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देश के विकास के लिए NPR में सभी को दर्ज करानी होगी जानकारी, NRC और CAA से एकदम अलग

नई दिल्ली 26 दिसंबर 2019 । नेशनल पापुलेशन रजिस्टर (National Population Register) यानी NPR के अपडेशन को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में मंजूरी मिल गई है। साथ ही कैबिनेट ने इस प्रक्रिया के लिए 8,700 करोड़ रुपये के बजट आवंटन भी मंजूर किया है। आपको बता दें कि एनपीआर के तहत देश भर के नागरिकों का डेटाबेस तैयार किया जाएगा। कैबिनेट ने इसको ऐसे समय में मंजूरी दी है जब देश के कई राज्‍यों में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर जबरदस्‍त विरोध प्रदर्शन हो रहा है। वहीं एनपीआर को लेकर भी पश्चिम बंगाल और केरल की सरकारें पहले ही विरोध जता चुकी हैं। वहीं दूसरी तरफ एनआरसी को लेकर भी लोगों के मन में संशय बना हुआ है।

नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (NPR) के तहत देश के सभी नागरिकों को अपना नाम इसमें रजिस्टर करवाना अनिवार्य होगा। हालांकि NPR, CAA और NRC तीनों ही अलग-अलग हैं। यह रजिस्‍टर इस बात का लेखा-जोखा होगा कि कौन व्‍यक्ति कहां रहता है।

आपको यहां पर ये भी बता दें कि वर्ष 2010 में मनमोहन सिंह के नेतृत्‍व में बनी यूपीए सरकार ने NPR बनाने की पहल की थी। इसके बाद वर्ष 2011 में हुई जनगणना के पहले इस पर काम शुरू हुआ था। अब जबकि 2021 में दोबारा जनगणना होनी है तो एनपीआर पर भी काम मुमकिन है जल्‍द ही शुरू हो जाए।

गौरतलब है कि एनपीआर, सीएए और एनआरसी तीनों ही नागरिकों से जुड़े हैं लेकिन इनमें काफी अंतर है। एनआरसी के जरिए केवल देश में अवैध तौर पर रहने वाले लोगों की पहचान करना है, वहीं एनपीआर में एक ही जगह पर छह माह या उससे अधिक वक्‍त तक रहने वालों रजिस्‍ट्रेशन कराना होगा। आपकी

जानकारी के लिए ये भी बता दें कि यदि कोई व्‍यक्ति बाहरी भी है और किसी एक जगह पर वो छह माह या अधिक समय से रह रहा तो उसको भी एनपीआर में रजिस्‍ट्रेशन करना अनिवार्य होगा। NPR का मुख्य मकसद पूरे देश के नागरिकों का एक बायोमैट्रिक डाटा तैयार कर असली लाभार्थियों की पहचान करना और उन तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाना है।

व्यक्ति का नाम, परिवार के मुखिया से उसका संबंध, माता-पिता का नाम, वैवाहिक स्थिति, शादीशुदा होने पर पति/पत्नी का नाम, लिंग, जन्म स्थान, नागरिकता, वर्तमान पता, पते पर रहने की अवधि, स्थायी पता, व्‍यवसाय, शैक्षणिक स्थिति। इसके अलावा पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस और आधार से जुड़ी जानकारी भी मांगी जा सकती है।

मुस्लिम 150 में से कोई भी देश चुन सकते हैं: रूपाणी- पाँच बड़ी ख़बरें

गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने कहा है कि मुसलमान रहने के लिए दुनिया के 150 देशों में से किसी भी देश को चुन सकते हैं लेकिन हिंदुओं के लिए भारत के सिवा कोई देश नहीं है.

विजय रूपाणी नागरिकता संशोधन क़ानून को सही ठहराने के लिए यह तर्क दे रहे थे.

