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विवाहेतर संबंध अपराध नहीं:धारा 497 को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया

नई दिल्ली 28 सितम्बर 2018 । विवाहेतर संबंधों के मामले में केवल पुरुष को दोषी मानने वाली IPC की धारा 497 को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने व्यभिचार के लिए केवल पुरुष को दोषी ठहराने वाली धारा की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के बाद फैसला सुनाया।मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने आठ अगस्त को इस पर फैसला सुरक्षित रखा था।मामले में जस्टिस आरएफ नरीमन, एएम खानविलकर, डीवाई चंद्रचूड़ और इंदु मल्होत्रा की पीठ समान रूप से धारा 497 को रद्द कर दिया है।फैसला सुनाते हुए चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, एएम खानविलकर और आरएफ नरीमन ने अपना फैसला सुनाते हुए विवाहेतर संबंधों को अपराध के दायरे से मुक्त करते हुए 158 साल पुरानी धारा 497 को रद्द कर दिया है।

अपना फैसले में चीफ जस्टिस ने कहा कि महिला के साथ असम्मान का व्यवहार असंवैधानिक है। महिला और पुरुष समान हैं और उन्हें समान अधिकार है। व्यभिचार रोधी कानून एकपक्षीय और मनमाना है।कोर्ट ने यह भी कहा कि मूलभूत अधिकारों में महिलाओं के अधिकारों का भी समावेश होना चाहिए। समाज में व्यक्तिगत सम्मान भी महत्वपूर्ण है। सिस्टम महिला के साथ असमान व्यवहार नहीं कर सकता।चीफ जस्टिस और जस्टिस खानविलकर ने यह भी कहा है कि इसमें कोई संदेह नहीं कि यह तलाक का आधार हो सकता है। यह कानून महिला की चाहत और सेक्सुअल च्वॉयस का असम्मान करता है। हालांकि, यदि व्यभिचार की वजह से एक जीवनसाथी खुदकुशी कर लेता है और यह बात अदालत में साबित हो जाए, तो आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा चलेगा।

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