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अमेरिका से लौटीं प्रियंका, 7 फरवरी को राहुल गांधी के साथ होगी पहली बैठक

नई दिल्ली 5 फरवरी 2019 । कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की बहन और पार्टी की महासचिव व पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी अपनी विदेश यात्रा से वापस लौट आई हैं. कांग्रेस महासचिव पद पर प्रियंका की नियुक्ति के बाद सियासी गलियारों में उनके अगले कदम को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म था. बेटी के इलाज के लिए अमेरिका गईं प्रियंका गांधी का इंतजार पार्टी कैडर में जोर-शोर से किया जा रहा था. बताया जा रहा है कि प्रियंका अपने स्टाफ के साथ बैठक के बाद आगे का कार्यक्रम तय करेंगी.

आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारी का जायजा लेने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी महासचिवों और राज्य प्रभारियों की 7 फरवरी को बैठक बुलाई है. लिहाजा महासचिव बनने के बाद प्रियंका गांधी भी इस बैठक में शामिल होंगी. महासचिवों के साथ इस बैठक के बाद कांग्रेस अध्यक्ष ने सभी प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्षों की 9 फरवरी को बैठक बुलाई है. इसमें प्रदेश में कांग्रेस की तैयारियों को लेकर रणनीति पर चर्चा होगी. जानकारों की मानें तो प्रियंका गांधी पहले भी कांग्रेस की रणनितिक बैठकों का हिस्सा लेती रही हैं, लेकिन आधिकारिक तौर पर यह पहला मौका होगा जब वे पदाधिकारी की हैसियत से इन बैठकों में शिरकत करेंगी.

बता दें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पश्चिम और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए दो प्रभारी महासचिव नियुक्त किए हैं. इसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार प्रियंका गांधी और पश्चिम उत्तर प्रदेश का प्रभार कांग्रेस सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को दिया गया है. आगामी लोकसभा चुनाव के लिए सीटों के लिहाज से सबसे बड़े सूबे यूपी में दो युवा प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने बड़ी चुनौती है. जहां एक तरफ पूर्वी उत्तर प्रदेश सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गृहक्षेत्र है तो वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र भी यहीं है.

इससे पहले खबरें यह भी आ रही हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और बहन प्रियंका गांधी प्रयागराज में चल रहे अर्धकुंभ में शरीक हो सकते हैं. कुछ दिनों पहले प्रयागराज के कुंभक्षेत्र में प्रियंका को गंगा की बेटी बताते हुए पोस्टर भी लगे थे. प्रियंका गांधी वैसे तो परदे के पीछे कांग्रेस की रणनीति तैयार करती रही हैं. माना जाता है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के गठबंधन में उनका विशेष योगदान था. हालांकि प्रत्यक्ष तौर पर प्रियंका गांधी ने खुद को अपनी मां और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र तक ही सीमित कर रखा था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का क्षेत्र होने के चलते पूर्वी उत्तर प्रदेश कांग्रेस की रणनीति में अहम स्थान रखता है. बीजेपी के इस गढ़ में सेंध लगाने के लिए कांग्रेस ने प्रियंका को मैदान में उतारा है. जिससे कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं में उत्साह है. अब जब लोकसभा चुनावों को लेकर कुछ ही महीने बचे हैं ऐसे में देखना होगा कि प्रियंका बीजेपी के गढ़ में किस तरह से अपनी रणनीति तैयार करती हैं. क्योंकि राहुल गांधी अपने भाषणों में लगातार कह रहे हैं कि कांग्रेस अब यूपी में फ्रंट फुट पर बैटिंग करेगी और छक्के भी लगाएगी.

