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परिणाम से पहले ही एनडीए मे दरार और बीजेपी मे खलबली

नई दिल्ली 13 मई 2019 । भाजपा के दो प्रमुख नेता सुब्रामय्म स्वामी और राम माधव के माध्यम इस चुनाव मे बीजेपी के अपने दम पर सरकार बनाने के लिए बहुमत से दूर रहने की स्वीकृति से एनडीए के बीच खलबली मची हैं।

उत्तर प्रदेश में, अनुप्रिया पटेल का अपना दल, पंजाब में अकाली दल, महाराष्ट्र में शिवसेना और तमिलनाडु में AIADMK की हालत खराब है। आरएसएस और भाजपा के उच्च पदों के सूत्रों का मानना है कि एनडीए संबद्ध दलों की कमजोर स्थिति के कारण, इस लोकसभा चुनाव में आवश्यक संख्या हासिल करना टेड़ी खीर साबित हो सकती है।

पीएम मोदी और बीजेपी को अब अकाली दल जैसे छोटे साथी भी नजरे दिखाने लगे हैं। अकाली दल के राज्यसभा सदस्य सांसद नरेश गुजराल मोदी और राहुल गांधी के बीच लड़ाई की शुरुआत से अप्रसन्न है। वाराणसी में नामांकन दाखिल करने के दिन अकाली दल के वरिष्ठ नेता प्रकाश सिंह बादल के पैर छूने के प्रधानमंत्री मोदी के प्रयासों के बावजूद, अकाली कैलासर इस तथ्य से नाखुश है कि बेरोजगारी और किसानों के चित्र पर चुपचाप टिप्पणी के साथ साथ नोटबंदी और जीएसटी के नाकारत्मक प्रभाव से आम लोगों और व्यापारियों पर पर्दा डालकर कांग्रेस के चुनाव अभियान को मजबूत किया जा रहा है। केंद्र मे मंत्री हर्समत कोर बादल और उनके पति सुखबीर बादल मोदी सरकार मे अकाली दल को पूर्ण महत्व न मिलने से नाराज है।

बिहार में दो चरणों में वोटिंग शेष रहते हुए, वहा की मुख्य NDA साझेदार पार्टी जनता दल, यूके एमएलसी और प्रवक्ता गुलाम रसूल बलयावी ने राज्य मे NDA की प्राथमिकता का सेहरा नितीश कुमार को देते हुए उन्हे पीएम बनाने की मांग करके बीजेपी के घावो पर नमक छिड़क दिया है। हालांकि भाजपा के सूत्रों ने इस मांग को खारिज करते हुए कहा है कि जनता दल यू के नेता पार्टी के मुस्लिम कैडर को बनाए रखने के लिए पहले भी इसी तरह का बयान देती रहे है।

प्रधान मंत्री मोदी की पिछले सप्ताह दरभंगा रैली के दौरान भारत माता की जय के मोदी के नारे के बीच नितीश कुमार के मंच पर खामोशी से बैठे रहने पर जनता दल यू के महासचिव और संसद के पूर्व सदस्य के सी त्यागी ने कहा सार्वजनिक मंच पर भारत माता की जय का नारा भारतीय जनता पार्टी के लोग आरएसएस के दौर से लगाते रहे हैं। वो लगाए लेकिन हम नही लगा सकते, क्योंकि समाजवादियों के पास जनता, किसानों, श्रमिकों और गरीबों को अधिकार दिलाने के नारे है जो पहले की तरह आज भी महत्वपूर्ण हैं। ”

महाराष्ट्र में भाजपा का सबसे महत्वपूर्ण हिंदुत्व सहयोगी, शिवसेना ने सिर्फ चुनाव के कारण लड़ाई बंद कर रखी है, महाराष्ट्र की राजनीति के विशेषज्ञों का कहना है कि शिवसेना कई प्रमुख सीटों पर कांग्रेस-एनसीपी से पीछे है। लगता है ऐसी जमीनी रिपोर्ट है कि भाजपा के साथ शिवसेना का वोट-ट्रांसफर उम्मीद के मुताबिक नहीं हुआ। कारण यह है कि शिवसेना के साथ बीजेपी महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने मोदी सरकार की 5 साल कार्यशालाओ का काला चिठ्ठा अपनी रैली में जिन तेवरो के साथ खोला है, उससे शिव सेना के साथ बीजेपी भी बहुत मुशकिल मे है।

