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मेजर समेत चार जवान शहीद, दो आतंकवादी ढेर

नई दिल्ली 19 फरवरी 2019 । जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले में हुई मुठभेड़ में एक मेजर समेत सेना के चार जवान शहीद हो गए और जैश ए मोहम्मद के दो आतंकवादी मारे गए। इस मुठभेड़ में एक आम नागरिक की भी मौत हो गई। रक्षा अधिकारियों ने यह जानकारी दी।

यह मुठभेड़ उस जगह से कुछ ही दूरी पर हुई है, जहां तीन दिन पहले 14 फरवरी को सीआरपीएफ की एक बस पर आत्मघाती हमला हुआ था। अधिकारियों ने बताया कि दक्षिण कश्मीर में पुलवामा जिले के पिंगलान इलाके में हुई मुठभेड़ में एक आम नागरिक की भी मौत हो गई। एक रक्षा प्रवक्ता ने कहा, ‘‘ऐसा माना जा रहा है कि इन आतंकवादियों का संबंध 14 फरवरी को हुए कार बम हमले से था।’’

अधिकारियों ने बताया कि मारे गए एक आतंकवादी की पहचान एक स्थानीय निवासी हिलाल अहमद के रूप में की गई है। ऐसा माना जा रहा है कि उसका संबंध जैश-ए-मोहम्मद से था। एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि सुरक्षा बलों को 14 फरवरी को हुए आतंकवादी हमले के स्थल से करीब 10 किलोमीटर दूर एक इलाके में आतंकवादियों की मौजूदगी की सूचना मिली थी। इसके बाद सुरक्षा बलों ने रात में इलाके की घेराबंदी की और तलाश अभियान शुरू किया।

अधिकारियों ने बताया कि तलाश अभियान के दौरान आतंकवादियों ने बलों पर गोलीबारी की जिसके बाद मुठभेड़ शुरू हो गई। पुलवामा में 14 फरवरी को हुए आतंकवादी हमले की जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद ने ली है। इस हमले में सीआरपीएस के 40 जवान शहीद हो गए थे और पांच अन्य गंभीर रूप से घायल हुए थे।

सेना ने पुलवामा के गुनहगार राशिद गाजी को किया ढेर, 11 घंटे चला एनकाउंटर

देश अभी 40 जवानों के शहीद होने का गम ही मना रहा था कि सोमवार सुबह एक और बुरी खबर आ गई. जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में आतंकियों के खिलाफ मुठभेड़ लड़ रहे सुरक्षाबलों के चार जवान शहीद हो गए. पुलवामा जिले के पिंगलिना में सुरक्षाबलों ने देर रात को ऑपरेशन चलाया, जिसका मकसद था गाजी राशिद को पकड़ना. वही गाजी जिसने पुलवामा आतंकी हमले की साजिश रची थी. सुरक्षाबल अपने इस मिशन में कामयाब हो गए हैं, क्योंकि गाजी को मार गिराया गया है.

सुरक्षाबलों ने भी जैश-ए-कमांडर के दो कमांडरों को मौत के घाट उतार दिया है. सुरक्षाबलों ने यहां एक बिल्डिंग को ही उड़ा दिया, जहां आतंकी छिपे बैठे थे.

कैसे हुआ ऑपरेशन…

दरअसल, पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद से ही सुरक्षाबलों ने घाटी में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन तेज कर दिया है. इसी कड़ी में रविवार देर रात करीब 12 बजे पुलवामा के पिंगलिना में कुछ आतंकियों के छिपे होने की खबर मिली.

सुरक्षाबलों ने इस इलाके को चारों ओर से घेरा और रात साढ़े 12 बजे ऑपरेशन शुरू हो गया. इस ऑपरेशन को 55RR, CRPF और SOG के जवानों ने मिलकर चलाया. आतंकियों के साथ मुठभेड़ करते हुए हमारे 4 जवान शहीद हो गए. इनमें मेजर डीएस डोंडियाल, हेड कॉन्स्टेबल सेवा राम, सिपाही अजय कुमार और सिपाही हरी सिंह शामिल हैं. एक जवान घायल है जिसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है.

कौन है गाजी राशिद?

आपको बता दें कि जैश-ए-मोहम्मद का सरगना मसूद अजहर अपने भतीजे के जरिए घाटी में आतंकी हरकतों को अंजाम देता था. लेकिन पिछले साल ऑपरेशन ऑलआउट के दौरान सुरक्षाबलों ने उसे मार गिराया था. जिसके बाद से ही मसूद अजहर ने कश्मीर की जिम्मेदारी अपने टॉप कमांडर और आईईडी एक्सपर्ट गाजी राशिद को दी थी.