शत्रुघ्न ,कीर्ति , लवली और वरुण करेंगे कांग्रेस की राजनीति !
पटना में कांग्रेस की रैली सफल होने के बाद कई तरह की खबरे सामने आ रही है। पटना से कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने बताया है कि आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ कई नेता जुड़ने जा रहे हैं। सूत्रों के मुताविक शत्रुघ्न सिन्हा ,कीर्ति आजाद और लवली आनंद कांग्रेस के जुड़ सकते है। इसके अलावे बीजेपी से जुड़े कुछ और नेताओं के भी कांग्रेस में आने की संभावना बताई जा रही है। सबसे बड़ा कयास वरुण गांधी को लेकर लगाया जा रहा है।

जब से प्रियंका गांधी को कांग्रेस का महासचिव बना कर पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया तभी से कहा जा रहा है कि वरुण गांधी कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। उनके कांग्रेस में शामिल होने की तारीख भी तय बताई जा रही है। कहा जा रहा है कि वे दस फरवरी को यानी बसंत पंचमी के दिन कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। इतना ही नहीं उनको कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने की भी चर्चा है।

कहा जा रहा है किवरुण गाँधी प्रदेश की कमान संभाल कर 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटेंगे। कांग्रेस उनको मुख्यमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पेश करेगी। हालांकि खुद राहुल गांधी ने पिछले दिनों कहा कि उनको इस बारे में जानकारी नहीं है।

बहरहाल, दूसरी अटकल उनको लोकसभा चुनाव को लेकर है। खबर है कि वे पिछले दिनों राजनाथ सिंह मिले और अपने बारे में चल रही अटकलों के बारे में उनको बताया। इसके बावजूद कहा जा रहा है कि भाजपा इस बार उनको टिकट नहीं देगी। यह भी कहा जा रहा है कि वे सुल्तानपुर की सीट से नहीं लड़ना चाहते हैं। ध्यान रहे वे पिछली बार भी सीट बदल कर लड़े थे। 2009 में पहली बार वे आवंला सीट से चुनाव जीते और 2014 में सुल्तानपुर से लड़े। इस बार किसी तीसरी सीट से लड़ने की चर्चा है। तीसरी सीट कौन सी होगी और पार्टी कौन सी होगी, इसके बारे में अभी तुरंत पता नहीं लगेगा। कम से कम दस फरवरी तक तो इंतजार करना ही होगा।

पटना के गांधी मैदान में रैली की हिम्मत जुटाना ही कांग्रेस की सफलता, भीड़ से मत करें आकलन

कांग्रेस के सबसे मजबूत गढ़ माने जाने वाले बिहार में लालू प्रसाद यादव के आगमन के साथ ही स्थिति बदलने लगी थी. बाद के दिनों में कांग्रेस के आधे वोट बैंक को लालू प्रसाद यादव ने अपना कैडर बना लिया. आधा वोट बैंक भारतीय जनता पार्टी के पाले में चला गया. कांग्रेस राज्य में खाली हाथ क्या हुई, राजद ने उसे अपना पिछलग्गू बना लिया. जिस कांग्रेस का विरोध कर राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने अपनी राजनीति शुरू की, वही आज कांग्रेस के सबसे बड़े पोषक बने हुए हैं. ऐसी स्थिति के बाद भी कांग्रेस ने बिहार में रैली की हिम्मत जुटाई और वह भी गांधी मैदान में यह अपने आप में बड़ी बात है.

अभी एक राजनीतिक विश्लेषक बिहार की राजधानी पटना में कांग्रेस की जन आकांक्षा रैली का विश्लेषण कर रहे थे। कहे जा रहे थे, यह रैली को फ्लॉप रही। लोगों के लिहाज से 70 हजार भी लोग नहीं जुटे। कांग्रेस पार्टी को इस रैली से राजनीतिक नुकसान ही झेलना होगा। ऐसे में हमारा मानना है कि कांग्रेस ने एक बार फिर बिहार में अपना अस्तित्व होने को दिखाने में कामयाब रहा। अपने दम पर रैली का आयोजन कर लेना किसी भी दल के लिए बड़ी बात होती है। रैली अगर गांधी मैदान में हो तो मुश्किलें और बढ़ती है। गांधी मैदान में करीब तीन लाख लोग बैठकर भाषण सुन सकते हैं। ऐसे में भीड़ के लिहाज से कांग्रेस की रैली की समीक्षा करना गलत होगा।

