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शिवराज ने विधानसभा में साबित किया विश्वास मत

भोपाल 24 मार्च 2020 । मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में चौथी बार शपथ लेने वाले शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को विधानसभा में विश्वास मत हासिल किया. सोमवार देर रात को ही शिवराज ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए शिवराज सरकार को 104 के आंकड़े की जरूरत थी. लेकिन बीजेपी ने 112 विधायकों का समर्थन साबित किया. इससे पहले 22 विधायकों के इस्तीफे के बाद अल्पमत में आने के कारण कमलनाथ ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था.

विधानसभा में शिवराज सरकार को कुल 112 विधायकों का समर्थन हासिल हुआ. इसमें भाजपा के 107 के अलावा बसपा-सपा और निर्दलीय विधायकों ने भी बीजेपी का समर्थन किया.

बता दें कि सोमवार को शपथ लेने के बाद शिवराज की ओर से विधानसभा का चार दिन का विशेष सत्र बुलाया गया है, जो 24 मार्च से 27 मार्च तक चलेगा. विधानसभा के चार दिवसीय विशेष सत्र में सदन की कुल तीन बैठकें होंगी.

बता दें कि कमलनाथ सरकार के इस्तीफे के चार दिन बाद सोमवार की शाम शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. इसी के साथ शिवराज प्रदेश के पहले नेता हैं, जो चौथी बार मुख्यमंत्री बने हैं. शिवराज के हाथों में सत्ता की कमान आते ही विधानसभा स्पीकर नर्मदा प्रसाद प्रजापति ने आधी रात को ही स्पीकर पद से इस्तीफा दे दिया. विधानसभा उपाध्यक्ष को भेजे अपने इस्तीफे में उन्होंने नैतिकता को आधार बनाया है.

शिवराज सिंह चौहान मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभालते ही एक्शन मोड में आ गए. उन्होंने सबसे पहले कोरोना वायरस (COVID19) के मद्देनजर वल्लभ भवन में प्रदेश के वरिष्ठ अधिकारियों एवं केन्द्र से आए उच्च अधिकारियों के साथ आपातकालीन बैठक की और इससे निपटने के लिए आवश्यक कदम उठाने के लिए अधिकारियों को दिशा-निर्देश दिए. शपथ लेने के बाद मुख्यमंत्री चौहान मंत्रालय पहुंचे और पूजा-अर्चना भी की.

शिवराज सिंह चौहान ने चौथी बार मध्य प्रदेश के सीएम के रूप में शपथ ली

शिवराज सिंह चौहान ने सोमवार शाम भोपाल के राजभवन में एक समारोह में राज्यपाल लालजी टंडन द्वारा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। यह चौथी बार है जब शिवराज सिंह चौहान को सीएम पद की शपथ दिलाई गई है।