साबरमती आश्रम में नागरिकता संशोधन क़ानून के समर्थन में एक रैली को संबोधित करते हुए रूपाणी ने कांग्रेस को आड़े हाथों लिया. उन्होंने कहा कि कांग्रेस महात्मा गांधी के वादे और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की इच्छा का भी सम्मान नहीं करना चाहती है.

रूपाणी ने कहा, ”बँटवारे के वक़्त पाकिस्तान में 22 फ़ीसदी हिंदू थे. आज की तारीख़ में अत्याचार और प्रताड़ना के कारण महज़ तीन फ़ीसदी हिंदू बचे हैं. इसीलिए हिंदू यहां वापस आना चाहते हैं. कांग्रेस ने जिस बात का कभी समर्थन किया था हम वही काम कर रहे हैं लेकिन आज कांग्रेस इसका विरोध कर रही है.”

हालांकि ये तथ्य सही नहीं है कि पाकिस्तान में हिंदू 22 फ़ीसदी से तीन फ़ीसदी हो गए हैं क्योंकि 22 फ़ीसदी का आँकड़ा तब का है जब पाकिस्तान से बांग्लादेश अलग नहीं हुआ था. रूपाणी ने कहा, ”कुछ दशक पहले तक अफ़ग़ानिस्तान में दो लाख सिख और हिंदू थे और अब यह संख्या महज 500 रह गई है. मुसलमान तो दुनिया के 150 देशों में से कहीं भी जा सकते हैं लेकिन हिंदुओं के लिए भारत के अलावा कोई विकल्प नहीं है. ऐसे में बांग्लादेश, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता क्यों नहीं देनी चाहिए?”

रूपाणी ने कहा, ”गांधीजी का भी मानना था कि पाकिस्तान के हिंदू और सिखों को भारत की नागरिकता मिलनी चाहिए. यहां तक कि मनमोहन सिंह ने भी इसका समर्थन किया था. कांग्रेस को बताना चाहिए कि वो अब क्यों विरोध कर रही है.”

रूपाणी ने कहा, ”इन देशों के गुजरात में 10 हज़ार शरणार्थी हैं. इनमें से ज़्यादातर कच्छ में रहते हैं और सभी दलित हैं. जो सीएए का विरोध कर रहे हैं उन दलित नेताओं का असली चेहरा सामने आ गया है. यह भारत का दुर्भाग्य है कि कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां यहां हैं और ममता बनर्जी जैसी नेता हैं.”

रूपाणी ने कहा कि जो मुसलमानों को उकसा रहे हैं वो अपना एजेंडा पूरा करने में लगे हैं. अमरीका ने पाकिस्तान को किया ब्लैकलिस्ट
पाकिस्तान ने धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में ब्लैकलिस्ट किए जाने पर अमरीका की कड़ी आलोचना की है. पाकिस्तान ने कहा कि यह एकतरफ़ा और मनमानी पूर्ण कार्रवाई है. पाकिस्तान ने कहा कि जिस आधार पर पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट किया गया है वो ज़मीनी सच्चाई से बिल्कुल अलग है और इसकी प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है.

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि इस मामले में भारत को जानबूझकर छोड़ दिया गया है. विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत को इस लिस्ट से बाहर रखना दर्शाता है कि अमरीका ने इसमें कितना पक्षपाती रवैया अपनाया है. अमरीका ने पिछले हफ़्ते उन देशों की सूची जारी की थी जहां लोगों के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव होता है. इस सूची में म्यांमार, चीन, ईरान, सऊदी अरब, उत्तर कोरिया और तजाकिस्तान जैसे देशों को इसमें शामिल किया गया है.