ऐसा माना जा रहा है कि गाजी अपने 2 सहयोगियों के साथ दिसंबर में भारत में घुसा और दक्षिण कश्मीर में छिप गया. आपको बता दें कि गाजी को मौलाना मसूद अजहर का भरोसेमंद और करीबी माना जाता है.

उसने 2008 में जैश-ए-मोहम्मद ज्वाइन किया और तालिबान में ट्रेनिंग ली. 2010 में वह उत्तरी वजीरिस्तान आ गया था. तभी से आतंक की दुनिया में वह शामिल है. कुछ ही समय बाद उसने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के इलाके में युवा लड़ाकों को ट्रेनिंग करनी शुरू दी थी.

‘कश्मीर में पत्थरबाजों को आतंकी समझकर निपटो, फिर होगी शांति’

पुलवामा के पिंगलिना में रविवार आधी रात से सुरक्षा बलों और आतंकियों के बीच हुए एनकाउंटर में सेना के एक मेजर समेत चार जवान शहीद हो गए हैं. इस मुठभेड़ में एक स्थानीय नागरिक की मौत हो गई. है. नागरिक की मौत से तनाव भी फैल गया और सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी भी की गई.

पुलवामा हमले का बदला लेने और पिंगलिना जैसी स्थितियों से निपटने के लिए रक्षा विशेषज्ञ जीडी बख्शी ने आजतक से कहा है कि पत्थरबाजों को आतंकी समझकर उनपर कार्रवाई की जाए. उन्होंने कहा, हमें पूरी उम्मीद थी कि सुरक्षा बल पुलवामा हमले के मास्टरमाइंड माने जा रहे गाजी रशीद को ढूंढ निकालेंगे. यह अफसोस की बात है कि गाजी नए लड़कों को भर्ती कर रहा है. इस समय हमारे जवानों में जोश बहुत है, अगर गाजी को मार गिराएंगे तो यह हमारे लिए इस समय की सबसे अच्छी खबर होगी.

जीडी बख्शी ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में 250 आतंकियों से जितना खतरा है उससे कम वहां के 40 हजार पत्थरबाजों से भी नहीं है. इन पत्थरबाजों को आतंकियों की तरह डील करना होगा. उनके ऊपर सख्त एक्शन लेने की जरूरत है. यह बस एक-दो बार ही करना होगा, इसके बाद इसकी जरूरत भी नहीं पड़ेगी. हमारे लड़कों को ऑपरेशन शुरू करते समय ऐसा करना पड़ेगा. जरूरत हुई तो रॉकेट लॉन्चर का इस्तेमाल करना होगा.

वहीं, ब्रिगेडियर महालिंगम ने इस मामले पर कहा कि फिदायीन हमले के बाद आतंकियों के हौसले बुलंद हैं. इसलिए इसके बाद उन्होंने दूसरी बार ऐसा हमला किया है. उन्होंने कहा कि गाजी इस समय छुपा हुआ है, क्योंकि उसे अपने पकड़े जाने का डर है. गाजी को पकड़ने के लिए सुरक्षा बलों को और सघन अभियान चलाना चाहिए और सभी आतंकियों को पकड़कर उन्हें सजा देनी चाहिए.

पत्थरबाजों के सवाल पर महालिंगम ने कहा कि सुरक्षा बल तो राज्य में स्थानीय लोगों की सुरक्षा के लिए ही काम कर रहे हैं. वरना उन्हें कश्मीर में रहने की जरूरत नहीं है. उन्होंने कहा कि अशांत तत्वों का इरादा कश्मीर के माहौल को सीरिया और अफगानिस्तान जैसा बनाने का है.

एक और रक्षा विशेषज्ञ सुशांत सरीन ने कहा कि इस स्थिति से निपटना पड़ेगा. लोगों को पथराव की, सुरक्षा घेरा तोड़ने या सुरक्षा बलों का ध्यान बंटाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए. इसके लिए सख्त कदम उठाए जाने चाहिए. सुरक्षा बलों के हाथ बांधकर उन्हें लड़ने के लिए नहीं कहा जा सकता. सुरक्षा बलों ने काफी सहनशीलता दिखा ली है. इसका कोई फायदा नहीं हुआ. इस बकवास को बंद करना पड़ेगा. पत्थर मारने वालों के साथ क्या करना है, यह सोचना होगा. इनसे निपटने के बहुत तरीके हैं, लेकिन इसे अमल में लाना होगा. इसे बाबूगीरी में नहीं फंसाना चाहिए. कमी यह है कि पुलवामा जैसे हादसे के बाद ध्यान केंद्रित कर इससे निपटा नहीं जा रहा है. हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. इस समस्या से निपटने के लिए दृढ़ता दिखानी होगी.

