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तेजी से घट रहा एचआईवी संक्रमण

 उज्जैन 30 नवम्बर 2018 । विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एड्स का पहला केस जो 1981 में सामने आया था, से लेकर अब तक करीब 39 मिलियन लोग इस बीमारी का शिकार हो चुके हैं। इतने लंबे अर्से के दौरान होने वाले वैज्ञानिक खोजों, सालों से चल रहे रिसर्च और सारी दुनिया में इसके लिए आई जागरुकता के बावजूद इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। यूएन एड्स की एक रिपोर्ट के अनुसार कुल 35 मिलियन एचआईवी/एड्स ग्रसित लोगों में से 19 मिलियन लोगों को यह पता नहीं हैं कि उनमें यह वायरस मौजूद है। एचआईवी के ज्यादातर मरीज कम या मध्यम आय वाले देशों में होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार सब सहारा अफ्रीका में एचआईवी के सबसे ज्यादा मरीज यानी 24.7 मिलियन मरीज हैं और यह आकंडा पूरी दुनिया में पाए जाने वाले मरीजों का 71 प्रतिशत है।
यह खुलासा राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन के कार्यकारी सदस्य डॉ नरेश पुरोहित ने विश्व बैंक की स्वास्थ्य संबंधित पत्रिका मे हाल ही में प्रकाशित अपनी समीक्षा रिपोर्ट में किया।
उन्होंने अपनी समीक्षा रिपोर्ट के आधार पर ब्लू आईज को बताया कि भारत में 2.1 मिलियन लोग एचआईवी से ग्रसित हैं और इस आंकडे के साथ पूरी दुनिया में पाए जाने वाले मरीजों वाले देशों में इसका तीसरा नबंर है।
नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (नाको) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में एचआईवी संक्रमण के नए मामलों में 19 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है पर फिर भी यहां नए मरीज का प्रतिशत एशिया-पेसिफिक रीजन में पनपने वाले नए मामलों का 38 प्रतिशत है। भारत में एचआईवी के करीब 64 प्रतिशत मरीजों को एंटीरेट्रोवियल थेरेपी से इलाज नहीं मिल पाता है। भारत में एड्स से होने वाली मौतों में 2005 और 2015 के बीच 38 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। इस दौरान एचआईवी के इलाज की उपलब्धता में वृद्धि दर्ज की गई थी।
डॉ पुरोहित ने रिपोर्ट में बताया कि सन 2016 के अंत तक 7 लाख लोगों से ज्यादा लोग एंटीरेट्रोविरल थेरेपी ले रहे थे जो कि किसी भी देश में एचआईवी का इलाज लेने वाले मरीजों की संख्या में दूसरे नंबर पर आता है। सेक्स वर्कर महिलाओं में होने वाला एचआईवी इंफेक्शन 10.3 प्रतिशत से 2.7 प्रतिशत पर आ गया है पर यह प्रतिशत आसाम, बिहार और मध्यप्रदेश में बढ़ा है।
यह है भारत में एड्स से प्रभावित लोगों की बढ़ती संख्या के संभावित कारण:
-आम जनता को एड्स के विषय में सही जानकारी न होना
-एड्स तथा यौन रोगों के विषयों को कलंकित समझा जाना
-शिक्षा में यौन शिक्षण व जागरूकता बढ़ाने वाले पाठ्यक्रम का अभाव
-कई धार्मिक संगठनों का गर्भ निरोधक् के प्रयोग को अनुचित ठहराना आदि।

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