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मंत्री नहीं मुख्यमंत्री का प्रतिनिधित्व है उज्जैन के पास, डॉ जोशी शैडो मुख्यमंत्री के रूप में देखेंगे काम

उज्जैन  26 दिसंबर 2018 । चुनाव का शंखनाद भाजपा हो या कांग्रेस दोनों ही राजनीतिक दल ने उज्जैन शहर से किया था लेकिन सरकार कांग्रेस की बनते ही उज्जैन शहर को नजरअंदाज कर दिया गया। इसके पीछे क्या कारण है इनको समझना जरूरी है। एक वजह तो स्पष्ट नजर आती है वह यह कि उज्जैन शहर कि दोनों विधानसभाओं से कांग्रेस के जीत के लिए जतन सफल नहीं हुए। 25 वर्षों के इतिहास पर निगाह फेरी जाए तो सिर्फ एक बार उज्जैन उत्तर से कांग्रेस सफल हुई है यही स्थिति दक्षिण विधानसभा की भी रही है। लेकिन एक बार और गौर फरमाने की है कि भले ही उज्जैन शहर को मंत्रालय में स्थान कांग्रेस की सरकार में ना मिले हो लेकिन उज्जैन को शैडो मुख्यमंत्री के रूप में कांग्रेस के नेता अवश्य मिले हैं यह बात अलग है कि शैडो मुख्यमंत्री का पावर होने के बावजूद भी इन नेताओं ने शहर का कभी भला नहीं किया यही वजह है कि कांग्रेस उज्जैन शहर में हमेशा हाशिए पर ही रही है।
प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के मंत्री मंडल में 28 विधायकों को मंत्री पद की शपथ राजभवन में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल द्वारा दिलाई गई। श्रीनाथ के मंत्रिमंडल में यूं तो मालवा क्षेत्र से करीब 9 विधायकों को मंत्री पद से नवाजा गया किंतु मालवा की हृदय स्थली उज्जैन को दरकिनार किया गया जबकि इस चुनाव में उज्जैन जिले की 7 विधानसभाओं में से चार पर कांग्रेस के विधायक निर्वाचित हुए हैं जिनमें दो विधायक पूर्व में भी विधायक रहे है और उन्हें पर्याप्त अनुभव भी है ऐसे में दोनों विधायकों की अनदेखी करना समझ से परे है।
इस संबंध में कुछ कांग्रेसी नेताओं से जब इस प्रतिनिधि ने अनौपचारिक चर्चा की तो जो जवाब कांग्रेसी नेताओं ने दिया वह भी बड़ा रोचक था। कांग्रेसी नेताओं ने कहा कि 15 वर्ष पूर्व दिग्गी राजा मुख्यमंत्री थे कब उनके करीबी रहे महावीर प्रसाद वशिष्ट शैडो मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश में पहचाने जाते थे अबकी बार कमल नाथ मुख्यमंत्री है और उनके करीबी बटुक शंकर जोशी शैडो मुख्यमंत्री की भूमिका में रहेंगे यही वजह है कि उज्जैन के विधायक रामलाल मालवीय और दिलीप गुर्जर को श्रीनाथ ने अपने मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी।

श्रीनाथ ने कांग्रेस भवन में कैबिनेट की बैठक ली
मुख्य मंत्री कमलनाथ में शपथ विधि समारोह संपन्न होने के बाद शाम को कैबिनेट की बैठक भोपाल स्थित कांग्रेस भवन में ली बैठक में मुख्यमंत्री श्री नाथ के साथ पूर्व मुख्यमंत्री दिग्गी राजा भी विशेष रूप से उपस्थित थे। बैठक में सरकार की आगामी कार्य योजनाओं पर विचार विमर्श किया गया।

इस बार चुनाव में स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से कांग्रेस की सरकार निर्दलीय के समर्थन पर टिकी हुई है सरकार के गठन में ऐसी संभावना थी कि निर्दलीय विधायकों को मंत्री पद से नवाजा जाएगा किंतु किसी भी निर्दलीय और बसपा और सपा के विधायकों को मंत्री पद की शपथ नहीं दिलवाई गई जिसके परिणाम स्वरूप सातों को विधायक भोपाल में मौजूद होने के बावजूद राजभवन में आयोजित शपथ विधि समारोह में शामिल नहीं हुए। इससे ऐसा लगता है कि अल्पमत की सरकार पर कभी भी संकट गहरा सकता है। हालांकि श्रीनाथ के द्वारा नाराज हुए विधायकों को मनाने के लिए अपने दूत भेजकर बातचीत के प्रयास किए गए हैं अब देखना यह है कि बातचीत कितनी सफल रही है।

भाजपाः चेहरे पर चिंता की लकीरों में इज़ाफा..?

