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देश मे मानसिक तनाव से ग्रसित मानसिक रोगियों की संख्या 20 प्रतिशत तक बढ़ी

नई दिल्ली 19 अप्रैल 2020 ।  कोरोना वायरस से दुनियाभर में भय और चिंता का माहौल पैदा हो गया है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस त्रासदी के कारण पूरी दुनिया को खराब मानसिक सेहत का सामना करना पड़ सकता है और लंबे समय तक इसका प्रभाव रहेगा। न्यूराेसाइंटिस्ट, मनाेचिकित्सक और मनाेवैज्ञानिकों का कहना है कि लाेगाें की मानसिक स्थिति पर काेई असर न पड़े, इसके लिए सभी देशों को लक्षण आधारित इलाज और रिसर्च को बढ़ावा देने का काम तुरंत शुरू कर देना चाहिए। साथ ही ऐसे मामलों की दुनियाभर में एक साथ निगरानी की व्यवस्था की जानी चाहिए।
ग्लास्गो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रोरी ओकॉनर ने कहा कि शराब, नशे की लत, जुआ, साइबर बुलिंग, रिश्तों का टूटना, बेघर होने के कारण चिंता और डिप्रेशन से असामान्य व्यवहार करने वालों की अनदेखी से आगे समस्या और बढ़ जाएगी। संकट के इस दौर में लोगों की ऐसी समस्याओं को नजरअंदाज करने से न केवल उनका जीवन, बल्कि समाज भी प्रभावित होगा। ऐसे लोगों पर नजर रखने की जरूरत है, जो गंभीर रूप से डिप्रेशन में हैं, या उनमें आत्मघाती कदम उठाने के विचार आते हैं। उनकी निगरानी मोबाइल फोन जैसी नई तकनीकी माध्यम से किए जाने की जरूरत है।

मानसिक स्वास्थ्य को जांचने के लिए स्मार्ट तरीके खोजने होंगे

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रो. एड बुलमोर ने कहा- हमें डिजिटल संसाधनों का उपयोग करना होगा। लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को जांचने के लिए स्मार्ट तरीके खोजने होंगे, तभी इस चुनौती का सामना कर पाएंगे। दरअसल, ब्रिटेन में ‘लैंसेट साइकेट्री’ ने मार्च के अंत में 1,099 लोगों का सर्वे किया था। इसमें पता चला कि लॉकडाउन और आइसोलेशन में रहने की वजह से लोगों में कारोबार डूबने, नौकरी जाने और बेघर होने तक का खौफ पैदा हो गया है।

देश में भी मानसिक पीड़ितों की संख्या 15 से 20 फीसदी बढ़ी
इंडियन साइकियाट्रिक सोसायटी के सर्वे के मुताबिक, कोरोनावायरस के आने के बाद देश में मानसिक रोगों से पीड़ित मरीजों की संख्या 15 से 20 फीसदी तक बढ़ गई है। दुनियाभर में सभी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं में केवल 1 प्रतिशत हेल्थ वर्कर्स ही मेंटल हेल्थ के इलाज से जुड़े हुए हैं। भारत में इसका आंकड़ा और भी कम है।

लॉक डाउन के बड़े साइड इफ़ेक्ट की संभावना भारत मे 10 करोड़ नए गरीब पैदा होंगे

लॉक डाउन ने देश को कोरोना जैसी भयंकर बीमारी से तो बचा लिया लेकिन बड़े आर्थिक नुकसान से बचना संभव नही है । जान है तो जहान है कि तर्ज पर मोदी जी ने लॉक डाउन लागू किया और यह सही भी था । भारत जैसे देश को इस संक्रमण से बचाने का इससे अच्छा कोई उपाय नही था । कोरोना वायरस को लेकर आईसीएमआर की रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि देश में लॉकडाउन नहीं किया गया होता हो देश में इटली सेे भी बुरे हालात होते। रिपोर्ट के अनुसार, देश में 15 अप्रैल तक 8 लाख 20 हजार संक्रमितों की संख्या होती। ये मरीज हर 30 दिनों में 406 लोगों को संक्रमित कर सकते थे
।लंदन की ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के स्ट्रिंजेंसी इंडेक्स के तहत भारत ने कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए सबसे कड़े कदम उठाए हैं। जबकि, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में अभी तक इसे लेकर सख्ती देखने को नहीं मिली है। भारत का स्ट्रिंजेंसी इंडेक्स 100 है जो कि सबसे ज्यादा है। भारत के इस कदम की दुनियाभर में तारीफ हो रही है। माना जा रहा है कि इतनी बड़ी आबादी वाले देश के लिए यह फैसला कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए एक अहम कदम साबित हो सकता है। लेकिन क्या देश फिर से उठने को तैयार है । हमारे देश मे बहुत क्षमता है । यदि लॉक डाउन को देश के लोग छुट्टी की तरह मान ले और आने वाले वक्त में एक भी रविवार छुट्टी न लें तो पुनः खड़ा होने की संभावना बन जाएगी । रविवार की छुट्टी को स्वेच्छा से त्यागना होगा ।
यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी (यूएनयू) के एक रिसर्च के अनुसार, अगर कोरोना सबसे खराब स्थिति में पहुंचता है तो भारत में 104 मिलियन यानी 10.4 करोड़ नए लोग गरीब हो जाएंगे। यूएनयू ने विश्व बैंक द्वारा तय गरीबी मानकों के आधार पर यह आंकलन किया। रिसर्च के मुताबिक, विश्व बैंक के आय मानकों के अनुसार, भारत में फिलहाल करीब 81.2 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। यह देश की कुल आबादी का 60 फीसदी हैं। महामारी और लॉकडाउन बढ़ने से देश के आर्थिक हालात पर विपरीत असर पड़ेगा और गरीबों की यह संख्या बढ़कर 91.5 करोड़ हो जाएगी। यह कुल आबादी का 68 फीसदी हिस्सा होगा।इस रिसर्च में दावा किया गया है कि कोरोना की वजह से हालत अगर ज्यादा खराब होते हैं तो आय और खपत में 20 फीसदी की कमी आएगी। हालात खराब होने पर लोअर मिडिल क्लास वाले देशों में 54.1 करोड़ नए लोग गरीबी रेखा से नीचे आ जाएंगे। कोरोना महामारी के कारण पूरी दुनिया में पैदा होने वाले 10 नए गरीबों में से 2 लोग भारत के होंगे। इसी रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि हालात अगर अनुमान से कम खराब होतो हैं उस सूरत में भी कम सेकम 2.5 करोड़ नए गरीब पैदा होंगे। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने भी इस बारे में चेतावनी देते हुए कहा था कि भारत में 50 करोड़ लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं और अपनी रिपोर्ट में संगठन ने कहा था कि कोरोना की वजह से 40 करोड़ से ज्यादा कामगार और गरीब हो जाएंगे। असंगठित क्षेत्र में बेरोजगारी बढने का मतलब है इनकम और खपत में कमी और यूएनयू ने इसी बात का जिक्र अपनी रिपोर्ट में किया है।यदि गरीब देशों के लिए निर्धारित गरीबी के मानक 1.9 डॉलर रोजाना आय (करीब 145 रुपए) को मानें तो भारत में कोरोना संकट के कारण 15 लाख से 7.6 करोड़ अति गरीब की श्रेणी में शामिल हो जाएंगे। कुल आबादी में 22 फीसदी लोगों की आय 1.9 डॉलर प्रतिदिन से कम है। यहां यह बात गौर करने वाली है कि गरीबी रेखा वालों की आय महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना (मनरेगा) के तहत मिलने वाले मानदेय से भी कम है।

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