शिव सेना को उम्मीद के मुताबिक सीटें नहीं मिलने से भी हालत खराब हुई हैं। बीजेपी के साथ बीते 5 सालो से अधिक कड़वे रिशतो के कारण बीजेपी मे यह आशंका पैदा हो रही है मोदी का सत्ता मे वापसी का नंबर कमजोर पड़ा तो शिव सेना पहली पार्टी होगी जो उससे पीछा छुड़ाएगी। इसके अलावा, सूत्रों का कहना है कि महाराष्ट्र में कुछ महीनों बाद होने वाले विधानसभा चुनाव मे शिवसेना मुख्यमंत्री का पद हर कीमत पर चाहती हैं।

दक्षिण भारत का सबसे बड़ा राज्य, तमिलनाडु में, अन्नाद्रमुक पार्टी के उग्र से भी बीजेपी परेशान है, क्योंकि भाजपा इस समय एकजुट है। तमिल विशेषज्ञों का कहना है कि बीजेपी को यहां बहुत झटका लगेगा क्योंकि डीएम-कांग्रेस के मजबूत गठबंधन के सामने एआईएडीएमके-बीजेपी बहुत कमजोर दिख रही है। ऐसा कहा जाता है कि तमिलनाडु की 39 पर और पांडिचेरी की एक सीट पर हार भाजपा को दिल्ली पहुंचने की उम्मीदों को झटका दे सकता है।

असम मे नागरिक संशोधन बिल के माध्यम से राजनीतिक गतिविधिया सहन कर रहे आसाम गन परिषद् (ए जी पी) और बूडो पीपल्ज फ्रंट (बी पी एफ) के साथ सीटो के तालमेल से संघर्ष का पारा थम नही पाया। इन दोनों दलों का जनादेश खतरे में है। दोनों को समझौते में 3 और 1 सीट मिली है। चुनाव विश्लेषण बता रहा है कि इन दोनों का सीट निकाल पाना बहुत मुश्किल है।

उधर उड़ीसा मे भी बीजेपी पहले ही अपनी ताकत दिखा चुकी है। मुख्यमंत्री नवीन पटनायक अपने पत्ते नतीजों से पहले नहीं खुलने जा रहे हैं। आंध्रा और तेलंगाना में जगन मोहन रेड्डी और मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव करीबी सूत्रों के अनुसार, दोनों नेता इस बार कमजोरियों और संघर्षों में फसी मोदी-अमित शाह की भाजपा का अमृत देने के लिए कोई कदम आगे नहीं रखेंगे।

विपक्ष ही नहीं, मोदी को रोकने के लिए BJP के 17 दिग्गजों ने भी चला बड़ा दांव, ‘संघ में महामंथन’

देश की संसद में दोबारा कमल खिलाने के मंसूबों के साथ जहां मोदी योगी और अमित शाह की तिकड़ी दिन रात एक किये हुए है वहीं पार्टी का एक दूसरा धड़ा इस तिकड़ी के बढ़ते कदमों को रोकने के लिए लामबंद हो गया है। ऐसी खबरें आ रही हैं कि मोदी सरकार के चार कैबिनेट मंत्री समेत 17 बड़े नेताओं ने आरएसएस के मुख्यालय नागपुर में संघ प्रमुख मोहन भागवत से अलग-अलग मुलाकात की है। अलग-अलग गुटों में गये बीजेपी के इन नेताओं ने भागवत से आग्रह किया है कि इस बार पार्टी की सरकार बनने की दशा में मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोका जाये।

