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चार लाख करोड़ डॉलर की इकोनॉमी बन रहा है भारत

नई दिल्ली 27 मई 2019 । भारतीय अर्थव्यवस्था इस वक्त एक बेहद दिलचस्प मोड़ पर है। इकोनॉमी अभी-अभी इस दशक की शुरुआत में पैदा हुई तमाम दिक्कतों के दौर से उबरी है।

असामान्य क्रेडिट ग्रोथ और उसके चलते खड़े हुए गैर-मुनाफे वाले प्रोजेक्ट्स ने एनपीए या नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स या डूबे हुए कर्ज की एक बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी थी। एनपीए की इस समस्या से अब तकरीबन निपटा जा चुका है। साथ ही कॉरपोरेट बैंकों का प्रोविजनिंग का साइकल भी अब अपने अंत की ओर है।दूसरी ओर, पूरा सिस्टम बड़े रेगुलेटरी बदलावों के दौर से भी गुजर रहा है।

जीएसटी और इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, एफडीआई के लिए ऑटोमेटिक रूट, सबके लिए बिजली, हर नागरिक तक बैंकिंग सेवाएं पहुंचाने, टैक्स-टू-जीडीपी रेशियो में सुधार करने, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (डीएफसी) पूरा करने में तेजी लाने, ट्रांसपोर्टेशन पॉलिसी में बदलाव करने जैसे कई रिफॉर्म इस दौरान हुए हैं। इससे इकोनॉमी में अगले चरण की तेजी की जमीन तैयार हुई है।

अगर हम इन सभी बदलावों के संभावित असर का विश्लेषण करें तो मोटे तौर पर तीन तरह के निवेश के मौके उभरते हुए नजर आते हैं।

1. कई तरह की अड़चनें खत्म हुई हैं

2. वैल्यू एडिशन

3. नए ट्रेंड्स अपनाना

अड़चनें खत्म होना

जीएसटी और अच्छी सड़क और रेल कनेक्टिविटी के चलते कारोबार की रफ्तार बढ़ी है। यानी कि प्लानिंग से प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन के साइकिल में आश्चर्यजनक रूप से सुधार आया है। इससे लॉजिस्टिक्स का खर्चा कम हुआ है, संसाधनों का ज्यादा बेहतर इस्तेमाल मुमकिन हो पाया है और साथ ही इनवेंटरी का भी प्रबंधन सुधरा है। इसके चलते कई कंपनियों को लागत के मोर्चे पर फायदा हो सकता है। इससे इन कंपनियों के मुनाफे में भी बड़ा उछाल आना तय है।

मिसाल के तौर पर, किसी राज्य की सीमाओं से गुजरने से पहले ट्रकों को घंटों इंतजार करना पड़ता था। जीएसटी आने के बाद से माल की एक राज्य से दूसरे राज्य में ढुलाई में रफ्तार आई है। लंबी दूरी तय करने वाले ट्रक औसतन एक दिन में अब 300 से 325 किमी तक चल लेते हैं, जबकि पहले यह आंकड़ा करीब 225 किमी रोजाना का था। हालांकि, यह एक बड़ा सुधार है, लेकिन हम इस मामले में ग्लोबल मानकों से अभी भी पीछे हैं। इससे कई तरह के फायदे हो रहे हैं।

लॉजिस्टिक्स प्रोवाइडरों की मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर में ही कैपेसिटी बढ़ी है क्योंकि वे उसी फ्लीट में ज्यादा माल की ढुलाई कर पा रहे हैं। टायर मैन्युफैक्चरर्स को यह फायदा हो रहा है कि उनके टीबीआई टायर्स की मांग बढ़ी है क्योंकि ट्रक हर दिन ज्यादा किलोमीटर चल रहे हैं और टायरों को पहले के मुकाबले जल्दी बदलना पड़ रहा है।

आसान शब्दों में इसे ऐसे समझा जा सकता है- अगर हम यह मानकर चलें कि किसी ट्रक के टायर 1 लाख किमी चलने के बाद बदलने पड़ते हैं। अब अगर ट्रक हर रोज 100 किमी ज्यादा चल रहा है तो टायर बदलने की जरूरत पहले के 15 महीने की बजाय 10 महीने पर पड़ेगी।

प्रोडक्ट मैन्युफैक्चरर्स को रॉ मैटेरियल और फिनिश्ड सामान की कम इनवेंटरी अपने पास रखनी होगी क्योंकि डिलीवरी स्पीड में सुधार आया है। इस तरह से कम वर्किंग कैपिटल, कम लेबर और कम स्टोरेज स्पेस प्रति यूनिट का फायदा इन कंपनियों को मिल रहा है।