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, ”पाकिस्तान को जानबूझकर टारगेट किया गया है. पाकिस्तान बहुधार्मिक देश है. यहां कई मामलों में बहुलता है. सभी धर्मावलंबियों को यहां अपने धर्म का पालन करने के लिए संवैधानिक अधिकार मिला हुआ है. दूसरी तरफ़ भारत में अल्पसंख्यकों को लिंच किया जा रहा है. हाल ही में भारत में मुसलमान विरोधी एनआरसी और नागरिकता संशोधन क़ानून पास किए गए हैं. इन क़ानूनों का मक़सद मुसलमानों को अलग-थलग करना है. भारत धर्म के आधार पर मुसलमानों के साथ खुलकर भेदभाव कर रहा है लेकिन उसे इस लिस्ट में नहीं रखा गया है.”

यूपी के डीजीपी का बड़ा आरोप
उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह ने कट्टरपंथी ग्रुपों और मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों पर नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर गोपनीय तरीक़े से हिंसा भड़काने का आरोप लगाया है.

पुलिस की यह टिप्पणी तब आई है जब प्रदेश में अब तक सीएए के विरोध-प्रदर्शन में 18 लोगों की मौत हो चुकी है और इनमें से 14 लोगों की मौत पुलिस की गोली से हुई है.डिटेंशन सेंटर का एनआरसी से कोई लेना-देना नहीं- अमित शाह
समाचार एजेंसी एएनआई को दिए इंटरव्यू में गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को ज़ोर देकर कहा कि डिटेंशन सेंटर का एनआरसी या सीएए से कोई लेन-देना नहीं है.

उन्होंने कहा, ”सीएए से तो इसका दूर-दूर का वास्ता नहीं है. सीएए में शरणार्थी को नागरिकता देने का प्रावधान है, लेने का नहीं तो फिर इसके तहत कोई शरणार्थी को अवैध ठहराया ही नहीं जा सकता है. सीएए जब किसी को घुसपैठिया नहीं ठहराता है तो इसकी वजह से किसी को डिटेंशन सेंटर में रखने का सवाल ही कहाँ उठता है.”नेपाल में 120 चीनी गिरफ़्तार
नेपाल की पुलिस ने देश की राजधानी काठमांडू से क़रीब 120 से अधिक चीनी नागरिकों को गिरफ़्तार किया है. शहर के पुलिस प्रमुख ने बताया कि इन लोगों को कैश मशीनों को हैक करने और साइबर क्राइम में शामिल होने के संदेह की वजह से गिरफ़्तार किया गया है.

पुलिस ने गिरफ़्तार किए गए इन लोगों के पास से पांच सौ से अधिक लैपटॉप भी ज़ब्त किए हैं. ये सभी लोग टूरिस्ट वीज़ा पर नेपाल आए थे. इससे पहले सितंबर महीने में पाँच चीनी नागरिकों को गिरफ़्तार किया गया था. इन लोगों के पास से पुलिस को 100 से ज़्यादा फ़र्ज़ी वीज़ा कार्ड मिले थे.

बीजिंग में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंग सुआंग ने कहा कि चीन सीमा-पार अपराधों पर नियंत्रण लगाने के लिए हर सूरत में नेपाल के साथ खड़ा है.

डिटेंशन सेंटर पर असम का वो सच, जिसे पीएम मोदी ने झूठ कहा था

इस डिटेंशन सेंटर का निर्माण कार्य देख रहे साइट इंचार्ज रॉबिन दास ने बीबीसी से कहा, “मैं साल 2018 के दिसंबर से इस डिटेंशन सेंटर के निर्माण का काम-काज देख रहा हूं. इसी माटिया गांव में बीते साल दिसंबर से इस डिटेंशन सेंटर का निर्माण कार्य शुरू हुआ था. इस डिटेंशन सेंटर में तीन हज़ार लोगों को रखने का इंतज़ाम किया जा रहा है.” “यहां महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग सेल बनाए गए हैं. हमने डिटेंशन सेंटर का 70 फ़ीसदी काम पूरा कर लिया है. बिना किसी छुट्टी के क़रीब 300 मज़दूर इस निर्माण कार्य को पूरा करने में लगे है. इस निर्माण कार्य को पूरा करने के लिए 31 दिसंबर 2019 की डेडलाइन मिली थी.”

