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मोदी-शाह की जोड़ी से मुक्त होगी बीजेपी

नई दिल्ली 8 जून 2019 । बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह अब मोदी सरकार में आ गए हैं. गृह मंत्रालय का जिम्मा उनके पास है. अब सवाल ये है कि पार्टी कौन संभालेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि बीजपी में एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है. मतलब ये कि एक ही व्यक्ति दो पदों पर काम नहीं कर सकता है. 2014 में भी राजनाथ सिंह को इसी नीति के तहत पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा था. अब अमित शाह को भी इसीलिए पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ना है.

आज की बात करने से पहले हम आपको वक्त में थोड़ा पीछे ले चलते हैं. साल 2009, लोकसभा चुनाव से ठीक पहले मोहन भागवत ने आरएसएस की कमान संभाली थी. देश में लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका था. अटल बिहारी वाजपेयी अपने स्वास्थ्य की वजह से पूरी तरह से राजनीति से निष्क्रिय हो चुके थे और बीजेपी की राजनीति के पुरोधा माने जाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी निकल पड़े थे चुनावी अभियान पर. आडवाणी अपने साथ लगे पीएम इन वेटिंग के तमगे को पीएम में बदलना चाहते थे. इसलिए उन्होने चुनाव का मुद्दा बना डाला कमजोर पीएम मनमोहन सिंह बनाम लौह पुरूष आडवाणी. नतीजे आए और आडवाणी फिर पीएम इन वेटिंग ही रह गए.

ऐसे में कुछ ही महीने पहले संघ की कमान संभालने वाले मोहन भागवत आगे आए. साफ कर दिया कि बीजेपी को बदलना होगा, नया राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनना होगा, नए नेताओं को मौका देना होगा. भागवत ने यह भी साफ कर दिया कि नया राष्ट्रीय अध्यक्ष दिल्ली की चौकड़ी से बिल्कुल नहीं होगा, कतई नहीं होगा. दिल्ली में कुंडली मार कर बैठे बीजेपी नेताओं में कुलबुलाहट होने लगी तो फिर भागवत को 28 अगस्त 2009 को दिल्ली में प्रेस क्रांफ्रेंस कर यह कहना पड़ा कि वो संकोच नहीं लिहाज करते हैं और बिन मांगे सलाह नहीं देते. तलाश शुरू हुई नए अध्यक्ष की, और नजरें जाकर टिक गईं गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर पर, ताजपोशी की तैयारी शुरू ही हुई थी कि आडवाणी पर उनका एक विवादित बयान सामने आ गया.

आडवाणी ने तुरंत इस मौके को लपक कर वीटो लगा दिया लेकिन कमल को खिलाने के लिए तालाब का पानी बदलने पर अड़े संघ ने तलाश जारी रखी और इस बार उन्होंने चुना महाराष्ट्र के दिग्गज नेता नागपुर के नितिन गडकरी को. गडकरी ने पार्टी की कमान संभाली. उन्हें दोबारा अध्यक्ष बनाने के लिए बीजेपी ने अपने संविधान तक को बदल दिया, हालांकि गडकरी दोबारा अध्यक्ष नहीं बन पाए. संघ ने फिर से राजनाथ सिंह पर भरोसा किया, उन्हें पार्टी की कमान थमाई. लेकिन दिल्ली की चौकड़ी से खफा संघ तब तक यह भी तय कर चुका था कि 2014 का चुनाव नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़ना है. मोदी दिल्ली आए, साथ में अमित शाह को भी लाए. 2014 का चुनाव जीता, सरकार बनाई और पार्टी की कमान अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगी अमित शाह को थमा दी. अब शाह सरकार में शामिल हो चुके हैं और एक बार फिर से बीजेपी के नए अध्यक्ष की तलाश शुरू हो गई है लेकिन बड़ा सवाल है– नया अध्यक्ष चुनेगा कौन ?

बीजेपी के अगले अध्यक्ष की रेस में सबसे आगे जे.पी. नड्डा को बताया जा रहा है. नड्डा मोदी की पिछली सरकार में कैबिनेट मंत्री थे लेकिन इस बार उन्हें सरकार में शामिल नहीं किया गया है और उसी के बाद से उनके अध्यक्ष बनने को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं. मोदी-शाह दोनों के भरोसेमंद नड्डा ने इस बार यूपी में सपा-बसपा गठबंधन के बावजूद एनडीए को 64 सीटें जिताकर अपनी रणनीति का लोहा तो मनवा ही लिया है. संगठनात्मक मामलों में मजबूत पकड़ रखने वाले नड्डा हिमाचल प्रदेश के ब्राह्मण समुदाय से आते हैं.

अध्यक्ष पद के दूसरे सबसे बड़े दावेदार पार्टी के महासचिव भूपेंद्र यादव बताए जा रहे हैं. अमित शाह के करीबी भूपेंद्र यादव ने यूपी विधानसभा जीत के समय महत्वपूर्ण भुमिका निभाई थी. इस बार के लोकसभा चुनाव में भी यादव ने गुजरात और बिहार में अमित शाह को निराश नहीं किया. कानूनी मामलों के जानकार भूपेंद्र यादव भी मोदी और शाह के करीबी माने जाते हैं. ओम माथुर का नाम भी इस पद के लिए चर्चा में है.

