मुख्य पृष्ठ >> खास खबरें >> संघ की चुनावी शंका और निशाने पर प्रधानमंत्री मोदी

संघ की चुनावी शंका और निशाने पर प्रधानमंत्री मोदी

नई दिल्ली 25 जनवरी 2019 । अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही कह चुके हैं कि अदालत का फैसला आने के बाद ही कोई निर्णय लिया जा सकेगा। इस प्रकार जो लोग आस लगाए बैठे थे कि मोदी सरकार आनन-फानन में अध्यादेश लाएगी या मंदिर निर्माण का प्रस्ताव संसद में लाकर पास करवाएगी और कानून का रुप देगी, उन्हें तो बड़ा झटका लगा है। इस पर प्रमुख विपक्षी पार्टी समेत अन्य पार्टिंयों ने ज्यादा कुछ कहना मुनासिब नहीं समझा है, क्योंकि वो जान रही हैं कि जितनी जल्दी सच देश को पता चल जाए उतना ही अच्छा है। वैसे विरोधी पार्टियां जब भी मुखर होती हैं वो तो यही कहती सुनी जाती हैं कि धर्म और पूजा-पाठ से भाजपा या उसके नेताओं का कोई लेना देना नहीं है। मंदिर का मुद्दा तो वो राजनीतिक तौर पर उठाते हैं और बाद में भूल जाते हैं। गौर करें कि जिस नेता ने राम रथ देशभर में चलाकर भाजपा को दो से पूर्ण बहुमत वाली पार्टी के तौर पर स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई उसे ही सरकार में आते ही हाशिये पर भेज दिया गया। इसलिए भी अब कहा जा रहा है कि मंदिर मुद्दा भाजपा का राजनीतिक मुद्दा है जिसे वो यूं ही जाया नहीं करना चाहती है। इतने सालों में भाजपा ने मंदिर मुद्दे को लेकर चुनाव तो लड़े लेकिन केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार में आते ही कह दिया कि मंदिर मामला न तो पार्टी के एजेंडे में कभी था और न ही सरकार के ही उजागर या गुप्त एजेंडे में शामिल है। इस प्रकार जो लोग मंदिर मुद्दे को लेकर भाजपा का साथ देते रहे हैं वो अपने आपको ठगा महसूस नहीं करेंगे तो क्या हर्षघोष करेंगे। इसलिए कुछ ने जहां दबी जुबान में मोदी सरकार और भाजपा के मौजूदा शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ बयान दिए तो वहीं अनेक नेताओं और विचारकों ने सीधे हमला ही बोल दिया। बहरहाल कहीं न कहीं भाजपा के अनुवांशिक संगठन खासतौर पर संघ और विहिप अपनी साख के साथ ही साथ भाजपा के राजनीतिक धरातल को बचाने में जुट गए हैं। इसलिए इस तरह के बयान दिए जा रहे हैं ताकि मंदिर मामले को कुछ इस तरह से इस चुनाव में पेश कर दिया जाए जिससे उनकी बात भी रह जाए और भाजपा को ज्यादा नुक्सान भी न होने पाए। इस कोशिश में एक तरफ वो नेता हैं जो सीधे मोदी सरकार को जिम्मेदार मानते हुए उन पर हमले कर रहे हैं तो दूसरी तरफ कुछ ऐसे नेता भी हैं जो बचाव में सामने आते हैं और सच सामने न आ जाए इसलिए यहां वहां की बातें करते देखे जाते हैं। इनसे हटकर कुछ ऐसे भी लोग हैं जो सच तो बयान करना चाहते हैं, लेकिन साथ ही यह भी चाहते हैं कि कहीं उनके बयान से मोदी सरकार या फिर भाजपा को नुक्सान न हो जाए, इसलिए वो गोलमोल बातें करते देखे जाते हैं। यदि इस बात पर यकीन नहीं हो रहा हो तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह भैयाजी जोशी के ही बयानों को सामने रख कर देख लें, जिसमें एक तरफ वो प्रयागराज में कहते देखे जाते हैं कि अयोध्या में राम मंदिर 2025 में बनेगा। इस सीधे कथन का अर्थ तो यही निकाला जाना चाहिए कि आमचुनाव 2019 में भाजपा को या फिर एनडीए को स्पष्ट बहुमत हासिल होने वाला नहीं है, इसलिए दावा किया जा रहा