शिवराज के लिए तोमर बन गए संकट मोचक, पुरानी दोस्ती निभाई

मध्यप्रदेश भाजपा विधायक दल की बैठक भोपाल में होने जा रही है और शिवराज सिंह लगातार चौथी बार सीएम की शपथ रात 9 बजे लेने वाले है । आखिरकार एमपी भाजपा की सियासत के चाणक्य केंद्रीय मन्त्री नरेंद्र तोमर जिनका की सीएम बनना तय माना जा रहा था ,अचानक कैसे पांसा पलटकर हाईकमान को शिवराज के नाम पर राजी कर लिया ? यहां केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने एक बार फिर शिवराज सिंह चौहान से पुरानी दोस्ती निभाई है।
इस बदलाव से शिवराज को सीएम बनने से रोकने में लगे भाजपा के कई महत्वाकांक्षी और अपने को निर्णायक मान बैठे नेता अब हतप्रभ है । उन्हें समझ ही नही आया कि कैसे तोमर ने सीएम पद के उम्मीदवारों को इस दौड़ से बाहर किया और फिर अपने दोस्त को ही सीएम की शपथ दिलाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया ।
सूत्रों की माने तो यह तोमर की सोची समझी रणनीति थी । विधानसभा चुनाव के पहले से ही हाईकमान प्रदेश की कमान किसी नए नेतृत्व के हवाले करना चाहता था और प्रदेश के कई बड़े नेता शिवराज की जगह ख़ुद को सीएम की कुर्सी पर बिराजमान देंखने के सपने पालने लगे थे । यही वजह है कि विधानसभा चुनाव हारने के बाद लाख प्रयासों के बावजूद शिवराज सिंह नेता प्रतिपक्ष नही बन सके । उनकी जगह गोपाल भार्गव को इस पद पर बिठा दिया गया । पार्टी हाईकमान लगातार शिवराज को केंद्रीय राजनीति में ले जाने की कोशिश करता रहा। इसी योजना के तहत उन्हें पार्टी के सदस्यता अभियान का राष्ट्रीय प्रभारी बनाकर उनका मुख्यालय दिल्ली कर दिया गया । लेकिन उन्होंने भोपाल नही छोड़ा । यहां की पार्टी की गतिविधियां उन्होने अपने आसपास ही रखी । भार्गव के नेता प्रतिपक्ष होने के बावजूद प्रदेश की हर गतिविधि पर सक्रिय शिवराज सिंह चौहान ही नज़र आये ।
होली के पहले जब ऑपरेशन लोटस की शुरुआत हुई तब इसमें शिवराज शामिल नही थे लेकिन इसकी भनक लगते ही शिवराज सिंह ने अभियान में अपने खास समर्थक भूपेंद्र सिंह की एंट्री करा दी और फिर एक हफ्ते में ही यह ऑपरेशन शिवराज सिंह के आसपास घूमने लगा ।
जब ऑपरेशन सफलता के नज़दीक पहुंचा तो पार्टी में सीएम की कुर्सी के लिए अनेक दावेदार सक्रिय हो गए।
इस मुहिम की मंशा भांपकर तोमर सक्रीय हुए लेकिन मौन रहकर काम करने के शौकीन तोमर ने गोटियां बिछाना शुरू किया । हाल में ही में कांग्रेस छोड़ भाजपा में आये ज्योतिरादित्य सिंधिया को राय शुमारी के शामिल कराया और उन्होने तोमर का नाम सुझाया । शिवराज ने भी कहा तोमर बदलाव में श्रेष्ठ रहेंगे ।
इस समय सत्ता हो पार्टी की राजनीति में श्री तोमर का कद सिरमौर है । तोमर का नाम आते ही बाकी दावेदार पीछे हटने लगे और तोमर लगातार सीएम की दौड़ में शामिल होने से इनकार करते रहे ।
सूत्रों की माने तो वे इस दौड़ में थे ही नही.. यह तो शिवराज सिंह को सीएम बनवाने की उनकी रणनीति का हिस्सा था । उन्होंने मास्टर गोल टैब खेला जब भाजपा अविश्वास प्रस्ताव के मामले में सुप्रीम कोर्ट पहुंची । वहां भाजपा को ओर से पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ,नेता प्रतिपक्ष या सचेतक की तरफ से नही याचिका शिवराज सिंह की तरफ से लगाई थी । सुप्रीम कोर्ट ने दूसरे दिन ही फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दिया जिसके चलते कमलनाथ सरकार टेस्ट से पहले ही ढह गई ।
इसके बाद शिवराज ने भोपाल में मोर्चा सम्भाला और तोमर ने दिल्ली में । यहां तक कि कांग्रेस के बागी विधायकों को भाजपा में शामिल कराने का जो आयोजन पार्टी के अध्यक्ष जेपी नड्डा की मौजूदगी में हुआ, उसमें शिवराज को छोड़कर पार्टी के सभी बड़े नेता शामिल थे । जब कांग्रेस के बागी भाजपा की सदस्यता ले रहे थे तब शिवराजसिंह कार्यवाहक सीएम कमलनाथ के घर चाय पी रहे थे । अटकलें साफ थी प्रदेश का सीएम तोमर बनेंगे ।
लेकिन श्री तोमर ने रणनीति के तहत पहले तो प्रदेश के अन्य दावेदारों को दौड़ से बाहर का स्वयं का नाम निर्विवाद शीर्ष पर पहुचाया और उसके बाद हाईकमान को बताया कि इस समय शिवराज सिंह की ताजपोशी क्यों जरूरी है ।
1 – 25 उप चुनाव होना है जिनमे जीत ही भाजपा सरकार का भविष्य तय करेगी । शिवराज पार्टी के इकलौते पॉपुलर चेहरा है जिनका जनता और कार्य कर्ताओ से सीधा संपर्क है जिसकी अभी पार्टी को दरकार है ।
2 – प्रदेश में तत्काल एक्टिव हो जाने वाली सरकार चाहिए और यह शिवराज दे सकते है क्योंकि पंद्रह साल सीएम रहने के कारण उनका जमा जमाया प्रशासनिक सेट अप है । तीन- अभी जो विधायक है उनमें से अस्सी फीसदी शिवराज सिंह के समर्थक है । तोमर आज सुबह पार्टी के निर्णायकों को अपनी राय से संतुष्ट करा सके और अंततः दोपहर में घोषणा हुई कि शाम को ही विधायक दल की बैठक हो जिसमें शिवराज सिंह के नाम पर मुहर लगे और तत्काल राज्यपाल को बहुमत की चिट्ठी सौंपकर उनजे सीएम पद की शपथ दिलाई जाए । चूंकि अभी कोरोना के चलते लॉक डाउन है इसलिए या तो शिवराज अकेले शपथ लेंगे या फिर दस मन्त्री बजी शामिल होंगे जिनमे छह कांग्रेस के बागियों में से शामिल हो सकते है । हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान आज अकेले ही शपथ लेंगे बाद में मंत्रियों की शपथ कराई जाएगी । इस बार मुख्यमंत्री पद की दौड़ में केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत भी शामिल थे। हालांकि श्री गहलोत कभी भी आगे बढ़कर किसी पद को लेकर राजनीति नहीं करते हैं इसलिए वे शीर्ष नेताओं के सामने एक बार फिर निस्वार्थ नेता के रूप में उभर कर सामने आए है।

