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युवती और संत के कारण घेरे में आए शिवराज और इंदौर पुलिस

 इंदौर 16 जनवरी 2019 । मानना पड़ेगा मोटा भाई को, एक झटके में शिवराज सिंह के मंसूबों पर पानी ही नहीं फेरा वरन उन्हें कांग्रेस द्वारा आए दिन किए जाने वाले हमलों से भी बचा लिया।यदि अब भी शिवराज का मन मध्यप्रदेश में और अपने भूतपूर्व सपनों के शहर इंदौर में भटक रहा हो तो कोई ना कोई यह सवाल पूछ ही लेगा मामाजी बताइये तो सही सवा दो साल पहले शहर की आपकी एक भांजी ट्विंकल डागरे की जिस निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई, उस पूरे मामले से आप आँख क्यों चुराते रहे, उस परिवार से मिलने से क्यों कतराते रहे? वैसे तो शहर में महापौर भी महिला ही हैं लेकिन विधायक मालिनी गौड़ तो इस तरह के प्रश्नों का जवाब दे नहीं सकतीं। आठ बार से लगातार जीततीं रहीं सुमित्रा महाजन भी हैं लेकिन जो नाली-पानी-सफाई आदि के काम को सांसद के लायक नहीं मानतीं उनसे भी यह पूछना बेकार है कि आप के लाड़ले रहे विधायक सुदर्शन गुप्ता जिस जगदीश करोतिया को अपने सिर पर हेट जैसा रक्षा कवच बना कर घूमते रहे उसके कुकृत्यों से आप ने क्यों आँखें मूँदे रखी। संसद की कार्रवाई संचालन के दौरान कई बार देखा है कि ठीक से सुन नहीं पाने पर आप सांसदों से कही गई बात रिपीट करवाती रहती हैं लेकिन हत्याकांड के कथित आरोपियों को मनुहार के साथ भोजन परोसते वक्त भी आप ठीक से इन क़ातिलों की सूरत नहीं देख पाईं? तीन नंबर से ज्यादा एक नंबर की गतिविधियों पर नजर रखने वालीं (अब महू से) विधायक उषा ठाकुर को दुर्गा सप्तशती के पाठ कराने का वक्त तो मिला, सुदर्शन गुप्ता की तरह चुनरी यात्रा में मातृशक्ति का गुणगान भी करती रहीं लेकिन डागरे परिवार की बात सुनने, भांजियों के मामा को हकीकत बताने का शौर्य क्यों नहीं दिखा सकी? मातृशक्ति को नमन करने, बात बात में अहिल्या देवी का चरण वंदन करने वाले भाजपा के शहर-जिला-प्रदेश पदाधिकारियों की भी नींद नहीं खुली कि पार्टी की नाक कटाने वाले इन लोगों की सिफारिश करने से बचें।

अच्छा करा जो अमित शाह ने शिवराज को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना कर अपने साथ कर लिया। वहां कितना सम्मान मिल रहा है यह तो उस वॉयरल हुए वीडियो में मोटा भाई के साथ ही जेटली के एक्शन में नजर आ ही गया है।तेरह साल में आम आदमी की जिस तरह अनदेखी की गई, थोथे ढोल-नगाड़े पीटे गए उसकी सजा भाजपा को तो डागरे जैसे अनेकों परिवारों की हायकलाप से मिल चुकी है।

इन सवा दो सालों में पुलिस का रोल भी बहुत अच्छा नहीं रहा है। फिर चाहे एडीजी हों, डीआयजी, एएसपी हों या सीएसपी, टीआई हों, कातिलोँ को सम्मान और फरियादियों-पीड़ितों से गुंडों जैसा बर्ताव इंदौर पुलिस की हठधर्मिता का ही परिणाम रहा कि डागरे हत्याकांड में आमजन जिस सच को समझ चुका था वह पुलिस को करीब सत्ताइस महीनों बाद समझ आया। अभी जो बड़े पदों पर बैठे पुलिस अधिकारी हैं वो अपने हाथों अपनी पीठ थपथपाने का प्रयास तो कतई नहीं करें, भला हो कि निज़ाम बदलने से पुलिस महकमे को अपनी इज्जत बचाने का खयाल आ गया।इस मामले में तब के विधायक और मामाजी को भूतपूर्व कर के जनता ने तो अपना फैसला सुना दिया था, अब मुख्यमंत्री को उन तमाम नाकारा पुलिस अधिकारियों को सबक सिखाना चाहिए जो अपनी वर्दी का खौफ डागरे परिवार जैसे पीड़ितों को दिखाते रहे।

यह भी मानना पड़ेगा कि इंदौर पुलिस ने आम पीड़ित डागरे परिवार से लेकर खास पीड़ित भय्यू महाराज परिवार के प्रति एक समान हठीला रवैया रखा है।भय्यू महाराज ने जिन परिस्थितियों में आत्महत्या की उस की असली वजह तक तो जाँच अधिकारी अब तक नहीं पहुँच पाए हैं।इस मामले में बड़े अधिकारियों से लेकर सीएसपी तक जिस लापरवाही से जाँच को अंजाम देते रहे वह इंदौर पुलिस के चेहरे पर कालिख समान इसलिए भी है कि जाँच करने वाले एक सीएसपी का हमेशा इस बात पर दबाव रहता था कि इस परिवार की महिला उनसे अकेले में मिले।

संदिग्ध परिस्थितियों में बीते साल उदयसिंह देशमुख (भय्यू महाराज) और पत्रकार कल्पेश याग्निक ने आत्महत्या की थी।याग्निक प्रकरण में तो पुलिस ने खूब तत्परता दिखाई क्योंकि शिवराजसिंह की दिलचस्पी भी थी। भय्यू महाराज के यहां बड़े राजनेता शोक व्यक्त करने नहीं गए लिहाजा इस मामले को भी डागरे परिवार वाली श्रेणी में डाल दिया। अब जिस तरह से रोज नित नए ख़ुलासे हो रहे हैं वह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि ये पुलिस अमला स्कॉटलैंड का तो नहीं है। जिले के प्रभारी मंत्री बाला बच्चन प्रदेश के गृहमंत्री भी हैं चूँकि वे कमलनाथ के अति विश्वस्त भी हैं तो शहर के आमजन उन पर यह भरोसा कर सकते हैं कि नाकारा पुलिस अधिकारियों पर भी सख्त कार्रवाई होगी जिससे आमजन में यह विश्वास मजबूत हो कि फिर किसी पीड़ित को डागरे परिवार की तरह पुलिस की बेरहमी-बेदिली का शिकार नहीं होना पड़ेगा।

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