“लेकिन मुझे पूरी उम्मीद है कि हम 31 मार्च 2020 तक इस विशाल भवन के निर्माण से जुड़ा सारा काम पूरा कर लेंगे. दरअसल, बारिश के दिनों में होने वाली परेशानी के चलते काम थोड़ा धीमा पड़ गया था.”

इस डिटेंशन सेंटर के निर्माण पर होने वाले ख़र्च से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए रॉबिन दास ने कहा, “इसके निर्माण में कुल 46 करोड़ रुपए ख़र्च किए जाएंगे जो केद्रीय गृह मंत्रालय दे रहा है.” साइट इंचार्ज दास दावा करते हैं कि अमरीका में मौजूद डिटेंशन सेंटर के बाद ये दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा डिटेंशन सेंटर होगा. इसके अंदर अस्पताल और ठीक गेट के बाहर प्राइमरी स्कूल से लेकर सभागार और बच्चों और महिलाओं की विशेष देखभाल के लिए तमाम सुविधाएं होगी.

फिलहाल असम की अलग-अलग छह सेंट्रल जेलों में बने डिटेंशन सेंटरों में 1133 घोषित विदेशी लोगों को रखा गया है.

ये जानकारी संसद में गृह राज्य मंत्री जीके रेड्डी ने कांग्रेस सांसद शशि थरूर के सवाल के जवाब में जुलाई में दी थी, ये 25 जून तक का आंकड़ा है.

माटिया गांव के बिल्कुल पास रहने वाले आजिदुल इस्लाम जब भी इस तरफ़ से गुज़रते हैं, वो ऊंची दीवारों से घिरे इस डिटेंशन सेंटर को देख कर डर जाते हैं.

वो कहते हैं, “मैं इसी इलाक़े में बड़ा हुआ हूं, लेकिन मैंने इतनी विशाल बिल्डिंग कभी नहीं देखी. इंसानों को अगर इसके भीतर क़ैद करके रखेंगे तो डर तो लगेगा ही. ये सच है कि असम में अवैध नागरिकों की समस्या काफ़ी गंभीर है लेकिन जो व्यक्ति विदेशी घोषित हुआ हो उसे डिटेंशन सेंटर में रखकर इतना ख़र्च करने के बजाए उसके अपने देश भेज देना चाहिए.”

24 साल की दीपिका कलिता इसी निर्माणाधीन डिटेंशन सेंटर में एक मज़दूर के तौर पर शुरू से काम कर रही हैं. उन्हें पता है कि यहां किन लोगों को रखा जाएगा.

वो कहती है, “यहां उन लोगों को रखा जाएगा जिनका नाम एनआरसी में नहीं आया है या फिर जो वोटर नहीं हैं. मैं यहां शुरू से मज़दूरी कर रही हूँ. हम ग़रीब हैं, यहां मज़दूरी करके पेट पाल रहें है. कई और महिलाएं भी यहां काम करती हैं. ठेकेदार रोज़ाना के 250 रुपए मज़दूरी देता है. मेरा नाम एनआरसी में आया है लेकिन मुझे नहीं मालूम यहां कितने लोगों को रखा जाएगा.”

इसी डिटेंशन सेंटर में मज़दूरी करने वाले 30 साल के गोकुल विश्वास का नाम एनआरसी में है लेकिन वो यह जानते हैं कि जिन लोगों को विदेशी नागरिक घोषित किया गया है उन्हें इसी जगह क़ैद करके रखा जाएगा.