है कि 2025 में मंदिर का निर्माण हो सकेगा। बहरहाल भैयाजी के बयान पर सवाल उठे तो उन्होंने बात को टालने के मकसद से यह भी कह दिया कि उनके बयान को सही समझा नहीं गया, उन्होंने तो यही कहना चाहा है कि यदि अभी से मंदिर निर्माण कार्य शुरु हो भी जाता है तो उसके पूरा होने में पांच से छह साल तो लग ही जाएंगे। इस बयान पर कहने वाले यह भी कह रहे हैं कि संघ ने ऐसा कहकर सही मायने में मोदी सरकार पर दबाव बनाने का ही काम किया है कि वो जल्द से जल्द मंदिर निर्माण पर विचार करें, अन्यथा सब्र का बांध टूटने वाला है। कुल मिलाकर मोदी सरकार के संवैधानिक प्रक्रिया से बंधे होने वाले बयान से संघ खासा नाराज है, इसलिए इस तरह के बयान तो आगे भी आते रहेंगे। वहीं दूसरी तरफ भाजपा के अन्य अनुवांशिक संगठन भी हैं जो अब कांग्रेस से कह रहे हैं कि चुनावी घोषणापत्र में मंदिर निर्माण को कांग्रेस लेकर आए तो उन्हें समर्थन दिया जा सकता है। इस तरह की बात विश्व हिंदू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने अपने एक बयान में कही तो सवाल भी उठ गए कि क्या विहिप को स्पष्ट दिखने लग गया है कि अगले चुनाव में भाजपा हार रही है, इसलिए उसने अब कांग्रेस पर दावं खेलना बेहतर समझा है। विहिप कांग्रेस के मेनिफेस्टो में राम मंदिर निर्माण को जुड़वाकर उसके साथ सफर शुरु करना चाहता है। वहीं कहने वाले कह रहे हैं कि चूंकि मोदी सरकार ने संसद में मंदिर निर्माण को लेकर कानून बनाने के लिए कोई पहल नहीं की है इसलिए अब उससे और ज्यादा की उम्मीद रखना भी बेमानी है। यहां तक कहा जा चुका है कि जब बाकी चीजों के लिए अध्यादेश लाया जा सकता है तो फिर मंदिर निर्माण के लिए क्यों नहीं? कुल मिलाकर मंदिर मामले को लेकर अब सीधे तौर पर प्रधानमंत्री मोदी सभी के निशाने पर हैं। इसलिए अब मोदी जी जो कह रहे हैं या कर रहे हैं उसमें उन्हें सिर्फ और सिर्फ खामियां ही खामियां नजर आ रही हैं। विरोधियों की बात कौन करे अब तो उनके अपने सहयोगी दल शिवसेना तक ने उन्हें आईना दिखाते हुए मंदिर मामले पर बोलना शुरु कर दिया है और महाराष्ट्र से निकल वह अयोध्या में दस्तक दे चुका है। यहां भाजपा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने भी लगातार मोदी सरकार पर हमला बोला है और देश को बतलाने की कोशिश की है कि पहले देश है उसके बाद पार्टी या सरकार। अंतत: देखने में यह आ रहा है कि आमचुनाव में भाजपा की जीत को लेकर संघ की आशंका ने मोदी सरकार को सभी के निशाने पर लाने का काम कर दिया है। आखिर संघ भी क्या करे क्योंकि मोदी सरकार के फेल होने के कारण वह अपनी बात को उस दमदारी के साथ देश के सामने नहीं रख पा रहा है जैसा कि पिछले चुनावों के दौरान उसने रखने का काम किया था।

2017-18 में BJP को बाकी दलों के मुकाबले मिला 12 गुना ज्यादा चंदा
वित्तीय वर्ष 2017-18 में देश की राष्ट्रीय पार्टियों को मिला 50% से ज्यादा फंड अज्ञात स्रोतों से आया. इसमें इलेक्टोरल बॉन्ड और अपनी इच्छा से दिया गया फंड भी शामिल है. वहीं, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को पिछले वित्त वर्ष में अन्य राष्ट्रीय पार्टियों के मुकाबले 12 गुना ज्यादा यानी 437 करोड़ रुपये से अधिक राजनीतिक चंदा मिला. बुधवार को इलेक्शन वॉचडॉग एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट में यह बात सामने आई है.

