयसिंह ने शिवराज का जोरदार स्वागत किया। वहीं उनके पुत्र जयवर्धन सिंह ने उनके पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया।

कुल मिलाकर राजनीति को आम लोग जिस चश्मे से देखते हैं, उसकी असली कहानी कुछ ऐसी ही होती है। यदि देश में राजनीति को प्रतिपादित किया जाए तो किसी भी तरह के मनमुटाव को छोड़कर विकास की राहें बेहद ही आसान हो सकती हैं। वहीं आम लोगों को भी अपनी आंखों से सियासत की इस दुर्लभ तस्वीर का दीद करना चाहिए। ताकि समाज में एक सकारात्मक संदेश जा सके।

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