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मप्र: भाजपा नेताओं ने एक दूसरे के खिलाफ तानी आस्तीनें

भोपाल 2 जून 2018 । भाजपा के नेता ही दूसरे के खिलाफ आग उगलते दिखे जिसससे राजनीति गरमा गई है। मामला यह है कि पूर्व मंत्री एवं मुरैना सांसद अनूप मिश्रा गुरुवार को अल्प प्रवास पर गुना आए। यहां भाजपाजनों ने स्थानीय सर्किट हाउस में श्री मिश्रा का स्वागत किया। इस दौरान भाजपा के दो बड़े नेताओं में अनूप मिश्रा के समक्ष ही तू-तू, मैं-मैं हो गई। किसी तरह अन्य भाजपा नेताओं की समझाईश के बाद दोनों नेता शांत हुए। लेकिन जाते-जाते दोनों नेताओं ने एक-दूसरे को देखकर अपनी आस्तीनें तान दी।
मामले के अनुसार पूर्व मंत्री अनूप मिश्रा ग्वालियर से रवाना होकर दोपहर में गुना पहुंचे। यहां उन्होंने स्थानीय सर्किट हाउस में आराम कर कार्यकर्ताओं ने मुलाकात की। पूर्व मंत्री के स्वागत में अनेकों भाजपा कार्यकर्ता एवं पदाधिकारी सर्किट हाउस पहुंचे। इस दौरान यहां स्वागत करने पहुंचे पूर्व राज्यमंत्री केएल अग्रवाल और नपाध्यक्ष राजेन्द्र सिंह सलूजा का अनूप मिश्रा के सामने मुंहवाद हो गया। जुबानी जंग के बाद दोनों नेताओं ने अपनी-अपनी आस्तीनें तान दी। इधर दोनों नेताओं के बीच वाकयुद्ध से माहौल गरमा गया। किसी तरह दोनों नेतागणों को समझाईश के बाद चुप गया। इसके पूर्व मुरैना सांसद श्री मिश्रा ने मीडिया से चर्चा करते हुए कहा कि वह भाजपा के स्वयंसेवक है। चुनाव लडऩा है कहां से लडऩा है यह पार्टी तय करेगी।

चुनावी समर से भागने की फिराक में कुछ मंत्री

मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार चौथी बार आने का सपना संजोये है और इसके लिये तैयारी भी चल रही है। पार्टी संगठन लगातार कार्यकर्ताओं में जोश लाने का प्रयास कर रहा है, लेकिन अब हालत यह है कि सरकार में बैठे आधे मंत्री अफसरशाही की वजह से उपेक्षित है और अपने क्षेत्र मेंं काम न हो पाने की वजह से चुनावी समर में उतरने से पीछे हटने लगे हैं।
कांग्रेस की बढती सक्रियता और उप चुनावों के नतीजों से भी कुछ मंत्रियों व विधायकों के चेहरों पर हताशा के भाव हैं। लेकिन मुख्यमंत्री अपनी दम पर इस बार के चुनावों में भी पार्टी की नैय्या पार लगाने की कोशिश कर रहे हैं। यह बात सही है कि मुख्यमंत्री ने जमकर मेहनत की है, लेकिन उनके आधा दर्जन मंत्रियों को छोड कर अन्य सभी मंत्री फिसडडी साबित हो रहे हैं।
जिन मंत्रियों ने लगातार बेहतर काम किया है , जिनकी परफारर्मेंस रिपोर्ट अच्छी है उनमें जन संपर्क मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा, गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह, उच्च शिक्षा मंत्री जयभान सिंह पवैया, सामान्य प्रशासन मंत्री लाल सिंह आर्य, नगरीय प्रशासन मंत्री श्रीमती माया सिंह शामिल हैं। यह मंत्री अपने क्षेत्रों में लगातार सक्रिय रहे हैं। इसी कारण यह मुख्यमंत्री की कोर टीम में भी शामिल हैं। यह ऐसे मंत्री हैं, जो नामजदगी का परचा भरकर अपने क्षेत्र में न भी जायें तो भी विजयश्री का वरण कर लेगें।