इन सभी लोगों ने संघ प्रमुख के सामने अलग-अलग नजरिए से मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने की राय दी है। संघ प्रमुख से मिले बीजेपी के इन नेताओं में से जाहिर तौर पर कोई भी मोदी विरोधी तो नहीं है लेकिन समय-समय पर ऐसे बयान देते रहे हैं जिनसे उनके और मोदी के विचारों में भिन्नता दिखाई पड़ी है। बहरहाल, मोदी के चार कैबिनेट सहयोगी समेत जिन सत्रह लोगों ने मोदी को अगला प्रधानमंत्री न बनाये जाने का अभियान छेड़ा है उनका मत है कि मोदी के अतिमहत्वाकांक्षी और आक्रामक रवैये के कारण देश का एक बड़ा वर्ग बीजेपी से दूर जा रहा है। कश्मीर में आतंकवाद और देश में सांप्रदायिकता बढ़ने का एक कारण मोदी की आक्रामकता को बताकर ये लोग चाहते हैं कि बीजेपी का अगला प्रधानमंत्री ऐसा हो जिसके इरादे भले ही कितने ही कट्टर क्यों न हों लेकिन उसका चेहरा सौम्य होना चाहिए।

बीजेपी के इस ग्रुप 17 (जी-17) का मानना है कि भले ही गुजरात दंगा काण्ड में सुप्रीम कोर्ट ने भी मोदी को क्लीन चिट दे दी है लेकिन देश की जनता का एक वर्ग मोदी को ‘मुजरिम’ की नजर से ही देख रहा है। इस ग्रुप ने यह भी कहा है कि संघ को मोदी की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा पर निगाह रखनी चाहिए। पिछले और मौजूदा चुनावों में दिये गये नारे ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी’ और ‘फिर एक बार मोदी सरकार’ का उदाहरण देते संघ प्रमुख से कहा गया है कि मोदी का चेहरा पार्टी और संघ की विचारधारा पर हावी हो रहे हैं। मोदी को फिर से प्रधानमंत्री बनने से रोकने के प्रयासों में लगे बीजेपी की यह जी-17 संघ मुख्यालय को लिखित प्रतिवेदन भी दे चुका है। इनका कहना है कि मोदी संघ और पार्टी पर काबिज होकर देश को डायरेक्ट प्रेसिडेंशियल इलेक्शन सिस्टम की ओर धकेल रहे हैं। अगर ऐसा हो गया तो मोदी संविधान में परिवर्तन कर सर्व-शक्तिसंपन्न व्यक्ति बन सकते हैं। कहा तो यह भी जा रहा है इन सत्रह लोगो की संघ मुख्यालय को सलाह है कि अगर बीजेपी अपने दम पर पूर्ण बहुमत ले आये तो भी मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोका जाये।

बीजेपी के सत्रह बड़े नेताओं के इस समूह और संघ मुख्यालय के बीच चल रहे विचार-विमर्श पर पार्टी के ही कुछ लोग दबी जुबान में कह रहे हैं मोदी-योगी और अमित शाह के उदय से जिन लोगों को अपना भविष्य खतरे में नजर आ रहा है वो लोग ही मोदी को फिर से प्रधानमंत्री बनने में बाधा डालने की कोशिश कर रहे हैं। मोदी में संघ के संस्कार बचपन से हैं। लोकतंत्र को मजबूत करना ही उनकी मंशा है, लेकिन वो देश को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाने की विचारधारा के समर्थक हैं। अब चाहे वो डोमेस्टिक फ्रंट हो या एक्सटर्नल।

तोल-मोल शुरू: KCR ने मांगा डेप्युटी PM पद!

