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एक अभिनेत्री से हार गए शिवसेना के स्वनामधन्य नेता

मुंबई 11 सितम्बर 2020 ।  इंडिया डेटलाइन. शिवसेना के बड़बोले मुख्य प्रवक्ता संजय राऊत गुरुवार शाम को सब कुछ लुटाकर होश में आए और कहना पड़ा-’शिवसेना के लिए कंगना एपीसोड खत्म हुआ। हमारे पास और भी काम हैं।’ यानी कंगना जीत गईं। शिवसेना हार गई। एक पार्टी की छवि को एक अभिनेत्री ने ज़मीन पर ला दिया।

शिवसेना ने कंगना के दफ़्तर का हिस्सा तुड़वाया लेकिन कंगना ने उनके ग़ुरूर को तोड़ दिया। छवि भंग कर दी। राजनीति से नावाक़िफ़ कलाकार ने उनकी राजनीतिक परिपक्वता को सवालिया निशानों से भेद दिया। एक औरत की ललकार ने मराठी मानुष के नाम की ‘रोटियाँ सेंकने वाले मर्दों’ को झाँकने को मजबूर कर दिया। अदालत की रोक, महाराष्ट्र की राजनीति के चाणक्य शरद पवार की नाख़ुशी और शिवसेना के कृत्य पर प्रतिक्रिया की बाढ़ ने आज बड़बोले नेताओं की ज़ुबान को तालू से चिपकाए रखा। राऊत के तेवर गायब थे। लिजलिजे अंदाज में सफाई देते रहे-वह तो बीएमसी का काम था। शिवसेना का लेना-देना नहीं है।

कंगना-राऊत विवाद महाराष्ट्र की राजनीति का अप्रिय प्रसंग है। इसने उद्धव ठाकरे की शिवसेना के व्यवहार व काम करने की शैली पर सवालिया निशान लगाए हैं। यदि राऊत कंगना के पाकिस्तान अधिकृत काश्मीर वाले बयान पर नहीं उलझते तो छोटा सा मामला बनकर आया-गया हो गया होता लेकिन उन्होंने इसे तूल देकर फ़ज़ीहत करा ली। शरद पवार ने कहा कि (कंगना के) बयानों को अनावश्यक ही ज्यादा तवज्जोह दी गई। मुंबई के पत्रकार संजय जोग का कहना है-शिवसेना मराठी अस्मिता की बात कहते-कहते बदले की भावना पर उतर आई और इसे समझ ही नहीं पाई।

कंगना पहले ही बहुत मुखर अभिनेत्री के तौर पर उभरी हैं। शिवसेना नेताओं और सरकार ने जो किया, उसने उन्हें सीधी मुठभेड़ में ला दिया। राऊत और उद्धव यदि मँजे राजनेता हैं तो उन्हे प्रतिद्वंद्वी की ताकत का अनुमान करना चाहिए था। कंगना ने उन्हे उकसाया और एक्सपोज़ कर दिया। कंगना ने जितने तीखे हमले किए, उनका जवाब राऊत सही ढंग से नहीं दे पाए। उन्होंने ‘हरामखोर’ कहकर और बाद में उसके गलत-सलत मतलब बताकर खुद की प्रतिष्ठा गिराई। उल्टे, फ़्री प्रेस जर्नल के अनुसार कंगना ने खुद को दक्ष राजनीतिक साबित किया। उसके मुताबिक ‘शिवसेना के अनाड़ियों’ ने तुच्छ से मौखिक झगड़े को फ़िल्मी लड़ाई में तब्दील करने दिया और इसे मातोश्री ( ठाकरे का निवास) तक लाने दिया। कंगना ने उद्धव ठाकरे की कोरोना से निपटने की योद्धा छवि को धूल में मिला दिया। राऊत के फेर में उद्धव को ‘वंशवाद का नमूना’ जैसी कठोर उपमाएँ सुननी पड़ीं।

कंगना के बयानों की प्रतिक्रिया के बदले उनके दफ़्तर पर हथौड़े चलवाने की लोगों में अच्छी प्रतिक्रिया नहीं हुई। इसे शरद पवार ने भाँपा और शिवसेना नेताओं को बताया। बृहन्नमुंबई नगरपालिका ने चौबीस घंटे के नोटिस (वार्ड अफसर ने ऐसे किसी नोटिस से इंकार किया था।) पर दफ़्तर तुड़वाया। तब जबकि, कंगना मुंबई से बाहर थी और न्यायालय ने कोरोना काल में ऐसी तोड़फोड़ पर रोक लगा रखी है। यह वह बीएमसी है जो मुंबई में ग़ैर क़ानूनी निर्माणों की शिकायतों में से पिछले साल केवल 11 प्रतिशत पर ही कार्रवाई कर पाई है। कंगना ने इस पर तीखे शब्दों में कहा-आज मेरा घर तोड़ा है, कल तेरा ग़ुरूर टूटेगा। कंगना की भाषा तमीज़ की नहीं थी लेकिन राऊत के हरामखोर शब्द ने कंगना की तरफ अंगुली उठाने वालों को रोक दिया।

कंगना ने इस मौके का खूब फ़ायदा उठाया। उन्होंने फ़्री प्रेस वाले ‘शिवसेना के अनाड़ियों’ की हिंदुत्व की छवि में भी छेद कर दिया। उन्होंने अपने घर को ‘ राम मंदिर’और तोड़ने वालों को बाबरी सेना बता दिया। इससे तिलमिलाए एक शिवसेना सांसद को सफाई देनी पड़ी कि हम तो अयोध्या में बाबरी मस्जिद के खिलाफ आंदोलन में शामिल थे। कंगना ने काश्मीर के पंडितों की पीड़ा की बात भी बड़े जाने-बूझे तरीके से की। यही नहीं, अयोध्या और काश्मीरी पंडितों पर फिल्म बनाने तक का ऐलान कर दिया। इस तरह उन्होंने शिवसेना से अच्छे कार्ड खेले। उन्हें यदि फिल्में चलाने के लिए पब्लिसिटी चाहिए तो वह भी खूब मिली और राजनीति करना है तो उसकी जमीन भी तैयार हुई। शिवसेना को ‘सोनिया सेना’ कहकर उन्होंने अपने पाले को एकदम स्पष्ट कर दिया। वैसे उनकी पीठ पर भाजपा का हाथ छिपा नहीं है। शिवसेना के क़दम ने उन्हें उस पाले में और ज्यादा धकेल दिया। फ़्री प्रेस के मुताबिक भाजपा को एक प्रतीक/शुभंकर (मैस्कॉट) मिल गया।

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