किसान आंदोलन को लेकर मुख्यमंत्री ने अपना मानसिक संतुलन खोया

नेता प्रतिपक्ष श्री अजय सिंह ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा किसान आंदोलन को लेकर जो लगातार बयानबाजी की गई, इससे लगता है कि वे अपनी अगले चुनाव में हार को देखते हुए और अपनी नाकामयाबियों मानसिक संतुलन खो चुके हैं। श्री सिंह ने कहा कि प्रदेश में जो आज किसान आंदोलन शुरू हुआ है। वह बताता है कि मुख्यमंत्री पिछले 13 साल से प्रदेश के लोगों को खेती-किसानी को लेकर झूठ बोल रहे थे और किसानों को धोखा दे रहे थे। श्री सिंह आज विंध्य प्रदेश में न्याय यात्रा के चौथे दिन सीधी, मउगंज, देवतालाब, मनगवां और रायपुर कर्चुलियान में जनसभाओं को संबोधित कर रहे थे। इस मौके पर वरिष्ठ विधायक श्री सुंदर लाल तिवारी, श्री सुखेन्द्र सिंह बना एवं हालही में बसपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुई सुश्री विमला पटेल भी उपस्थित थी।

नेता प्रतिपक्ष श्री अजय सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री पिछले कई दिनों से लगातार किसान आंदोलन और मंदसौर गोलीकांड की बरसी पर कांग्रेस पार्टी द्वारा आयोजित कार्यक्रम को लेकर अनर्गल बयानबाजी कर रहे हैं। मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें प्रदेश की जनता को यह विश्वास दिलाना था कि कोई हिंसा नहीं होगी लेकिन उल्टे वे और उनका तंत्र हिंसा की संभावना जताकर लोगों में दहशत पैदा कर रहे हैं। श्री सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री की यह मानसिक स्थिति बतलाती है कि वे दिन-प्रतिदिन उनकी सरकार के खिलाफ बढ़ रहे जन असंतोष से बौखला गए हैं। उन्होंने कहा कि पिछले 14 साल से कृषिकर्मण अवार्ड, कृषि विकास दर, कृषि बजट और कृषि कैबिनेट के नाम पर वे लगातार किसानों को धोखा दे रहे थे। भावांतर योजना में उनकी किसान हितैषी नीतियों की पोल खोल दी, क्योंकि इससे किसान बेहाल हो गया और उसके आर्थिक हित व्यापारियों के हाथों गिरवी रख दिए गए। किसानपुत्र कहने वाले मुख्यमंत्री के राज में दो बार गोली चालन हुआ बरेली में जहां एके 47 से किसान की जान ली गई वहीं मंदसौर के पिपल्यामंडी में किसानों की छाती पर गोली चलाई गई। आज अगर प्रदेश में कोई सबसे ज्यादा दुःखी है तो वह हमारा अन्नदाता किसान ही है।

नेता प्रतिपक्ष श्री अजय सिंह ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी के 15 साल पूरे होने जा रहे हैं आज भी गरीबी रेखा के नीचे जी रहा व्यक्ति बेहतर जीवन जीने का मौहताज है। उसकी बेहतरी का दावा तो शिवराज जी ने बहुत किया लेकिन स्थिति क्या है इसका खुलासा खुद मुख्यमंत्री ने किया, जब वे चुनावी वर्ष में असंगठित मजदूरों को लुभाने के लिए योजनाओं को पिटारा बता रहे हैं।

श्री सिंह ने कहा कि जनता खुद देखें कि सरकार की कथनी करनी में कितना अंतर है और यही भाजपा का असली चरित्र, दोमुही नीति और दोहरा चेहरा है।