तेलंगाना के मुख्यमंत्री और टीआरएस सुप्रीमो केसीआर का कहना है कि 23 मई को चुनाव नतीजे के बाद अगर किसी घटक को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता तो वह गैर बीजेपी गठबंधन का न सिर्फ हिस्सा बनने को तैयार हैं, बल्कि इसके लिए पूरी सक्रिय भूमिका भी निभाने को तैयार हैं। इसके लिए उनकी अपनी शर्त है। उनकी शर्त है कि उन्हें विपक्षी गठबंधन डेप्युटी पीएम के रूप में प्रॉजेक्ट करें।

सूत्रों के अनुसार, उनकी अचानक सक्रियता इसी मुद्दे पर है। अब 21 मई को दिल्ली में होने वाली विपक्षी मीटिंग में वह तभी शामिल होंगे, जब उन्हें इस बारे में भरोसा दिलाया जाता है। केसीआर ने इस बारे में लेफ्ट नेताओं से बात कर उन्हें दूसरे विपक्षी दलों से इस बारे में बात करने को कहा है। कांग्रेस नेताओं तक यह बात पहुंचाई गई है।

वहीं, कांग्रेस ने अभी केसीआर के फॉर्म्युले पर कोई बात नहीं करने के संकेत दिए हैं। पार्टी का मानना है कि इन सब बातों पर नतीजे आने के बाद ही कोई बात होगी। हालांकि पार्टी नेता केसीआर के साथ संपर्क में जरूर हैं। केसीआर ने यह भी संकेत दिए हैं कि वह बीजेपी की अगुवाई वाली गठबंधन के साथ नहीं जाएंगे। सूत्रों के अनुसार, खुद को राष्ट्रीय राजनीति में लाकर वह अपने बेटे को तेलंगाना की कमान देना चाहते हैं।

जगनमोहन ने नहीं खोले पत्ते
वहीं, आंध्र प्रदेश के वाईएसआर कांग्रेस के सुप्रीमो जगनमोहन रेड्डी ने चुनाव नतीजे से पहले अपने पत्ते को नहीं खोलने के संकेत दिए हैं। सूत्रों के अनुसार अभी विदेश के दौरे पर गए जगन ने राष्ट्रीय राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करने की मंशा दिखाई है और वह चुनाव के बाद अपने राज्य के समीकरण को देखते हुए कोई फैसला लेंगे।

चंद्रबाबू ने बंद कमरे में की ममता से चर्चा
इस बीच आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और तेलुगूदेशम पार्टी अध्यक्ष एन चंद्रबाबू नायडू ने महागठबंधन के भविष्य की योजना पर खड़गपुर में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ बंद कमरे में चर्चा की। तृणमूल कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार बनर्जी और नायडू की मुलाकात गुरुवार शाम को करीब 15 मिनट तक चली।

तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ सदस्य ने बताया कि दोनों नेताओं ने महागठबंधन के भविष्य की योजना पर बात की। दोनों ने तेलुगूदेशम पार्टी के नेताओं की बुधवार को नई दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात के बारे में भी बातचीत की। इस सवाल पर कि क्या 21 मई को विपक्षी दलों की प्रस्तावित बैठक में बनर्जी शामिल होंगी, तृणमूल नेता ने कहा कि बैठक की तारीख अभी तय नहीं हुई है।

उन्होंने कहा कि हो सकता है कि बैठक कुछ दिन टल जाए और 23 मई के बाद हो। दीदी (ममता बनर्जी) इसमें भाग ले सकती हैं। तृणमूल नेता के मुताबिक समझा जाता है कि दोनों ने वीवीपैट के मुद्दे पर और लोकसभा चुनाव के पांच चरणों में मतदान प्रतिशत के बारे में चर्चा की।

अगले प्रधानमंत्री प्रणब मुखर्जी! संघ भी देगा समर्थन, विपक्ष के इस नेता ने फोड़ा सियासी बम

चुनाव खत्म होने से पहले ही राजनीति में उबाल आने शुरु हो गये हैं। सियासी नेता एक के बाद एक धमाके कर रहे हैं। इस बार सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने बम फोड़ा है। येचुरी ने कांग्रेस और राहुल गांधी के मंसूबों पर पानी फेरते हुए संकेत दिये हैं कि अगर एनडीए सरकार बनाने में विफल रहता है तो प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री बना सकता है। खास बात यह है कि प्रणब मुखर्जी के नाम पर शिवसेना और जदयू का समर्थन भी विपक्ष को मिल सकता है। येचुरी ने कहा कि चुनाव के बाद सभी विकल्प खुले हैं और प्रणब मुखर्जी को भी पीएम पद के लिए एप्रोच किया जा सकता है। साथ ही उन्होंने कहा कि प्रणब मुखर्जी के नागपुर जाने के बाद ये भी कहा जा रहा है कि अगर उन्हें प्रधानमंत्री बनाया जाता है तो वहां से उनके नाम पर कोई दिक्कत नहीं होगी।

