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पत्रकारिता में पठनीयता का संकट

नई दिल्ली 11 फरवरी 2020 । विषय वाकई चिंताजनक है। अनुभव के मुताबिक दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही नहीं है। पर वर्तमान परिदृश्य पीड़ा देने लगा है। पत्रकार लिख रहा है, पर पढ़ने की फुरसत नहीं है। अब तो वह अपना लिखा भी नहीं पढ़ता।कॉपी पेस्ट की कला ने तेजी से विस्तार किया है। बुद्धिजीवी इस बदलाव से हैरान हैं।पर अफसोस वह इस बदलाव को बदलने के बजाय खुद को बदलने की तैयारी में जुट गए हैं। अब न्यूज रूम में खबरों को सूक्ष्म रूप देने पर मंथन हो रहा है। पठनीयता पर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। व्हाट्सएप पत्रकारिता की तैयारी चल रही है।क्रिस्पी और क्रंची खबरों को बनाने पर मंथन हो रहा है। पर पठनीयता बरकरार रखने की चुनौती सारी कवायद पर पानी फेर रही है। अखबार दिन की सबसे बड़ी खबर भी पाठकों को पढ़ाने में नाकाम साबित हो रहे हैं। इस नाकामी का ठीकरा बदलाव पर थोपने में लगे हैं।

पत्रकारिता के अभिनव प्रयोग
पहले पत्रकार की भर्ती होती थी तो उससे विज्ञप्ति बनवाई जाती थी। लेखन शैली में सुधार होने पर स्टेशन, अस्पताल और पोस्टमार्टम जाकर खबरें लिखना सीखता था। परिपक्व होने पर डेस्क की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी, पर अब सीधे डेस्क पर भर्ती होती है। जिसे न भौगोलिक परिदृश्य का ज्ञान होता है न सामाजिक ताने बाने की समझ। ऐसे में वह खबरों से कितना न्याय कर पाएगा?यह समझ से परे है। पर इस बाधा दौड़ में कोई अखबार पीछे नहीं रहना चाहता।

बिना पढ़े, खबरों को गढ़े
मौजूदा दौर पत्रकारिता के लिए सर्वाधिक चुनौतियों भरा है। डेस्क प्रभारी पर खबरें संपादित करने के अतिरिक्त पेज बनाने, फोटो चयन करने, कैप्शन लिखने की जिम्मेदारी है। समय का अनुपालन भी सुनिश्चित करना है। इसी अवधि में उसे डिजिटल का भी काम करना है। भाई पत्रकार मशीन तो है नहीं।मशीन भी गर्म हो जाती है। भाई, पत्रकार को पढ़ने का भी तो मौका दो। बिना पढ़े ही वह गढ़े जा रहा है।

निराशा से बढ़ी नीरसता
पत्रकारिता की अधोगति का सबसे अहम कारण यही दिखता है। नौकरी में नीरसता बढ़ती जा रही है। न पदोन्नति का कोई पैमाना है न वेतनवृद्धि का कोई मानक। तमाम मीडिया हाउस में सब बॉस की कृपा पर निर्भर है। जिस पद पर पत्रकार की भर्ती हुई उसी पद पर वर्षों काम करता रहेगा तो नीरसता स्वाभाविक है। तमाम बड़े नामों पर उनके आदमी होने का ठप्पा लगा है। निजी अस्तित्व गायब।क्षमता से ज्यादा काम लेने पर गुणवत्ता की उम्मीद बेमानी है।

स्टाइल शीट बड़ी या खबर
इस सवाल पर तमाम संपादकों के अपने तर्क हैं। हर खबर की अपनी तासीर है। खबर के हिसाब से स्टाइल शीट का निर्धारण होता है न कि स्टाइल शीट से खबर का। आज भी पाठक अखबार में खबर खोजता है न कि उसका सौंदर्य। पाठक खूबसूरत विज्ञापन के पेज को पलटकर खबरों को तलाशता है। यही वजह है कि बाजार खबरों के बीच विज्ञापन चाहता है।

खबरों में घटती रोचकता
एक दौर था जब दिन की शुरुआत बिना अखबार के अधूरी रहती थी। तमाम अखबार आज भी जीवनशैली का हिस्सा हैं।चैनलों की शुरुआत जितनी धमाकेदार थी वर्तमान उतना ही त्रासद। पहले लोग चैनलों की बात को सच मानते थे पर अब उससे विश्वास उठने लगा है। कारण खबरों में रोचकता न होना। जबरन उसे क्रिस्पी बनाना। कमोवेश यही हाल अखबारों का है।मुझे नहीं लगता कि अखबारों की विश्वसनीयता कभी कम होगी। जरूरत कंटेंट बढ़ाने की है, उसमें रोचकता लाने की है।

दर्शन और प्रदर्शन का द्वंद्व
पत्रकारिता में इन्हीं दो में द्वंद्व चल रहा है।क्योंकि दर्शन में आलोक होता है और प्रदर्शन में आडंबर। दर्शन को प्रदर्शन से परहेज़ है। और छद्म विद्वता बिना प्रदर्शन के अधूरी है। तमाम लालित्यपूर्ण सम्पादकों से सवाल होना चाहिये कि उन्होंने एक माह में कितनी खबर संपादित की।किस खबर का मूल्य संवर्धन किया। कौन सा रोचक शीर्षक लगाया। उसे नजीर के तौर पर सहयोगियों के सामने रखा जाए, ताकि वह मार्गदर्शन प्राप्त कर खुद को निखार सकें। अगर वह एक माह में एक खबर और एक शीर्षक का भी उल्लेख नहीं कर सकते तो सहयोगियों से अपेक्षा बेमानी होगी।

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