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उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने बनाया है विक्रम संवत

 उज्जैन 5 अप्रैल 2019 । यह बात हम लोग भली-भांति जानते हैं कि मुगलों के साथ साथ अंग्रेजों ने भी हमें लंबे समय तक गुलाम बनाकर रखा और उनके नियम कानून कायदे हम पर जबरन थोपे गए ऐसे में परमवीर महान राजा विक्रमादित्य सनातन धर्म की रक्षार्थ विक्रम संवत की स्थापना की और तब से लेकर आज तक सनातन धर्म को मानने वाले आमजन विक्रम संवत के हिसाब से शेर क्षेत्र महा की गुड़ी पड़वा के दिन से नव वर्ष मनाते हैं। विक्रम संवत के हिसाब से ही आज भी ज्योतिष गणना तिथि वार नक्षत्र सब की जानकारी आम भारतीय सनातनी धर्म को मानने वाले को प्राप्त होती है

वो ‘राजा’ जिसे भूल गया हमारा इतिहास, भारत को बनाया था ‘सोने की चिड़िया’

हिंदुस्तान के इतिहास में ऐसा बहुत कुछ छूट गया, जिसे लोग कभी नहीं जान पाएंगे। क्योंकि इनके सम्मान में बहुत कम जगहों पर ही वर्णन किया गया है। आप कह सकते हैं कि ये हमारे लिए शर्म की बात है कि जिसने देश को सोने की चिड़िया बनाया, आज उसके बारे में हम कुछ नहीं जानते।

हम बात कर रहे हैं महाराज विक्रमादित्य के बारे में,जिनके बारे में बहुत कम लोगों को ज्ञान है। इन्हीं के शासनकाल में भारत को सोने की चिड़िया बना था। इस काल को देश का स्वर्णिम काल भी माना जाता है।

महाराज विक्रमादित्य की महिमा

उज्जैन के राजा गन्धर्व सैन थे। इनकी तीन संताने थी, सबसे बड़ी संतान एक लड़की थी मैनावती, दूसरी संतान लड़का भृतहरि और सबसे छोटी संतान वीर विक्रमादित्य। बहन मैनावती की शादी धारानगरी के राजा पद्म सैन के साथ कर दी गई। जिनका एक लड़का हुआ गोपीचन्द। आगे चलकर गोपीचन्द ने श्री ज्वालेन्दर नाथ जी से योग दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए। फिर मैनावती ने भी श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग दीक्षा ले ली।

आज हिंदुस्तान की संस्कृति और नाम केवल विक्रमादित्य के कारण अस्तित्व में है। अशोक मौर्य ने बौद्ध धर्म अपना लिया। बौद्ध बनकर 25 साल राज करने के बाद भारत में तब सनातन धर्म लगभग समाप्ति पर आ गया था।

विक्रमादित्य को क्यों याद रखना जरूरी?

शायद ही आपको पता हो कि रामायण, और महाभारत जैसे ग्रन्थ खो गए थे। महाराज विक्रमादित्य ने ही इनकी पुनः खोज करवा कर स्थापित किया। भगवान विष्णु और शिव जी के मंदिर बनवाए। सनातन धर्म की रक्षा की।

9 रत्न के स्वामी थे विक्रमादित्य

विक्रमादित्य के 9 रत्नों में से एक कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् को लिखा। जिसमें भारत का इतिहास है। अन्यथा भारत का इतिहास तो दूर की बात हम भगवान् कृष्ण और राम को ही खो चुके होते।
देवता भी न्याय के लिए आते थे विक्रमादित्य
के दरबार में
हमारे ग्रन्थ ही भारत में खोने के कगार पर आ गए थे। उस समय उज्जैन के राजा भृतहरि ने राज छोड़कर श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग की दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए। राज अपने छोटे भाई विक्रमदित्य को दे दिया। वीर विक्रमादित्य भी श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से गुरू दीक्षा लेकर राजपाट सम्भालने लगे और आज उन्ही के कारण सनातन धर्म की रक्षा हुई, हमारी संस्कृति सुरक्षित हुई।

विक्रमादित्य के शासन काल को भारत का स्वर्णिम युग कहा जाता है। विक्रमादित्य के काल में भारत का कपड़ा, विदेशी व्यपारी सोने के वजन से खरीदते थे। भारत में इतना सोना आ गया था कि विक्रमादित्य काल में सोने की सिक्के चलते थे।

ऐसा कहा जाता है कि कई देवता भी उनसे न्याय करवाने आते थे। विक्रमादित्य के काल में हर नियम धर्मशास्त्र के हिसाब से होते थे। विक्रमादित्य का काल राम राज के बाद सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इनके शासन काल में प्रजा धर्म और न्याय पर चलने वाली रही।

राजा विक्रमादित्य की आराध्य देवी है माँ हरसिद्धि

शक्तिपीठों में महा शक्ति पीठ के रूप में उज्जैन का नाम जाना जाता है इसकी खास वजह यह है कि राजा विक्रमादित्य की आराध्य देवी मां हरसिद्धि का शक्ति पीठ यहां स्थापित है सभी शक्तिपीठों में 9 विधाओं का समावेश है लेकिन हरसिद्धि शक्ति पीठ में दस विधाएं है जिससे इसका महत्व तंत्र-मंत्र साधकों के बीच बहुत ही महत्वपूर्ण है।

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