बता दें कि पिंगलिना में रविवार रात से जारी मुठभेड़ सोमवार सुबह रुक गई थी, लेकिन सुरक्षा बलों की ओर से घरों में आतंकियों की जांच की जा रही है. इस मुठभेड़ के बाद आसपास के तीन किमी के इलाके को घेर लिया गया है. जानकारी के मुताबिक यहां पर जैश-ए-मोहम्मद के दो से ज्यादा आतंकी वहां पर मौजूद हो सकते हैं.

बता दें कि इससे पहले इसी इलाके में 13 फरवरी को भी मुठभेड़ हुई थी. इसमें हिब्जुल का एक कमांडर मारा गया था, लेकिन गाजी रशीद के फरार होने का क्लू मिला था. उस मुठभेड़ में सेना के दो जवान शहीद हो गए थे.

40 ताबूतों में शहीदों के शव देख BSF जवान को आया हार्ट अटैक, मौत

पुलवामा हमले में 40 सीआरपीएफ जवानों की मौत के बाद पूरे देश में आक्रोश की लहर है. शहीदों को अंतिम विदाई देने लोग देशभर से पहुंच रहे हैं. इस बीच बिहार के सासाराम में शहीद जवानों के ताबुत को लेकर जा रहे बीएसएफ जवान की हार्ट अटैक से मौत हो गई.

बताया जा रहा है कि 40 ताबूतों में साथियों के शव देख बीएसएफ में एएसआई के पद पर तैनात जवान नित्यानंद सिंह को गहरा सदमा लगा और उन्हें हार्ट अटैक आ गया. इस घटना की जानकारी जैसे ही लोगों को लगी तो गांव में मातम पसर गया. बताया जा रहा है कि पुलवामा में शहीद हुए जवानों में से कुछ जवान नित्यानंद सिंह के अच्छे मित्र थे.

गौरतलब है कि पिछले चार दिनों में जम्मू कश्मीर में 45 जवान शहीद हो चुके हैं. सेना पर पहला हमला पुलवामा में जम्मू श्रीनगर हाईवे पर हुआ. यहां सीआरपीएफ के काफिले की बस में आतंकी ने विस्फोटक से लदी गाड़ी घुसा दी. जिससे सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए. इसके बाद राजौरी में नियंत्रण रेखा पर बारूदी सुरंग के विस्फोट में मेजर चित्रेश सिंह बिष्ट शहीद हो गए.

भारत ने पाकिस्तान से वापस लिया मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा…

पुलवामा हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा वापस ले लिया है. यही नहीं, भारत ने दुनिया में पाकिस्तान को अलग-थलग करने की बात कह चुका है. पाकिस्तान में पल रहे आतंकवाद को खत्म करने के लिए भारत के साथ कई देश आगे आए हैं.

पुलवामा के शहीदों को श्रध्दांजलि नहीं देने के मामले में वकीलों ने किया दो न्यायाधीशों का बहिष्कार

पुलवामा के शहीदों की श्रध्दांजलि सभा में अनुपस्थित रहने वाले दो अति.जिला न्यायाधीशों से नाराज वकीलों ने आज उक्त दोनों न्यायाधीशों के न्यायालयों का बहिष्कार करने का निर्णय लिया है। अभिभाषक संघ ने उक्त दोनो न्यायाधीशों के विरुध्द मध्यप्रदेश के मुख्य न्यायाधीश और भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखने का भी निर्णय लिया है।
उल्लेखनीय है कि पुलवामा में सीआरपीएफ के 40 जवानों की शहादत के अगले दिन 15 किया गया था। इस सभा में जिला न्यायालय के समस्त न्यायाधीशों को भी आमंत्रित किया गया था। श्रध्दांजलि सभा में एट्रोसिटी एक्ट के विशेष न्यायाधीश एवं प्रभारी जिला न्यायाधीश दीपक गुप्ता और द्वितीय अति.जिला एवं सत्र न्यायाधीश साबिर एहमद खान जानबूझकर अनुपस्थित रहे थे। दोनो न्यायाधीशों की अनुपस्थिति से अभिभाषक भडक गए थे और उसी समय अभिभाषकों ने अपना तीखा विरोध भी दर्ज कराया था। यह खबर इ खबर टुडे ने सबसे पहले प्रसारित की थी।
न्यायाधीशों के इस व्यवहार से भडके हुए अभिभाषकों ने आज जिला अभिभाषक संघ की आपात बैठक का आयोजन किया था। इस बैठक में वकीलों ने एकमत से उक्त दोनो न्यायाधीशों के न्यायालयों का बहिष्कार करने का निर्णय लिया। बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि उक्त दोनों न्यायाधीशों के विरोध में मध्यप्रदेश के मुख्य न्यायाधिपति एवं सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति को पत्र लिखे जाएंगे।
अभिभाषक संघ के अध्यक्ष संजय पंवार की अध्यक्षता में आयोजित बैठक को अभिभाषक संघ के सचिव दीपक जोशी,अभिभाषक सुभाष उपाध्याय,अभय शर्मा,अजय कांठेड,सुनील पारिख,सतीश पुरोहित,प्रवीण भट्ट,शीतल गेलडा,अशोक शर्मा समेत अनेक अभिभाषकों ने सम्बोधित किया। वक्ताओं ने अपने भाषणों में उक्त दोनों न्यायाधीशों के कृत्य को अत्यन्त निन्दनीय बताते हुए उनके विरुध्द कडे कदम उठाने की जरुरत पर बल दिया। बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि बैठक के पश्चात बचे हुए समय में अभिभाषक गण पूरे समय न्यायिक कार्य से विरत रहेंगे,और मंगलवार से उक्त दोनो न्यायाधीशों दीपक गुप्ता एवं साबिर एहमद खान के न्यायालयों का बहिष्कार किया जाएगा।

