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क्या महिला रख सकती है विवाहेतर संबंध…

नई दिल्ली 4 अगस्त 2018 । एडल्ट्री पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही बहस को लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा, ‘क्या आप चाहते हैं कि हम कहें कि महिला को विवाह से बाहर संबंध रखने का मूल अधिकार है.’ इस पर जस्टिस नरीमन ने बात को थोड़ा स्पष्ट करते हुए कहा, ‘मुझे लगता है कि इस तर्क से एडवोकेट का मतलब अनुच्छेद 21 के अंतर्गत ‘गरिमा के अधिकार’ (Right to Dignity) से है.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने बीच में कहा, ‘कल्पना कीजिए कि एक महिला के साथ गाली-गलौज की जाती है, उसे पीटा जाता है और प्रताड़ित किया जाता है और महिला पति को तलाक नहीं देना चाहती. इस तरह के तमाम मामले हैं. यह हमारे समाज की कड़वी सच्चाई है. तो क्या महिला को ये अधिकार नहीं होना चाहिए कि वो किसी दूसरे पुरुष के साथ जीवन भर के लिए कुछ शांति पा सके.’

खास बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट में एडल्ट्री की वैधता को लेकर हो रही बहस में पांचों जजों के विचार अलग-अलग थे. सारे जजों के विचार विवाहित महिला की ‘सेक्शुअल स्वायत्तता’ (Sexual Autonomy) को लेकर काफी अलग थे. सीजेआई और जस्टिस खानविलकर के साथ-साथ जस्टिस कलीश्वरम राज और जस्टिस सुनील फर्नांडीज ने वकील से कहा कि ‘सेक्शुअल स्वायत्तता’ और महिला के द्वारा ‘चुनने के अधिकार’ ( Right to Choice) के बीच स्पष्ट रूप से अंतर करें.

बेंच ने कहा, ‘विवाह की संस्था पर चोट न पहुंचाएं. ये मत भूलें कि एडल्ट्री भी तलाक लेने का आधार है.’ यूएस कोर्ट का उदाहरण देने पर उन्होंने वकीलों को रोका और कहा कि हमारे ‘वैल्यूज़’ अलग हैं.

हालांकि जस्टिस नरीमन और जस्टिस चंद्रचूड़ ने ‘सेक्शुअल स्वायत्तता’ (सेक्शुअल अटॉनमी) को लेकर दूसरा नज़रिया पेश किया. जस्टिस फर्नांडीज़ ने कहा कि अगर एडल्ट्री को अपराध घोषित किया जाता है तो इससे महिला के ‘गरिमा के अधिकार’ (Right to Dignity) को ठेस पहुंचेगा. हालांकि सीजेआई ने इस बात से सहमति नहीं जताई.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने इस पर दूसरा विचार दिया. उन्होंने कहा, “क्या आपके विवाहित होने मात्र से आपकी ‘सेक्शुअल स्वायत्तता’ खत्म हो जाती है. नहीं. विवाहित होने के बावजूद भी आपको ‘न’ कहने का अधिकार है. अगर आपके पास ‘न’ कहने का अधिकार नहीं है तो इससे आपकी ‘सेक्शुअल स्वायत्तता’ प्रभावित होती है.”

जस्टिस नरीमन ने कहा कि विवाह का महिला के ‘चुनने के अधिकार’ और महिला के ‘गरिमा के अधिकार’ से कुछ लेना-देना नहीं है. हालांकि जस्टिस नरीमन और जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि उनके विचारों को गलत तरीके से नहीं लिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा, “अगर हम एडल्ट्री को अपराध की श्रेणी से हटा देते हैं तो इसका ये मतलब नहीं है कि हम युवा महिला और पुरुषों को कुछ भी करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं. चूंकि एडल्ट्री के आधार पर तलाक लिया जा सकता है इसलिए यह एक तरह का ‘युक्तिसंगत रोक’ भी होगा क्योंकि इस आधार पर तलाक लिया जा सकता है.”

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, ‘ये सारी चीज़ें हमारे समाज में हो रही हैं, इसलिए बेहतर है कि हम इस बात को समझें और अपने कानून को उसी तरह से बनाएं.’ पांच जजों की बेंच में एकमात्र महिला जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने इस बारे में कोई विचार नहीं रखा.

गुरुवार को इस मामले पर सुनवाई हुई थी पर कोई भी हल नहीं निकला था. बता दें कि आईपीसी की धारा 497 एडल्ट्री के आधार पर केवल पुरुष को ही अपराधी मानती है. इसमें महिला को दोषी नहीं माना जाता जबकि पुरुष को 5 साल तक की सज़ा हो सकती है. जोसेफ शाइन की याचिका पर संवैधानिक पीठ आईपीसी के धारा 497 पर विचार कर रही है.

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