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‘संयुक्त राष्ट्र कश्मीर मिशन’ पर अपने मुंह मियां मिट्ठू बना पाकिस्तान

नई दिल्ली 03 अक्टूबर 2019 । पाकिस्तान ने अपने ‘संयुक्त राष्ट्र कश्मीर मिशन’ को लेकर खुद अपनी पीठ ठोंकी है। उसका मानना है कि प्रधानमंत्री इमरान खान के संयुक्त राष्ट्र कश्मीर मिशन को लेकर जो लक्ष्य निर्धारित किए गए थे, उन सभी को हासिल कर लिया गया है। पाकिस्तानी मीडिया में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की सूचना एवं प्रसारण मामलों की विशेष सहायक फिरदौस आशिक अवान ने कहा कि ‘प्रभावी कूटनीति के कारण प्रधानमंत्री खान का संयुक्त राष्ट्र का मिशन कश्मीर सफल रहा है।’

संघीय कैबिनेट की बैठक के बाद संवाददाताओं से कहा कि प्रधानमंत्री ने अमेरिका यात्रा के दौरान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में दुनिया के नेताओं, थिंक टैंक और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया से करीब सत्तर बार संवाद किया। विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने भी करीब पचास बैठकें कीं।

उन्होंने कहा कि ‘इन सभी 120 बैठकों का एजेंडा कश्मीर में भारतीय जुल्म का पदार्फाश करना था। कितने ही नेता इन बैठकों के जरिए ही कश्मीर के लगातार बुरे हो रहे हालात से परिचित हुए और उन्होंने इस मामले में पाकिस्तान के रुख का समर्थन किया।’

अवान ने ‘संयुक्त राष्ट्र कश्मीर मिशन’ पर इतनी ही बात कही। उनकी बात से साफ हुआ कि पाकिस्तान का लक्ष्य नेताओं व संस्थाओं से मुलाकात कर उनके सामने अपनी बात रखना मात्र ही था। अन्यथा, संयुक्त राष्ट्र महासभा में निर्धारित समय के बाद भी, लाल बत्ती के लगातार जलते रहने के बाद भी इमरान का संबोधन अभी भी चर्चा में बना हुआ है। साथ ही उनके भाषण में युद्ध व परमाणु युद्ध की धमकियों को भी एक राजनेता के स्तर के भाषण के अनुरूप नहीं पाया गया है।

चीनी सेना की विशाल परेड पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कही ये बात
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने परेड के प्रति अपने जुड़ाव की जानकारी साझा करते हुए मंगलवार को कहा कि चीनी सेना की परेड हमेशा से प्रभावित करने वाली रही है।

जयशंकर ने चीन की तरफ से कम्युनिस्ट पार्टी के 70 वर्षों की ताकत का प्रदर्शन करने के लिए आयोजित भव्य मार्च के एक दिन बाद चीनी परेड की सराहना की। बीजिंग में चीनी सेना की विशाल परेड को लेकर पूछे गए प्रश्न पर जयशंकर ने वाशिंगटन के श्रोताओं से कहा कि चीनी परेड हमेशा से ही बहुत प्रभावशाली रही हैं।

उन्होंने याद किया कि चीन में भारत के शीर्ष राजनयिक के तौर पर उन्होंने 10 साल पहले ऐसी एक परेड देखी थी। उन्होंने कहा कि चीन में 10 साल पहले हुई एक परेड के वक्त में वहां था। मैं चीन में भारतीय राजदूत के तौर पर वहां पहुंचा ही था। मैंने 60वीं वर्षगांठ की परेड देखी थी।

तिहाड़ प्रशासन की टाडा कोर्ट को चिट्ठी, यासीन मलिक को नहीं कर सकते पेश

वायुसेना के चार अधिकारियों की हत्या के केस में अलगाववादी नेता यासीन मलिक की आज जम्मू की टाडा कोर्ट में पेशी होनी है. लेकिन तिहाड़ जेल की ओर से कोर्ट को सूचित किया गया है कि उसे पेश नहीं कर पाएंगे. तिहाड़ जेल की ओर से इस बारे में टाडा कोर्ट को चिट्ठी लिखी है. बता दें कि यासीन मलिक अभी टेरर फंडिंग मामले में अभी तिहाड़ जेल में बंद हैं.

मंगलवार को सुनवाई से पहले तिहाड़ जेल प्रशासन की ओर से लिखा गया कि गृह मंत्रालय ने इस साल की शुरुआत में एक आदेश जारी किया था, जिसमें यासीन मलिक को किसी जेल में पेश ना करने के लिए कहा गया था. हालांकि, तिहाड़ प्रशासन का कहना है कि वह उसे टेली कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश कर सकते हैं.