उप चुनाव के संकेतों का अर्थ जानिये

उप चुनावों के नतीजे बीजेपी के लिये खतरे की घंटी बजा रहे हैं। यदि कुछ माह पूर्व हुए उप चुनावों के परिप्रेक्ष्य मे इन्हें देखा जाय तो स्थिति बीजेपी के लिये और खतरनाक दिखायी देती है। हालांकि अभी से २०१९ में इस पार्टी के लिये उल्टी गिनती घोषित कर देना थोड़ी जल्दबाजी होगी।
आज के उपचुनावों मे यदि सारे परिणामों को दरकिनार कर केवल कैराना लोकसभा व नूरपुर विधान सभा की बात की जाय तो अधिक सार्थक होगा। यहाँ पर क्रमशरू रालोद और सपा बीजेपी से सीटें छीन कर जीती हैं। उत्तर प्रदेश से ७१़२ सीटें जीत कर २०१४ मे बीजेपी अपने बूते पर सरकार बनाने मे सफल हुई थी।उसके प्रभाव के अन्य राज्यों से भी उसे भरपूर सीटों की फसल मिली थी। २०१४ की बीजेपी की उ प्र की जीत हिन्दू ध्रुवीकरण तथा जातिगत पार्टियों के वोट बँट जाने से सम्भव हुई थी।हमेशा साम्प्रदायिक तापमान घटते ही उ प्र मे बीजेपी नीचे आ जाती है। उ प्र का जाट अब हिन्दू से फिर जाट मे परिवर्तित हो गया है ।पूर्वी उ प्र के गोरखपुर और फूलपुर की करारी पराजय के बाद अब यह पश्चिम की हार बीजेपी को हलाकान कर देगी । धार्मिक उन्माद जातिगत गिरोहबंदी के आगे कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है।
मेरे मत से आज के अन्य महत्वपूर्ण परिणाम भंडारा लोकसभा मे एनसीपी द्वारा बीजेपी से तथा जोकीहाट विधान सभा मे आरएलडी द्वारा जेडीयू से सीटें छीनना है।पालघर मे शिवसेना की बीजेपी से हार भी विचारणीय है। समग्र रूप से इन चुनावों के भविष्य की राजनीति मे पड़ने वाले प्रभाव मेरे मत से संक्षेप मे निम्नानुसार है।
बीजेपी अब बहुत सतर्क हो जायेगी। राज्यों के आगामी चुनावों के लिये उसका सशंकित हो जाना स्वाभाविक है।केन्द्र सरकार अब राष्ट्रहित की आर्थिक नीतियों को छोड़कर कांग्रेसी ढर्रे पर लोकलुभावने कार्यक्रमों पर पैसे लुटाना शुरू कर देगी । किसानों के लिये बड़ी घोषणाएँ होंगीं क्योंकि पिछड़ा वर्ग मुख्यतया किसान है और विपक्ष से सहानुभूति रखता है।बीजेपी का सहयोगी दलों के प्रति व्यवहार नरम होगा और बचे खुचे दलों को सहयोगी बनाने का उसका प्रयास प्रारम्भ होगा । उसे शिवसेना का फूला मुँह ठीक करना होगा । सबसे महत्वपूर्ण बात होगी कि आमचुनाव के पहले साम्प्रदायिक तनाव को उसके द्वारा हवा दी जायेगी।
कांग्रेस का मनोबल कुछ बढ़ेगा। जहाँ उसकी बीजेपी से सीधी टक्कर है वहाँ पर वह संगठित होकर वह पूरी ऊर्जा से लड़ेगी । जहाँ विपक्षी पार्टियाँ बलशाली है वहाँ उसे मैदान खाली करना पड़ेगा। दो तथ्य स्वयंसिद्ध है। पहला यह कि तरह तरह की विपक्षी दलों की आपस मे बैठने के लिये जो शर्म और झिझक थी वह अब कम हो रही है। अस्तित्व के लिये यह उनके लिये आवश्यक है। दूसरा कांग्रेस अब अपना चक्रवर्ती रूप छोड़ कर अब अपनी वर्तमान क्षमता के अनुसार व्यवहार करेगी और मोदी को हटाने के लिये राहुल गांधी अपना प्रधानमंत्री का दावा तक छोड़ सकते हैं।
कुछ दिन पहले मैंने कहा था कि २०१९ के चुनाव काँटे के होंगे। संघर्ष अब विकट हो गया है । तमाम प्रयासों के बाद भी बीजेपी के लिये उसका एकमात्र अमोघ अस्त्र मोदी ही हैं । सारे नेताओं से काफी ऊँचे कद से निकली उनकी आवाज भारतीय जनमानस को कितना प्रभावित कर पायेगी यह अभी भविष्य के गर्त में छिपा है।

“लेखक एन के त्रिपाठी आई पी एस सेवा के मप्र काडर के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। उन्होंने प्रदेश मे फ़ील्ड और मुख्यालय दोनों स्थानों मे महत्वपूर्ण पदों पर सफलतापूर्वक कार्य किया। प्रदेश मे उनकी अन्तिम पदस्थापना परिवहन आयुक्त के रूप मे थी और उसके पश्चात वे प्रतिनियुक्ति पर केंद्र मे गये। वहाँ पर वे स्पेशल डीजी, सी आर पी एफ और डीजीपी , एन सी आर बी के पद पर रहे। वर्तमान मे वे मालवांचल विश्वविद्यालय , इंदौर के कुलपति हैं। वे अभी अनेक गतिविधियों से जुड़े हुए है जिनमें खेल, साहित्य एवं एन जी ओ आदि है। पाठन एवं देशाटन मे उनकी विशेष रूचि है।”

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