गोकुल कहते हैं, “मैं यहां पिछले कुछ दिनों से मज़दूरी करता हूं. यहां मुझे रोज़ाना 500 रुपए मिलते हैं. यह डिंटेशन सेंटर की बिल्डिंग बन रही है. यहां विदेशी लोगों को रखा जाएगा. काम करते समय कई बार यह सोचकर डर जाता हूं कि अगर मेरा नाम एनआरसी में नहीं आता तो मुझे भी इस जेलखाने में रहना पड़ता.”दरअसल, गोकुल ने अपने कई साथी मज़दूरों से सुना है कि इस डिटेंशन सेंटर के निर्माण कार्य में मज़दूरी करने वाले कइयों के नाम एनआरसी में नहीं हैं.

इस डिटेंशन सेंटर के ठीक बाहर चाय और खाने-पीने की एक छोटी सी होटल चलाने वाले अमित हाजोंग अपनी पत्नी ममता का नाम एनआरसी में शामिल नहीं किए जाने से काफ़ी परेशान हैं.

अमित अपनी परेशानी बयान करते हुए कहते हैं, “मैं पास के 5 नंबर माटिया कैंप में अपने परिवार के साथ रहता हूं. मेरे पूरे परिवार का नाम एनआरसी में आया है. बेटे का नाम है. मां का नाम है. मेरा नाम आया है लेकिन मेरी पत्नी ममता का नाम नहीं आया है. इस बात को लेकर हम बहुत टेंशन में हैं.”

“हम पति-पत्नी यह छोटी-सी चाय की दुकान चलाते हैं. इससे हमारा गुज़ारा हो रहा है. दिन भर इस दुकान में काम करते हैं, इसलिए कुछ सोच नहीं पाते. लेकिन जब रात को घर जाते हैं तो इन बातों से काफ़ी चिंता होती है. रोज़ाना आंख के सामने इस विशाल बिल्डिंग को बनते देख रहे हैं.”

“अगर मेरी पत्नी को पकड़कर डिटेंशन सेंटर में डाल दिया तो हमारा परिवार बिखर जाएगा. पत्नी के बिना बच्चों को कैसे पालूंगा. बेटा पांच साल का है और बेटी 2 साल की है. जब-जब बात दिमाग़ में आती है तो मैं डर जाता हूं.”इस साल 31 अगस्त को नेशनल सिटिज़न रजिस्टर यानी एनआरसी की जो आख़िरी लिस्ट जारी हुई थी उसमें 19 लाख लोगों का नाम शामिल नहीं किया गया हालांकि इस एनआरसी को लेकर सत्तारूढ़ प्रदेश भाजपा बिल्कुल ख़ुश नहीं है.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में संसद के भीतर में पूरे देश में एनआरसी लागू करने की बात कही थी. यानी उस समय फिर से असम में एनआरसी का काम किया जाएगा.

जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने नई दिल्ली में कहा, “जो हिंदुस्तान की मिट्टी के मुसलमान हैं, जिनके पुरखे मां भारती की संतान हैं. भाइयों और बहनों, उनसे नागरिकता क़ानून और एनआरसी दोनों का कोई लेना-देना नहीं है. देश के मुसलमानों को ना डिटेंशन सेंटर में भेजा जा रहा है, ना हिंदुस्तान में कोई डिटेंशन सेंटर है. भाइयों और बहनों, ये सफेद झूठ है, ये बद-इरादे वाला खेल है, ये नापाक खेल है. मैं तो हैरान हूं कि ये झूठ बोलने के लिए किस हद तक जा सकते हैं.”

सामाजिक कार्यकर्ता शाहजहां कहते है, “जो डिटेंशन सेंटर भारत सरकार के पैसों से बन रहा हो उसके बारे में प्रधानंमंत्री ऐसा कैसे बोल सकते है? यहां आने वाले सबको पता है कि यह डिटेंशन सेंटर बन रहा है जो एशिया का सबसे बड़ा डिटेंशन सेंटर होगा.”

भारत अब गंभीर आर्थिक संकट में: अरविंद सुब्रमण्यम

नरेंद्र मोदी सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने कहा है कि भारत कोई सामान्य आर्थिक संकट की चपेट में नहीं है बल्कि बहुत ही गंभीर संकट में आ गया है.