हालांकि उन्होंने कहा कि जो भी नाम विपक्ष की तरफ से प्रधानमंत्री पद के लिए इस समय चर्चा में चल रहे हैं उन पर सभी पहलुओं से विचार किया जाएगा लेकिन जब तक आम चुनाव के नतीजे नहीं आ जाते तब तक निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है।

सीताराम येचुरी ने डॉ मनमोहन सिंह के नाम पर कहा कि इस समय उनकी उम्र का एक मसला है वर्ना वो बेहतरीन प्रधानमंत्री रहे हैं और उन्होंने देश को अच्छे से चलाया है। उनकी उम्र और एनर्जी के ऊपर निर्भर करता है कि प्रधानमंत्री पद के लिए उनके नाम पर विचार किया जाएगा या नहीं। इस समय देश में बहुत संभावनाएं चल रही हैं और ये सारी चर्चा इस समय किए जाने का मतलब इसलिए नहीं है क्योंकि जब तक चुनाव के नतीजे नहीं आ जाते तब तक कुछ स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता है। हालांकि एक बात तय है कि देश में वैकल्पिक धर्मनिरपेक्ष ताकतों की सरकार की जरूरत है और इसके लिए जो भी किया जाना जरूरी है वो किया जाएगा।

गहरे संकट की ओर बढ़ रही है भारतीय अर्थव्यवस्था: पीएम के आर्थिक सलाहकार का खुलासा
चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सरकार की आर्थिक कामयाबियों का बखान करते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रथिन रॉय ने एक टीवी कार्यक्रम में बताया कि भारतीय अर्थव्यवस्था गहरे संकट की ओर बढ़ रही है. उनके हिसाब से भारत भी ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे धीमी गति के विकासशील देशों की राह पर चल पड़ा है.

पीएम के आर्थिक सलाहकार ने कहा कि उनको डर है कि आर्थिक मंदी उसे घेर लेगी. रॉय का यह बयान ऐसे वक्त पर आया है, जब देश की अर्थव्यवस्था की सुस्ती पर सवाल उठने शुरू हुए हैं. वित्त मंत्रालय की मार्च 2019 की मासिक आर्थिक रिपोर्ट में भी यह बात कही गई थी कि भारत की अर्थव्यवस्था 2018-19 में थोड़ी धीमी हो गई. मंदी के लिए जिम्मेदार अनुमानित कारकों में निजी खपत में गिरावट, निश्चित निवेश में मामूली वृद्धि और मौन निर्यात शामिल है. रथिन रॉय ने आगाह करते हुए कहा कि अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम बहुत गहरा है.

राष्ट्रवाद पर बोल रही थीं महाजन, मंच पर चढ़े डॉक्टर, माइक छीनकर बोले- ‘आयुष्मान’ लाकर पेशे का कर दिया सत्यानाश