प्रियंका गांधी की राजनीति में एंट्री पर बोले PM- ‘दूसरी जगह परिवार से ही पार्टी बनती है’

एडीआर ने 6 राष्ट्रीय पार्टियों के इनकम टैक्स रिटर्न और उन्हें मिले दान के आधार पर ये एनालिसिस की है. पार्टियों ने यह ब्योरा चुनाव आयोग को दिया था. इसके मुताबिक बीजेपी, कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई), बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को 2017-18 में कुल आय 1293.05 करोड़ रुपये रही. इसमें से 689.44 करोड़ अज्ञात स्रोतों से आया. यह कुल आय का 53 फीसदी है.

बीजेपी और कांग्रेस को सबसे अधिक चंदा ‘प्रूडेंट इलैक्टोरल ट्रस्ट’की ओर से मिला. यह बड़े कॉरपोरेट घरानों द्वारा समर्थित कंपनी है, जिसमें परिसंपत्ति और टेलीकाम सेक्टर से जुड़ी बड़ी कंपनियां शामिल हैं.

एडीआर रिपोर्ट में और क्या है?
राष्ट्रीय दलों द्वारा घोषित 20 हजार रुपये से अधिक के चंदे में वर्ष 2017.18 के लिए राष्ट्रीय दलों ने 469.89 करोड़ रुपया मिलने की घोषणा की है. इसमें से ज्यादातर हिस्सा 437.04 करोड़ रुपये बीजेपी के खाते में गया, जबकि कांग्रेस को 26.65 करोड़ रुपये मिले.

एडीआर ने एक बयान में बताया, ‘बीजेपी ने अपने जिस चंदे की घोषणा की है वह कांग्रेस, एनसीपी, सीपीएम, कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और तृणमूल कांग्रेस द्वारा इसी अवधि में घोषित कुल चंदे से 12 गुना अधिक है.’

बयान में बताया गया है कि राष्ट्रीय दलों को करीब 90 फीसदी चंदा कोरपोरेट घरानों से और बाकी 10 फीसदी लोगों से मिला. कॉरपोरेट घरानों और कारोबारियों ने साल 2017.18 में बीजेपी को 400.23 करोड़ रुपये राजनीतिक चंदे के रूप में दिए, जबकि कांग्रेस को केवल 19.29 करोड़ रुपये ही मिले.

इस बीच बहुजन समाज पार्टी ने ऐलान किया है कि इस अवधि में उसे 20 हजार रुपये से अधिक कोई चंदा नहीं मिला. बसपा पिछले 12 साल से हर साल यही घोषणा करती आ रही है. दिल्ली स्थित विचार मंच ने यह जानकारी दी है.

दलों को मिले राजनीतिक चंदे में से दिल्ली से पार्टियों को 208. 56 करोड़ रुपये, महाराष्ट्र से 71.93 करोड़ और गुजरात से 44.02 करोड़ रुपये मिले.

एडीआर ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कुल चंदे में से 42.60 करोड़ रुपये यानी करीब 9.07 फीसदी राशि का अधूरी सूचना के कारण पता नहीं चल सका कि यह किस राज्य से आया है

शेयर करें :

इसे भी पढ़ें...

टी-20 वर्ल्ड कप के लिए भारत के गेम प्लान पर बोले कोच रवि शास्त्री- खिलाड़ियों को ज्यादा तैयारी की जरूरत नहीं

नई दिल्ली 19 अक्टूबर 2021 । भारतीय क्रिकेट टीम को टी-20 वर्ल्ड कप में अपना …