इससे पहले अरविंद सुब्रमण्यम ने भारत के जीडीपी डेटा को भी कटघरे में खड़ा करते हुए बताया था कि 2011 से 2016 के बीच भारत का जीडीपी डेटा 2.5 फ़ीसदी बढ़ाकर बताया गया था.

इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा था कि जीडीपी डेटा अर्थव्यवस्था की संपन्नता का कोई मुकम्मल मानदंड नहीं है. अरविंद का कहना है कि जिस जीडीपी नंबर को वैश्विक स्तर पर स्वीकार किया गया है उस पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है.

अहमदाबाद के आईआईएम और इंग्लैंड के ऑक्सफर्ड से पढ़े अरविंद सुब्रमण्यम नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में तीन साल तक मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे थे. अरविंद जाने-माने अर्थशास्त्री हैं.

उन्होंने कहा, ”ग़ैर-पेट्रोलियम उत्पाद की आयात और निर्यात दर में क्रमशः 6 फ़ीसदी और एक फ़ीसदी की गिरावट है. कैपिटल गुड्स इंडस्ट्री की वृद्धि दर में 10 फ़ीसदी की गिरावट है. कंज्यूमर गुड्स प्रोडक्शन की वृद्धि दर दो साल पहले पाँच फ़ीसदी पर थी दो अब एक फ़ीसदी पर है. इन आँकड़ो से समझा जा सकता है कि भारत की अर्थव्यवस्था किस हालत में है.”

अरविंद ने कहा, ”निर्यात, कंज्यूमर गुड्स और कर राजस्व का आँकड़ा भी काफ़ी निराशाजनक है. अगर 2000 से 2002 के भारत के आर्थिक संकट को देखें तो पता चलता है कि तब जीडीपी वृद्धि दर 4.5 फ़ीसदी थी लेकिन बाक़ी के आँकड़े सकारात्मक थे जबकि अभी ये सारे आँकड़े या तो नकारात्मक हैं या नकारात्मक के क़रीब है. यह कोई सामान्य आर्थिक संकट नहीं है बल्कि यह भारत का गंभीर आर्थिक संकट है.

अरविंद ने कहा, ”अर्थव्यवस्था के जो मुख्य आँकड़े हैं वो या तो नकारात्मक हैं या उसके क़रीब हैं. ग्रोथ, निवेश, निर्यात और आयात में वृद्धि से नौकरियां पैदा होती हैं लेकिन सब कुछ नीचे जा रहा है. आपको यह भी देखना होगा कि सरकार सोशल प्रोग्राम पर कितना राजस्व खर्च कर रही है. नौकरी और लोगों की आय में लगातार गिरावट आ रही है.”

इसी साल मई महीने में मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने इस्तीफ़ा दे दिया था. अरविंद सुब्रमण्यम जाने-माने अर्थशास्त्री हैं. इस्तीफ़े के एक महीने बाद उन्होंने कहा कि भारत अपनी जीडीपी वृद्धि दर बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है.

उन्होंने कहा कि 2011-12 से 2016-17 के बीच भारत की जीडीपी की वास्तविक वृद्धि दर 4.5 फ़ीसदी थी लेकिन इसे आधिकारिक रूप से सात फ़ीसदी बताया गया. अरविंद सुब्रमण्यम के इस बयान को अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ख़ूब तवज्जो मिली और कहा गया कि सरकार आंकड़ों के साथ छेड़छाड़ कर रही है.

प्रज्ञा ठाकुर नारे से भड़कीं
भोपाल की बीजेपी सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर का विवादों से रिश्ता ख़त्म होता नहीं दिख रहा है. बुधवार को एक भोपाल के एक कॉलेज में प्रदर्शनकारियों और बीजेपी समर्थकों में प्रज्ञा ठाकुर को लेकर झड़प हो गई.

