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मोदी के विरुद्ध वाराणसी से लोस चुनाव लड़ने पर अड़ीं प्रियंका

नई दिल्ली 2 अप्रैल  2019 । 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध वाराणसी संसदीय सीट से चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी अड़ गई हैं। इसको लेकर कांग्रेस के रणनीतिकार पशोपेश में पड़ गये हैं।

सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस महासचिव व पूर्वी उ.प्र. की प्रभारी प्रियंका गांधी ने पार्टी प्रमुख राहुल गांधी व अन्य वरिष्ठ नेताओं से कहा है, “मैं प्रधानमंत्री के विरुद्ध वाराणसी संसदीय सीट से चुनाव लड़ूंगी। मैंने जमीन देख ली है, जनता का जुड़ाव देख लिया है। मुझको वहां से चुनाव लड़ने की इजाजत दी जाए।” सूत्रों के मुताबिक उनके इस कहे पर पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “पहला ही चुनाव सीधे प्रधानमंत्री के विरुद्ध लड़ना क्या ठीक रहेगा?” उनका जवाब था , “हां , तभी तो कह रही हूं , इससे चुनौतीपूर्ण और कोई चुनावी जंग हो ही नहीं सकती। इसलिए मुझको इसकी अनुमति दी जाए।” उनकी इस जिद को देखते हुए पार्टी आलाकमान ने अभी कुछ कहा नहीं है लेकिन पार्टी इस पर एक बार विचार करने को मजबूर हो गई है।

इस बारे में कांग्रेस महासचिव शक्ति सिंह गोहिल का कहना है कि यह ऐसा मसला है, जिस पर पार्टी के शीर्ष नेता ही कुछ कह सकते हैं। फिलहाल पार्टी में केन्द्र की सत्ताधारी पार्टी की हर चाल की काट के लिए हर तरह की रणनीति पर चिंतन हो रहा है। ऐसे में कांग्रेस, शक्तिशाली सत्ताधारी पार्टी व उसके हुक्मरानों के हर दांव की काट के लिए जो हो सकेगा, करेगी ही। कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी।

प्रयाग से गंगा यात्रा करते हुए मिर्जापुर की विन्ध्यवासिनी देवी का दर्शन करके काशी में अन्नपूर्णा, बाबा विश्वनाथ के दरबार व काशीवासियों के यहां पहुंचने पर प्रियंका गांधी का कितना विरोध हुआ? इस सवाल पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू ) छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष व एआईसीसी महासचिव अनिल श्रीवास्तव का कहना है कि विरोध नहीं, सपोर्ट मिला । इस बारे में वह कहते हैं, “प्रियंका गांधी की उस यात्रा के समय जब मोटरबोट रामनगर (वाराणसी के पहले ) पहुंची तो मैं उसमें सवार हो गया। वह मोटर बोट सपा के एक नेता की थी। उसकी पत्नी पार्षद हैं, वह भी उस पर थीं। प्रियंका गांधी ने उसके घर – परिवार, बच्चों की पढ़ाई, परिवार के अन्य लोगों के बारे में बातचीत की। मसलन- वे क्या कर रहे हैं, क्या नौकरी कर रहे हैं, कौन बेरोजगार हैं, इस सबके बारे में बात की । रामनगर व काशी में क्या चल रहा है, इसके बारे में उनसे जानकारी लीं।”

हालांकि इसके कुछ देर बाद उस महिला ने प्रियंका गांधी से कांग्रेस में शामिल होने की बात कही तो उसके पति ने ऐतराज जताते हुए कहा, “कहो, तू हमसे पूछलू नाही, कांग्रेस में शामिल होत बालू, इ त ठीक नाहीं बा।” इसकी प्रतिक्रिया में उसकी पत्नी ने कहा, एइमें तोहरा से पूछले के कौनों जरूरत रहीत त हम जरूर पूछतीं। तूही बताव, कौने पार्टी के एतना बड़हन नेता एह तरह से हर, बाल बच्चन , परिवार के सबके सुख दुख, दवा, पढ़ाई, बेरोजगारी के बारे में पूछेला।” इस पर कई कांग्रेसी नेताओं ने कहा, “अरे भाई जब इनके मन कांग्रेस में शामिल होवल चाताली, त तू काहें हड़कावत बाल।” इस पर उसके पति ने कहा, “इत जौन मन में आईल बा उहे करीहें, हमार कहल त मनिहें ना, ठीक बा जौन मन करे तौन करें।” अनिल श्रीवास्तव का कहना है कि इसी तरह का रिस्पांस उन महिलाओं, लड़कियों, लोगों का भी रहा, जिनके घर, गांव और मोहल्ले में प्रियंका गांधी गईं और जिनसे बाचीत की।

यदि कांग्रेस ने वाराणसी संसदीय सीट से प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध प्रियंका गांधी को उम्मीदवार बनाकर उतरा दिया, तब क्या होगा ? इस पर अनिल श्रीवास्तव का जवाब था, “तब तो मोदी को मुश्किल हो सकती है और इसका असर न केवल उ.प्र. में लोकसभा चुनाव पर बल्कि पूरे देश के चुनाव पर पड़ेगा।” हालांकि इस बारे में भाजपा किसान मोर्चा कार्यकारिणी के सदस्य अजय मुन्ना का कहना है कि यहां से मोदी 2014 लोक सभा चुनाव में पाये मतों से भी अधिक मतों से जीतेंगे, चाहे उनके विरुद्ध कोई भी चुनाव लड़े।