कारोबार की राह में मौजूद अड़चनें दूर करने का यह महज एक उदाहरण है। ऐसे ही जबरदस्त मौके कोल माइनिंग, उर्वरक, रेलवे मैन्युफैक्चरिंग में पैदा हुए हैं क्योंकि रेगुलेटरी अड़चनें बड़े पैमाने पर खत्म हुई हैं।

वैल्यू एडिशन

बड़े आकार के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था में खपत और उत्पादन दोनों बड़े वॉल्यूम में होते हैं। बड़े घरेलू मार्केट के चलते कंपनियां बड़े पैमाने पर उत्पादन कर अपनी लागत को प्रतिस्पर्धी स्तर पर बनाए रख सकती हैं। इससे निर्यात की संभावनाएं भी पैदा होती हैं।

हर साल देश में करीब 1.8 करोड़ दुपहिया वाहनों की बिक्री होती है। इस तरह से हम दुनिया के सबसे बड़े दुपहिया बाजार हैं। अगर हम प्रति 1000 लोगों पर दुपहिया वाहनों की उपलब्धता देखें तो शहरी इलाकों में यह आंकड़ा काफी बड़ा है। साथ ही, पब्लिक ट्रांसपोर्ट में भी सुधार आने की उम्मीद है क्योंकि अगले एक दशक के भीतर देश के करीब 50 शहरों में मेट्रो का जाल बिछ चुका होगा।

दुपहिया वाहनों के वॉल्यूम्स में हमें सुस्ती दिखाई दे सकती है। अब यह कारोबार सस्ती और ज्यादा माइलेज देने वाली बाइक्स से हटकर प्रीमियम बाइक्स की ओर बढ़ रहा है। इस तरह से महंगे उत्पादों से मोटरसाइकल मैन्युफैक्चरर्स का भविष्य शक्ल लेगा।

भारत का घरेलू टूरिज्म, हाउसिंग सुधार, अपैरल कंजम्पशन, एग्री कमोडिटीज ऐसे दूसरे इलाके हैं जहां ऊंचे वॉल्यूम्स पर काम होता है। इनमें कंपनियों के आगे बढ़ने की अपार गुंजाइश है।

नए ट्रेंड्स को अपनाना

शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों में कंजम्पशन पैटर्न में कई बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। उच्च गुणवत्ता वाली बिजली तक पहुंच और पाइप्ड गैस या सिलेंडर गैस की उपलब्धता से हर भारतीय किचन के तौर-तरीकों में बदलाव आ रहा है।

बाहर खाने-पीने का चलन अब केवल मेट्रो तक ही सीमित नहीं रहा। स्विगी और जोमैटो जैसे ऐप्स के चलते फूड की होम डिलीवरी सर्विस छोटे शहरों तक पहुंच चुकी है। हालांकि, इस कारोबार में हिस्सा लेने के लिए इनवेस्टर्स के पास ज्यादा बड़े मौके नहीं हैं। ऐसे में टिश्यू पेपर्स, बासमती चावल जैसे आइटमों में पैसा लगाना उनके लिए ज्यादा फायदेमंद हो सकता है।

जैसे-जैसे हम एक चार लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की ओर आगे बढ़ रहे हैं, यह प्रक्रिया पहले के मुकाबले काफी अलग दिखाई दे रही है। कम रेटिंग वाले सेक्टरों की वापसी हो रही है क्योंकि कैपेसिटी बढ़ रही है और रेगुलेटरी परेशानियां खत्म हुई हैं। साथ ही, हम जैसे ही 2,000 डॉलर प्रति व्यक्ति आय से ऊपर उठेंगे हमें कई सारी नई कंपनियां आगे बढ़ती दिखाई देंगी।

मुनाफे वाले स्टॉक पकड़ने में बॉटम अप एप्रोच और हर कंपनी की गहराई से पड़ताल शामिल होती है। हालांकि, लंबे वक्त चल चलने वाली थीम्स को पकड़ने के लिए सजग रहना भी जरूरी है। अलग-थलग रहकर, बाहरी माहौल को जाने बिना पैसा लगाना महंगा साबित हो सकता है, खासतौर पर ऐसे वक्त पर जबकि मार्केट आधारित कई बड़ी उथल-पुथल चल रही हों और रेगुलेटरी बदलावों का दौर जारी हो।

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