कश्मीरी अलगाववादी नेताओं पर हर साल 14 करोड़ होते हैं खर्च, 600 जवान करते हैं सुरक्षा

पुलवामा हमले के बाद भारत सरकार ने कड़ा कदम उठाते हुए कश्मीर के 6 अलगाववादी नेताओं को मिली सुरक्षा छीन लेने का फैसला लिया है. बता दें कि बीते एक साल में इन नेताओं की सुरक्षा के लिए भारत सरकार ने 14 करोड़ रुपए से ज्यादा रकम खर्च की थी. इन छह नेताओं में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता मीरवाइज़ उमर फारूक, अब्दुल ग़नी बट्ट, बिलाल लोन, हाशिम कुरैशी, शब्बीर शाह शामिल हैं.

600 जवान करते हैं सुरक्षा
गौरतलब है कि अलगाववादी नेताओं पर हुए जानलेवा हमलों के बाद सरकार ने उन्हें सुरक्षा मुहैया कराने का फैसला लिया था. अलगाववादी नेता मीरवाइज फारूख और अब्दुल गनी लोन पर साल 1990 और 2002 में जानलेवा हमला हुआ था. गृह मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों को माने तो सरकार इन 6 अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा पर हर साल करीब 14 करोड़ रुपए खर्च कर रही थी.

इसमें से 11 करोड़ सुरक्षा के लिए, 2 करोड़ विदेशी दौरे पर और 50 लाख गाड़ियों पर खर्च लिए जाते थे. इन नेताओं की सुरक्षा के लिए हर वक़्त 600 से ज्यादा जवान तैनात रहते थे. साल 2018 में जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2008 से लेकर 2017 तक अलगाववादियों को सुरक्षा मुहैया करवाने पर 10.88 करोड़ रुपये खर्च किए गए.

मोदी सरकार ने क्या वापस लिया ?

सरकार की तरफ से जारी आदेश के मुताबिक, इन अलगाववादियों को मुहैया कराई गई सुरक्षा और दूसरे वाहन वापस लिए गए हैं. इसमें कहा गया है, किसी भी अलगाववादी को सुरक्षाबल अब किसी सूरत में सुरक्षा मुहैया नहीं कराएंगे. अगर उन्हें सरकार की तरफ से कोई अन्य सुविधा दी गई है, तो वह भी तत्काल प्रभाव से वापस ली जाती है.

जम्मू-कश्मीर के एक अधिकारी ने बयान जारी किया है कि ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (APHC) के चेयरमैन मीरवाइज उमर फारूक, शब्बीर शाह, हाशिम कुरैशी, बिलाल लोन, फजल हक कुरैशी और अब्दुल गनी बट को अब किसी तरह का सुरक्षा कवर नहीं दिया जाएगा. इन नेताओं को दी जाने वाली सरकारी गाड़ियां और अन्य सुविधाएं छीन ली गई हैं.

पाकिस्तान समर्थक माने जाने वाले अलगाववादी नेता- सैयद अली गिलानी और मोहम्मद यासीन मलिक ने पहले ही सुरक्षा लेने से इनकार कर दिया था. गिलानी फिलहाल नजरबंद हैं लेकिन सरकार ने अलगाववादियों को दी जाने वाली सुरक्षा को गैरजरूरी करार देकर उनसे सभी सुविधाएं वापस ले ली हैं. सरकार के इस फैसले के बाद अब अलगाववादियों को कोई कवर या सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराई जाएगी साथ ही उनसे सरकारी गाड़ियां भी वापस ले ली गई हैं.

राजनाथ सिंह का सख्त रवैया
पुलवामा हमले के बाद केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी (ISI) से संपर्क रखने वालों को दी जा रही सुरक्षा की समीक्षा की जाएगी. हालांकि सुविधा वापस लेने के फैसले पर मीरवाइज ने कहा था कि सरकार ने खुद ही अलगाववादी नेताओं को सुरक्षा देने का फैसला किया था. हमने कभी इसकी मांग नहीं की थी.

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