बता दें कि 1990 में जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के आतंकियों ने वायुसेना के कुछ अधिकारियों की हत्या कर दी थी. इसी केस में सीबीआई ने जम्मू की टाडा कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की है, जिसमें यासीन मलिक मुख्य आरोपी है.

कब हुई थी वायुसेना अधिकारियों की हत्या?

आपको बता दें कि यासीन मलिक की अगुवाई में JKLF के आतंकियों ने 25 जनवरी 1990 को श्रीनगर के बाहरी इलाके में वायुसेना के जवानों पर हमला किया था. इस हमले में स्क्वॉर्डन लीडर रवि खन्ना समेत 4 जवान शहीद हो गए थे, जबकि 6 लोग घायल हो गए थे.

इस मामले की जांच CBI ने की थी. 1990 में जम्मू की टाडा कोर्ट में दायर की CBI की चार्जशीट में यासीन मलिक मुख्य आरोपी थे. यासीन के खिलाफ केस को 1995 में जम्मू से अजमेर ट्रांसफर किया गया था. इसके बाद जम्मू और कश्मीर हाई कोर्ट ने इसे 1998 में जम्मू टाडा अदालत में स्थानांतरित कर दिया.

वहीं, लश्कर प्रमुख हाफिज सईद से फंड लेने के मामले में यासीन मलिक के खिलाफ 3 अक्टूबर को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) चार्जशीट दाखिल करेगी. यासीन पर पाकिस्तान से पैसे लेकर आतंकी वारदात को अंजाम देने का आरोप है.

70 साल पुराने मामले में पाकिस्तान को झटका, 7वें निजाम के अरबों रुपये भारत को मिलेंगे

हैदराबाद के निजाम की करोड़ों की संपत्ति को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों से चले आ रहे लंबे विवाद का बुधवार को अंत हो गया। ब्रिटेन की कोर्ट ने भारत के पक्ष में फैसला सुनाते हुए पाकिस्तान को 70 साल से चले आ रहे केस में झटका दिया है। हैदराबाद के 7वें निजाम मीर उस्‍मान अली खान ने 1948 में लंदन एक बैंक में 8 करोड़ रुपये जमा कराए थे, जो अब बढ़कर 300 करोड़ से अधिक हो गई है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि हैदराबाद के आठवें निजाम प्रिंस मुकर्रम जेह और उनके छोटे भाई मुफ्फखम जाह ने लंदन के बैंक में जमा पैसे को लेकर पाक सरकार के विरुद्ध कानूनी लड़ाई में भारत सरकार का पूरा साथ दिया है। भारत विभाजन के दौरान 1948 में हैदराबाद के सातवें निजाम मीर उस्मान अली खान ने नेटवेस्ट बैंक में 1,007,940 पाउंड (करीब 8 करोड़ 87 लाख रुपये) जमा कराए थे। यह राशि बढ़ते-बढ़ते अब 3.50 करोड़ पाउंड (तीन अरब आठ करोड़ 40 लाख रपए) हो गई है। इस भारी रकम पर पाकिस्तान अपना हक जतात रहा था।

1948 में हैदराबाद के निजाम के वित्तमंत्री ने ब्रिटेन में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे हबीब इब्राहिम रहीमटोला के बैंक खाते में रकम को ट्रांसफर कर दिया था, जिसे लंदन के एक बैंक खाते में जमा कराया गया था। फिलहाल ये फंड लंदन के नेशनल वेस्टमिंस्टर बैंक में जमा है।

विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा है कि फैसले में यूके की अदालत ने पाकिस्तान के इस दावे को खारिज कर दिया है कि इस फंड का उद्देश्य हथियारों की शिपमेंट के लिए पाकिस्तान को भुगतान के रूप में किया गया था। यहीं नहीं पाकिस्तान ने कई बार प्रयास किया कि किसी तरह यह मामला बंद हो जाए, लेकिन उसके हर प्रयास को लंदन की कोर्ट से खारिज कर दिया।

लंदन की रॉयल कोर्ट ऑफ जस्टिस ([हाई कोर्ट)] के जस्टिस मार्कस स्मिथ ने अपने फैसले में कहा कि हैदराबाद के सातवें निजाम उस्मान अली खान इस राशि के मालिक थे। उनके बाद उनके वंशज और भारत सरकार हकदार हैं। इस पर पाकिस्तान का दावा उचित नहीं है।

ब्रिटिश हाई कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए उनके वकील पॉल हैविट ने कहा कि यह पैसा 1948 से विवादित था। तब हमारे मुवक्किल (निजाम के वंशज मुकर्रम व मुफ्फखम जाह) बच्चे थे जो अब 80 साल के हो गए हैं। फैसला उनके व उनके परिवार के लिए बड़ी राहत है।

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