दिनोंदिन बढ़ते हुए चिंता भरे माहौल में देश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी व सरकार के नेतृत्व ने आत्मचिंतन शुरू तो किया और अपनी पूर्ववर्ती गलतियों को सुधारने की कौशिशें भी शुरू की, लेकिन जैसे जैसे दवा शुरू की, असंतोष का रोग बढ़ता ही नजर आ रहा है। आज देश की सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी भारतीय जनता पार्टी अपनी सत्ता के सिर्फ पचपन महीनों में उस अग्निपरीक्षा के दौर से गुजरने को मजबूर है, जिसकी किसी को भी सपने में भी कल्पना नहीं थी, कथित मजबूत इरादों वाली पार्टी के इरादें देश की असंतुष्टि के खतरनाक मोड़ पर खड़े रहने को मजबूर है, भाजपा के तीन राज्यों के मजबूत गढ़ों के ध्वस्त होने के बाद अब पार्टी में बाहरी और अंदरूनी असंतोष बढ़ता जा रहा है। सरकार ने अपने इस सत्ता काल में जो किया (नोटबंदी, जीएसटी) उससे देश नाराज है और जो नहीं कर पाए (राममंदिर निर्माण) उसने अपने लोग नाराज है। अभी तक भाजपा के अपनों संघ, विहिप, आदि की नाराजी उनके राममंदिर निर्माण के सपनों को ध्वस्त होते महसूस होने के कारण हो रही थी, किंतु अब पार्टी की केन्द्रीय सत्ता व संगठन से जुड़े दिग्गज किसी भी बहाने पार्टी के नेतृत्व पर निशाना साधन में पीछे नहीं हर रहे है, जिसका ताजा उदाहरण पांच राज्यों में भाजपा की हार को लेकर पूर्व भाजपाध्यक्ष और वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री नीतिन गड़कारी द्वारा सत्ता व संगठन के शीर्ष नेतृत्वों पर निशाना साधना है। वास्तविकता तो यह है कि देश की सत्ता व सत्ताधारी दल की कमान केवल दो शख्सियतों के हाथों मेें कैद होकर रह गई है, अब न तो भाजपा पर संघ का कोई वर्चस्व है और सत्ता पर किसी अन्य का नियंत्रण। इसीलिए अब सत्ता व संगठन में स्वेच्छाचारिता का साम्राज्य हो गया है, जिसे विपक्षी दलों के नेता ‘तानाशाही’ नाम दे रहे है, फिर ‘‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’’ की तर्ज पर आए दिन फैसले भी ऐसे लिए जा रहे है, जो देश के आम लोगों की नाराजी के अग्निकुंड में घी का काम कर रहे है, जिसका ताजा उदाहरण देशभर के कम्प्यूटरों पर चंद खूफिया एजेंसियों की निगरानी। देश का आम आदमी या आम वोटर वैसे ही नोटबंदी, जीएसटी, दलित आरक्षण, चुनावी वादों की जुमलों में बदलने तथा मंहगाई जैसे मुद्दों को लेकर मौजूदा सरकारी नेतृत्व व सत्तारूढ़ दल से नाराज था, जिसके दर्शन हालही में सम्पन्न पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों में हो गए, किंतु इसके बाद भी ऐसे निराशाजनक माहौल से किसी ने कोई सीख ली हो, ऐसा लगता नहीं है, बल्कि कुछ मामलों में तो स्वेच्छाचरिता में बढ़ोत्तरी हो नजर आ रही है। फिर सबसे अह्म बात यह भी है कि केन्द्र में सत्तारूढ़ सरकार व संगठन के प्रति नाराजी के बीच देश में जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव निकट आते जा रहे है, वैसे-वैसे भाजपा के अपनों के साथ गैरों की भी चुनौतियां रंग दिखाने लगी है, गैर भाजपाई दल जहां एक जुट होते नजर आ रहे है और महागठबंधन बनाने को आतुर है, वहीं सत्तारूढ़ गठबंधन के सदस्य बिखराव की कगार पर खड़े हो गए है और भाजपा को उन्हें समेट कर रखने के असफल प्रयासों से जुझना पड़ रहा है। यद्यपि भाजपा का यह सौभाग्य है कि उसकी मुख्यमंत्रीद्वन्दी कांग्रेस जनता की नाराजी का उतना राजनीतिक लाभ नहीं उठा पाई है, जितनाा उसका अभी तक का इतिहास रहा है, किंतु यह भी सही है कि भाजपा के तीन अह्म राज्यों पर कब्जा करना अपने आपमें कम उपलब्धि नहीं है, जिसने भाजपा के चिंतित चेहरे पर चिंता की लकीरों में इजाफा कर दिया है, और इसी बड़े राजनीतिक झटके का परिणाम है कि केन्द्रीय सरकार को अपने आत्मघाती फैसलों (जैसे जीएसटी) में संशोधन करने को मजबूर होना पड़ा। अब जहां तक भाजपा के अपनों की नाराजी का सवाल है, उसका केन्द्र बिन्दु राम मंदिर निर्माण है, संघ सहित सभी हिन्दूवादी संगठनों की कल्पना थी कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद राममंदिर निर्माण का सपना पूरा होने से कोई नहीं रोक पाएगा, किंतु अब जैसे जैस भाजपा का सत्ता काल पूर्णता के निकट पहुंच रहा है और उसके भविष्य की संभावना धुमिल होती नजर आने लगी है, वैसे-वैसे भाजपा के अपनों (संघ, विहिप व अन्य संगठनों) की बैचेनी नाराजी में परिवर्तित होती जा रही है, और सभी अपने एक स्वर से संसद के शीतकालीन सत्र में ही अध्यादेश के माध्यम से कानून की मांग करने लगे है और सुप्रीम कोर्ट से कई बार चांेटिल सत्तारूढ़ दल फिर एक बार सर्वोच्च न्यायालय की नाराजी सहन करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। इस तरह कुल मिलाकर इन दिनों देश के आम परेशानी भरें माहौल में राजनीतिक परिदृष्य भी किसी के भी कोई खास अनुकूल नजर नहीं आ रहा है, और इस तरह हर आम और खास परेशानी भरे माहौल में जीने को मजबूर है।

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