करीब 20 साल बाद गांधी मैदान में कांग्रेस ने रैली की थी। राज्य में कांग्रेस के 27 विधायक हैं। अब यह मत पूछिए कि कितने अपनी पार्टी के प्रति वफादार हैं। अगर वफादार होते और पांच-पांच हजार की भीड़ लेकर आ जाते तो सवा लाख से अधिक लोग गांधी मैदान में जुटा। बहरहाल, गांधी मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष समेत तमाम विपक्षी दलों के नेताओं को जुटाकर कांग्रेस ने अपनी उपस्थिति प्रदर्शित कर दी है। अब लोकसभा चुनाव 2019 में पार्टी अपनी शक्ति सीट बंटवारे के समय भी प्रदर्शित करेगी। राहुल गांधी ने गांधी मैदान से स्पष्ट कर दिया है यूपी की तरह बिहार में भी कांग्रेस बैकफुट नहीं फ्रंट फुट पर खेलेगी।

…तो विधान परिषद का गठन करने वाला MP होगा 10वां राज्य!

मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार ने राज्य में विधान परिषद के गठन का ऐलान किया है. कांग्रेस का कहना है कि उसने अपने वचन पत्र में भी ये वादा किया था कि सरकार बनने के बाद वो तुरंत ही विधान परिषद का गठन करेंगे जिसे पूरे करने का वक्त आ गया है. हालांकि कांग्रेस के लिए राहें इतनी आसान भी नहीं हैं क्योंकि विधान परिषद के प्रस्ताव को पास कराने के लिए विधानसभा में दो तिहाई बहुमत के साथ ही केंद्र की भी मदद की जरूरत होगी.

वैसे अगर ऐसा होता है तो मध्य प्रदेश देश का 10वां राज्य हो जाएगा जहां विधान परिषद है. इससे पहले जम्मू कश्मीर, आंध्र प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, ऐसे राज्य हैं जहां विधान परिषद का वजूद है. इसके साथ ही राजस्थान और असम ऐसे राज्य हैं जहां जहां विधान परिषद प्रस्तावित है. आइए जानते हैं कि विधान परिषद के गठन के लिए क्या-क्या प्रक्रिया है…

विधान परिषद का गठन अनुछेद 169.17(1) और 171(2) के अनुसार होता है. इसकी प्रक्रिया ये है

1. विधानसभा में अपस्थित सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से परित प्रास्ताव को संसद के पास भेजा जाता है.

2. इसके बाद अनुछेद 17(2) के अनुसार लोकसभा और राज्यसभा साधारण बहुमत से प्रस्ताव पारित करती है.

3. राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए इस प्रस्ताव को उनके पास भेज दिया जाता है.

4. राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होते ही विधान परिषद के गठन की मंजूरी मिल जाती है.

वैसे आपको बता दें कि संसद तो दूर की बात है, कांग्रेस के लिए विधान परिषद के प्रस्ताव को विधानसभा में भी पास कराना आसान नहीं है क्योंकि उसके पास दो तिहाई बहुमत का आंकड़ा नहीं है.

कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर दर्ज हुए प्रकरणों की वापसी की घोषणा

प्रदेश सरकार के द्वारा 15 वर्षों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्द हुए विभिन्न मामलों से संबंधित प्रकरण वापसी की घोषणा की है।
विदित रहे की राजनीतिक आंदोलन के दौरान दर्ज किए गए मामले सरकार वापस लेकर अपने दल के कार्यकर्ताओं को ऐसे प्रकरणों से मुक्ति देने का काम करती है। लेकिन राजनीतिक प्रकरणों के साथ साथ व्यक्तिगत प्रकरण भी राजनीतिक दालों के द्वारा उठा ले जाते हैं। जिससे राजनीतिक अपराधी उपकृत होते हैं।

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