प्रज्ञा ठाकुर ने इस कॉलेज की दो स्टूडेंट से मिलने की कोशिश की तो उन्हें ‘आतंकवादी वापस जाओ’ के नारे का सामना करना पड़ा. माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय की दो स्टूडेंट श्रेया पांडे और मनु शर्मा अटेंडेंस कम होने के मामले में क्लास से निलंबन को लेकर विरोध-प्रदर्शन कर रही हैं.इन्हीं दोनों स्टूडेंट से प्रज्ञा ठाकुर मिलने गई थीं. इस नारे से प्रज्ञा ठाकुर काफ़ी ग़ुस्से में थीं और उन्होंने कहा कि वो क़ानूनी विशेषज्ञों से इस बार में राय लेकर कार्रवाई करेंगी. प्रज्ञा ठाकुर को देखते ही छात्रों ने पूज्य बापू अमर रहे के भी नारे लगाए.

पश्चिम बंगाल में अटल बिहार वाजपेयी के मूर्ति अनावरण पर नहीं आया कोई
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने बुधवार को कहा कि कोलकाता स्थित राजभवन में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 95वीं जयंती पर उनकी मूर्ति का अनावरण किया गया लेकिन राज्य सरकार के कोई भी सीनियर प्रतिनिधि मौजूद नहीं थे.

धनखड़ ने कहा कि इससे उन्हें बहुत दुख हुआ है. धनखड़ ने कहा कि इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी आमंत्रित किया गया था लेकिन वो नहीं आईं. राज्यपाल ने कहा कि मुख्यमंत्री के आने की बात तो दूर की है कोई सीनियरक अधिकारी भी नहीं आया.

पार्टी लाइन से अलग शिव सांसद ने किया एनआरसी और सीएए का समर्थन
महाराष्ट्र के हिंगोली से शिव सेना सांसद हेमंत पाटिल ने पार्टी लाइन से अलग हटकर नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी का समर्थन किया है.

उन्होंने अपनी पार्टी की इस मामले में आलोचना भी की है. शिव सेना ने लोकसभा में नागरिकता संशोधन क़ानून के समर्थन में वोट किया था लेकिन राज्यसभा में मतदान के दौरान ग़ैर-मौजूद रही थी.

शिव सेना ने कांग्रेस और एनसीपी के समर्थन से महाराष्ट्र में सरकार बनाई है और दोनों पार्टियां एनआरसी और सीएए का विरोध कर रही हैं.

हेमंत पाटिल ने कहा है, ”मैं सीएए और एनआरसी के समर्थन में आयोजित हुई रैली में शामिल नहीं हो सका. इसके लिए मुझे खेद है लेकिन मैं इन दोनों का समर्थन करता हूं. शिव सेना हमेशा से हिन्दुत्व पार्टी रही है और मैं इसका विरोध कैसे कर सकता हूं.”

ईरान में गुरुवार को होने वाले सरकार विरोधी प्रदर्शनों से ठीक पहले देश के कई हिस्सों में इंटरनेट सुविधा बाधित रही. बीते साल महंगाई के मुद्दे को लेकर विरोध प्रदर्शनों में जान गंवाने वालों की याद में गुरुवार को लोग एक बार फिर सड़कों पर उतरने की योजना बना रहे थे.

बीबीसी फ़ारसी सेवा के श्रोताओं ने भी इंटरनेट के प्रभावित होने की सूचना दी है. इसके साथ ही इंटरनेट मॉनिटरिंग सर्विस नेटब्लॉक्स ने भी इंटरनेट इस्तेमाल में गिरावट दर्ज होने की पुष्टि की है. ईरानी समाचार एजेंसी इल्ना ने संबंधित अधिकारी का नाम ज़ाहिर किए बिना यह दावा किया है कि यह फ़ैसला आधिकारिक आदेश के बाद लिया गया है.

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