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मंटो बड़े या नवाजुद्दीन सिद्दीकी? नंदिता दास की किताब के कवर पर खड़ा हुआ बखेड़ा

नई दिल्ली 15 सितम्बर 2018 । हिंदी सिनेमा की भीड़ में अलग तरह की भूमिका के लिए मशहूर नंदिता दास की एक किताब के कवर पर हिंदी साहित्य में बखेड़ा खड़ा हो गया. दरअसल, अपने समय में सर्वाधिक लोकप्रिय और विवादित साहित्यकार-पत्रकार सआदत हसन मंटो के जीवन पर नंदिता के निर्देशन में “मंटो” नाम से एक फिल्म बनी है. नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने फिल्म में मंटो का किरदार निभाया है. फिल्म के लिए नंदिता ने मंटो की कहानियों और उनकी रचनाओं को खूब पढ़ा.

फिल्म के बाद नंदिता ने “मंटो” की मनपसंद 15 कहानियों का संकलन तैयार किया है. हिंदी और अंग्रेजी में ये संकलन पाठकों के बीच आने को तैयार है. वैसे कुछ प्रतियां मुंबई में बांटी भी गई हैं. हालांकि किताब आने से पहले ही उसके कवर पर विवाद शुरू हो रहा है. दरअसल, किताब के कवर पर मंटो या लेखक की बजाए नवाजुद्दीन की “तस्वीर” को जगह मिली है. जो मंटो का पोस्टर ही है. हिंदी के साहित्यकारों को ये बात नागवार लग रही है. इसे बाजार के आगे एक ईमानदार लेखक की “हत्या” कहा जा रहा है. स्वाभाविक तौर पर सवाल हो रहे हैं कि लेखक “मंटो” बड़े हैं या फिल्म में उनका किरदार निभाने वाले नवाजुद्दीन सिद्दीकी?

सोशल मीडिया पर हिंदी के युवा साहित्यकारों ने आरोप लगाए कि किताब से नवाजुद्दीन का ऐसा क्या जुड़ाव है जो उन्हें कवर पर जगह मिली. कुछ लोगों को उम्मीद नहीं थी कि नंदिता के संपादन में इस तरह की ‘हरकत’ होगी. इसे एक सम्मानित लेखक की उपलब्धियों की कीमत पर किताब बेचने का सस्ता हथकंडा बताया जा रहा है. बताते चलें कि किताब का प्रकाशन, मंटो फिल्म बनाने वाला प्रोडक्शन हाउस और राजकमल प्रकाशन समूह संयुक्त रूप से कर रहा है.

कैसे सामने आया विवाद?

कवर को लेकर विवाद मुंबई में “मंटो” फिल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग के बाद शुरू हुआ. दरअसल, किताब की कुछ प्रतियां 5 सितंबर 2018 को वितरित की गई थीं. कवर की भनक लगते ही साहित्यकारों का एक धड़ा सोशल मीडिया में इसकी आलोचना करने लगा. इस धड़े में ज्यादातर युवा साहित्यकार, पत्रकार और मंटो को चाहने वाले एक्टिविस्ट हैं.

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