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जानिए, क्यों मचा है अनुच्छेद 35 ए पर घमासान

नई दिल्ली 7 अगस्त 2018 । जम्मू कश्मीर के अनुच्छेद (Article) 35 ए कानून को लेकर दिल्ली से लेकर कश्मीर तक सियासी घमासान छिड़ गया है। अनुच्छेद 35 ए कश्मीर से हटाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में तीन याचिकाएं दायर हैं। महबूबा मुफ्ती ने सुनवाई का वक्त आगे बढ़ाने की मांग की है। खराब कानून व्यवस्था और पंचायत चुनाव के चलते महबूबा मुफ्ती ने फिलहाल यह सुनवाई टालने की मांग की है। जबकि इस सुनवाई के खिलाफ अलगाववादी नेताओं ने बागी सुर इख्तियार कर लिए हैं। उनका कहना है कि अगर अनुच्छेद 35 ए हटा तो राज्य में खूनखराबा हो जाएगा। दरअसल, इस पर इतना हो हल्ला क्यों है और अनुच्छेद 35 ए में ऐसा क्या है अनुच्छेद 35ए के तहत जम्मू कश्मीर की असेंबली को नागरिकता और उसकी परिभाषा तय करने का अधिकार मिला हुआ है।

इसमें राज्य सरकार तय करती है कि अन्य राज्यों से आए लोगों और शरणार्थियों को वह राज्य का हिस्सा माने या नहीं, उनको वह एक नागरिक होने के नाते मूलभूत सुविधाएं दे या नहीं।

भारत के संविधान में अनुच्छेद 35 14 मई 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने शामिल किया था।

1956 में बने जम्मू कश्मीर के संविधान के मुताबिक जम्मू कश्मीर का स्थायी नागरिक वही माना जाएगा जो 14 मई 1954 को राज्य का नागरिक रहा हो या फिर उससे पहले के 10 वर्षों से राज्य में रह रहा हो साथ ही उसने वहां संपत्ति हासिल की हो।

धारा 370 के अंतर्गत आने वाले अनुच्छेद 35ए के मुताबिक दूसरे राज्य का नागरिक जम्मू-कश्मीर में ना तो संपत्ति खरीद सकता है और ना ही वहां का स्थायी नागरिक बनकर रह सकता है।

इस अनुच्छे से कई महिलाएं भी सहमत नहीं हैं, इसका कारण यह है कि अगर कोई कश्मीरी महिला किसी अन्य राज्य के लडक़े से शादी कर लेती है तो उसे राज्य की नागरिकता नहीं मिलती और वह संपत्ति से भी बेदखल कर दी जाती है।

जबकि पुरुषों के साथ ऐसा नहीं है अगर कोई कश्मीरी पुरुष अन्य राज्य की लडक़ी से शादी करता है तो इस कानून के मुताबिक उस लडक़ी को बहू बनकर सभी मूलभूत सुविधाएं ओर अधिकार हासिल होते हैं।

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