रायबरेली में जब एक कार्यकर्ता ने कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधीसे रायबरेली से चुनाव लड़ने को कहा तो प्रियंका गांधी ने जवाब दिया कि वाराणसी से क्यों नहीं? हालांकि प्रियंका गांधी ने यह जवाब बहुत ही हल्के-फुल्के में अंदाज में दिया था लेकिन इस बात के कयास लगनाए जाने से शुरू हो गए हैं कि क्या सच में प्रियंका गांधी वाड्रा वाराणसी में पीएम मोदी को चुनौती देने की तैयारी कर रही हैं. बात करें 2014 के लोकसभा चुनाव की तो वह एक दौर था जब वाराणसी में केसरिया रंग के आगे बाकी सारे रंग फीके पड़ गए थे. लेकिन बीते 5 सालों में गंगा में काफी पानी बह गया है और सवाल इस बात का है कि क्या काशी फिर से ‘नमो’ के लिए तैयार है या फिर किसी और विकल्प में तलाश में है. उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा और बसपा के गठबंधन ने वोटों के गणित को बदल दिया. दोनों के संयुक्त वोटबैंक ने कई सीटों के समीकरण बदल दिए हैं. वाराणसी भी इससे अछूती नहीं है अगर प्रियंका गांधी यहां पर विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ती हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राह मुश्किल हो सकती है. 2014 के चुनाव में प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी को कुल 5,81,022 वोट मिले थे. नरेंद्र मोदी अपने निकटतम प्रतिद्वंदी अरविन्द केजरीवाल से तकरीबन 3 लाख 77हज़ार वोटों से हराया था. दूसरे स्थान पर रहने वाले आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल को 2,09,238 वोट मिले. जबकि कांग्रेस प्रत्याशी के अजय राय को 75,614 वोट, बीएसपी को तकरीबन 60 हज़ार 579 वोट, सपा को 45291 वोट मिले थे. यानि सपा-बसपा और कांग्रेस का वोट जोड़ दे तो 3लाख 90 हज़ार 722 वोट हो जाते हैं. मतलब पीएम मोदी की जीत जो अंतर था वह सभी दलों के संयुक्त वोट बैंक से पीछे हो जाता है. सवाल इस बात है कि जिस तरह से सपा-बसपा ने रायबरेली और अमेठी में अपने प्रत्याशी न उतारने का फैसला किया है अगर प्रियंका वाराणसी से चुनाव लड़ती हैं तो क्या उनके लिए भी रास्ता खाली कर दिया जाएगा.

बात जातिगत समीकरण की करें तो वाराणसी में बनिया मतदाता करीब 3.25 लाख हैं जो कि बीजेपी के कोर वोटर हैं. अगर नोटबंदी और जीएसटी के बाद उपजे गुस्से को कांग्रेस भुनाने में कामयाब होती है तो यह वोट कांग्रेस की ओर खिसक सकता है. वहीं ब्राह्मण मतदाता हैं जिनकी संख्या ढाई लाख के करीब है. माना जाता है कि विश्वनाथ कॉरीडोर बनाने में जिनके घर सबसे ज्यादा हैं उनमें ब्राह्मण ही हैं और एससी/एसटी संशोधन बिल को लेकर भी नाराजगी है. यादवों की संख्या डेढ़ लाख है. इस सीट पर पिछले कई चुनाव से यादव समाज बीजेपी को ही वोट कर रहा है. लेकिन सपा के समर्थन के बाद इस पर भी सेंध लग सकती है. वाराणसी में मुस्लिमों की संख्या तीन लाख के आसपास है. यह वर्ग उसी को वोट करता है जो बीजेपी को हरा पाने की कुवत रखता हो.

इसके बाद भूमिहार 1 लाख 25 हज़ार, राजपूत 1 लाख, पटेल 2 लाख, चौरसिया 80 हज़ार, दलित 80 हज़ार और अन्य पिछड़ी जातियां 70 हज़ार हैं. इनके वोट अगर थोड़ा बहुत भी इधर-उधर होते हैं तो सीट का गणित बदल सकता है. आंकड़ों के इस खेल को देखने के बाद अगर साझेदारी पर बात बनी और जातीय समीकरण ने साथ दिया तो प्रियंका गांधी मोदी को टक्कर दे सकती हैं. हालांकि मोदी ने जिस तरह से पिछले साढ़े चार सालों में वाराणसी में विकास के जो काम किया है क्या उसे नजरंदाज किया जा सकता है, यह भी अपने आप में एक बड़ा सवाल है. लेकिन अगर प्रियंका वाराणसी से चुनाव लड़ती हैं तो हार जीत से पहले कांग्रेस उत्तर प्रदेश में एक बड़ा संदेश में कामयाब हो जाएगी.

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