राष्ट्रवाद पर बोल रही थीं महाजन, मंच पर चढ़े डॉक्टर, माइक छीनकर बोले- ‘आयुष्मान’ लाकर पेशे का कर दिया सत्यानाशइंडियन मेडिकल एसोसिएशन के कार्यक्रम में पहुंचकर सरकार का गुणगान करने वाली लोकसभा स्पीकर व सांसद सुमित्रा महाजन…इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के कार्यक्रम में पहुंचकर सरकार का गुणगान करने वाली लोकसभा स्पीकर व सांसद सुमित्रा महाजन को डॉक्टरों की नाराजगी का सामना करना पड़ा। शुक्रवार को आईएमए के कार्यक्रम में पहुंचीं महाजन ने इस लोकसभा चुनाव को राष्ट्रवाद का चुनाव बताते हुए मोदी सरकार की स्वच्छ भारत योजना, उज्जवला योजना सहित अन्य योजनाओं के बारे में बताते हुए कहा सरकार के एक भी मंत्री पर एक पैसे के भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा है। इस पर यूरोलॉजिस्ट डॉ. केएल बंडी और डॉ. नरेंद्र पाटीदार ने मेडिक्लेम और आयुष्मान भारत योजना को कोसा।
डॉ. बंडी बोले हमारे पेशे को डाउन किया जा रहा है। मरीज के पास आयुष्मान कार्ड है। बीपीएल कार्ड होता है। यह डॉक्टरों के साथ कौन सा अन्याय है। योजनाओं का पैसा सरकार हमें समय पर नहीं देती। अस्पताल से काम करवा लेती है लेकिन पैसा बरसों नहीं आता। कारण आपको भी पता है कि सरकारी अफसरों को कुछ चाहिए। इसलिए आप ऐसा कानून लाएं कि यदि रिफंड समय पर नहीं होता तो छह प्रतिशत ब्याज से पैसा दिया जाएगा। आज टॉपर्स चिकित्सकीय पेशे में नहीं आना चाहते। मेरे खुद के दो ग्रेंड चिल्ड्रन हैं। उन्होंने डॉक्टर बनने से इनकार कर दिया है। इस पेशे का इतना सत्यानाश हुआ है और इसमें सरकार का बहुत बड़ा रोल है। सरकार हमें पीछे कर रही है। कम से कम हमारे पेशे को तो इज्जत बख्शो।
महाजन ने कहा- सामान्य ऑपरेशन के तीन से चार लाख रु. लग जाते हैं, डॉक्टर बोले- बिल बताएं, मैं डॉक्टरी छोड़ दूंगा
महाजन ने कहा माफ करना डॉक्टर साब, थोड़ा कठोर कह रही हूं और अपने अनुभव से कह रही हूं। डॉक्टर्स गांव जाने के लिए तैयार नहीं होते। वहां जाना पसंद करते हैं जहां एयर कनेक्टिविटी हो। बतौर सांसद मेरे पास लोग मदद के लिए आते हैं। कई बार अस्पताल के बिल देखकर चौंक गई हूं। सामान्य ऑपरेशन में तीन से चार लाख का खर्च बताते हैं। इस पर डॉ. बंडी ने महाजन के हाथ से माइक लेते हुए कहा आप मुझे एक बिल बताएं, जिसमें अस्पताल ने एवरेज बिल तीन से चार लाख का दिया हो। मैं डॉक्टरी छोड़ दूंगा। वकील परामर्श के लिए 5 हजार लेते हैं। आप बताएं कौन सा डॉक्टर पांच हजार फीस लेता है। इस पर महाजन ने कहा मैं विरोध नहीं कर रही हूं। यहां सेवा करने वाले भी हैं।
आजकल मेडिक्लेम कंपनियां भी दादागीरी कर रही हैं
डॉ. पाटीदार बोले कोलकाता में एक हड्‌डी रोग विशेषज्ञ ने अपना पेशा बदल लिया। मेरा बेटा एमबीबीएस कर चुका है। मैं उसको बिजनेस करवाने की सोच रहा हूं। कोई इस पेशे में नहीं आना चाहता है। इंजीनियरिंग और एमबीए करने के बाद एक करोड़ का पैकेज मिल रहा है। वर्ष 2015 में हॉर्निया के ऑपरेशन के लिए मेडिक्लेम कंपनियां 30 हजार देती थी। अब 30 प्रतिशत कम कर दिया है। मेडिक्लेम वाले दादागीरी से काम करवा रहे हैं।
यह ईमानदार का गुस्सा
अस्पताल में लाखों रुपए के बिल की बात पर डॉ. बंडी ने जब अपनी बात रख दी तो महाजन ने कहा मैं मानती हूं कि यह एक ईमानदार का गुस्सा है। गुस्सा मुझे भी आता है। मैंने भी भुगता है।

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