या बनेगा कोई और…बीजेपी में शीर्ष पदों को लेकर हमेशा चौंकाने वाले नाम आए हैं. संघ तो हमेशा से ही इसमें माहिर रहा है और नरेंद्र मोदी अमित शाह की जोड़ी ने भी कई बार यह साबित किया कि उनकी थाह ले पाना इतना भी आसान नहीं है. कहा तो यहां तक जा रहा है कि क्या पार्टी और सरकार दोनों को ही पूरी तरह से एक ही व्यक्ति के हाथ में संघ जाने देगा ? अगर इसका जवाब हां है तो फिर निश्चित तौर पर जे.पी. नड्डा और भूपेंद्र यादव इस रेस में सबसे आगे चल रहे हैं लेकिन अगर इसका जवाब ना है तो फिर हमें एक चौंकाने वाले नाम के लिए तैयार रहना चाहिए.

सुबह कोई पूछ न हो, रात को 6 कैबिनेट कमेटी में आ जाये, उसे राजनाथ सिंह कहते हैं

नयी सरकार के चुनाव और मंत्रिमंडल के गठन के बाद केंद्र सरकार में एक नयी जल्दबाजी दिखाई दे रही है. सरकार कई किस्म की कमेटियों का गठन कर रही है. कमेटियां क्यों? सरकार कई मोर्चों पर एक साथ काम करना चाह रही है. रोज़गार, आवास, सुरक्षा, आर्थिक और भी कई सारे फ्रंट पर कमेटियां बनी हैं. सरकार की मंशा ज़ाहिर होती है कि वह इन मोर्चों पर चुनौतियों को एक साथ डील करना चाह रही है. सरकार ने कुल मिलाकर आठ कमेटियां गठित की हैं.

मोदी सरकार ने मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति, आवास मामलों की समिति, आर्थिक मामलों की समिति, संसदीय मामलों की समिति, राजनीतिक मामलों की समिति, सुरक्षा मामलों की समिति, विकास मामलों की समिति और कौशल विकास समिति नाम से 8 समितियां यानी कमेटियां गठित कीं.

लेकिन इन कमेटियों के गठन के साथ देश के नए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ जो हुआ है, वह काफी रोचक है. जब 5 जून को इन कमेटियों के गठन की अधिसूचना आई, तो राजनाथ सिंह का नाम 8 में से महज़ 2 कमेटियों में था. यह आदेश 6 जून की सुबह 5.57 बजे आया था. तब राजनाथ सिंह का नाम केवल आर्थिक मामलों और सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडल कमिटी में शामिल था. बाकी कमेटियों में राजनाथ सिंह का नाम शामिल नहीं था.

आठ में से महज़ दो कमेटियों में राजनाथ सिंह का नाम होने पर दिन भर सोशल मीडिया के साथ-साथ खबरों में भी यह चर्चा होती रही कि राजनाथ सिंह सरकार के लिए उतने ज़रूरी नहीं रहे.

लेकिन आधी रात होते-होते नया आदेश आया. राजनाथ सिंह का नाम चार और कमेटियों में शामिल कर दिया गया. आर्थिक और सुरक्षा मामलों की समिति के अलावा नए रक्षामंत्री का नाम संसदीय मामले, राजनीतिक मामले, विकास मामले, और कौशल विकास मामलों की समिति में शामिल किया गया है. बदलाव भी ऐसा कि राजनाथ सिंह को संसदीय मामले की समिति का प्रमुख भी बना दिया गया.

ऐसे में सवाल उठता है कि ऐसा क्या हुआ कि राजनाथ सिंह पहले 2 कमेटियो में शामिल थे, फिर सोलह घंटे के भीतर 6 कमेटियो में उनका नाम शामिल कर दिया गया. सरकार और सूत्र इस बारे में कोई जानकारी नहीं देते हैं.

लेकिन इसको जानने के लिए देखते हैं नए गृहमंत्री अमित शाह का प्रोफाइल. राजनाथ सिंह के उलट, अमित शाह को सभी आठ कमेटियों में शामिल किया गया है. केन्द्रीय राजनीति में राजनाथ सिंह लम्बे समय से सक्रिय हैं. भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुके हैं. लेकिन उनको दो कमेटियों में, और अमित शाह को सभी आठ कमेटियों में शामिल करने पर यह अंदाज़ लगाया जा रहा है कि राजनाथ सिंह का ओहदा सरकार में घट गया है. और अमित शाह अब नरेंद्र मोदी के बाद दूसरे नंबर पर हैं.

खासकर राजनीतिक मामलों और संसदीय मामलों से जुडी समिति में राजनाथ सिंह का नाम न होने से यह चर्चा हुई कि लम्बे समय तक संसदीय राजनीति में सक्रिय रहने वाले राजनाथ का नाम क्यों गायब है? वह भी तब, जब अरुण जेटली और सुषमा स्वराज के मंत्रिमंडल में ना रहने पर राजनाथ सिंह नए मंत्रिमंडल में शायद सबसे वरिष्ठ नेता हैं.

लेकिन महज़ 16 घंटों के अंदर राजनाथ सिंह का नाम चार और कमेटियों में शामिल करने की वजह क्या है? इसके बारे में कोई जानकारी तो मुहैया नहीं कराई गयी है. लेकिन “इंडियन एक्सप्रेस” ने सूत्रों के हवालों से लिखा है,

“पहली अधिसूचना आने के तुरंत बाद सरकार की जो छवि बनने लगी, शायद उसके तहत ही मंत्रिमंडल कमिटी में बदलाव करके राजनाथ सिंह का नाम शामिल किया गया.

भाजपा पर लम्बे समय तक यह आरोप लगा करते हैं कि पार्टी में वरिष्ठ नेताओं की कोई पूछ नहीं है. ऐसे आरोप नरेंद्र मोदी और अमित शाह के केन्द्रीय राजनीति में आने के बाद ज्यादा तल्ख़ हुए हैं. आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज समेत तमाम वरिष्ठ नेताओं के उदाहरण दिए जाते हैं. ऐसे में यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या राजनाथ सिंह को मार्गदर्शक मंडल का अगला सदस्य बनाया जाएगा?

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