मध्य प्रदेश की सियासत में रियासत की भूमिका अहम, सिंधिया, दिग्विजय सबसे ज्यादा सक्रिय

प्रदेश की सियासत के तीन धड़े कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया। ये वो कड़ी है जिनके आस-पास प्रदेश की सियासत घूमती है। लेकिन कमलनाथ ने 15 महीने की सरकार में दिग्विजय सिंह के साथ मिलकर सिंधिया को किनारे कर दिया और फिर राजनीति में वो हुआ जिसकी शायद कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

मध्य प्रदेश में जारी सियासी उठापटक उस वक्त समाप्त हो गया जिस वक्त कांग्रेस सरकार का नेतृत्व कर रहे कमलनाथ ने प्रेस वार्ता कर 15 साल बनाम 15 महीने का जिक्र किया और प्रदेश की जनता को धन्यवाद कहते हुए अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी। तत्पश्चात राजभवन पहुंचकर राज्यपाल लालजी टंडन को अपना इस्तीफा सौंप दिया और राज्यपाल ने नयी सरकार के गठन तक कमलनाथ को कार्यकारी मुख्यमंत्री बने रहने का निर्देश दिया।
खुद की लंका को कमलनाथ ने ढहाया- प्रदेश की सियासत के तीन धड़े- कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया। ये वो कड़ी है जिनके आस-पास प्रदेश की सियासत घूमती है। लेकिन कमलनाथ ने 15 महीने की सरकार में दिग्विजय सिंह के साथ मिलकर सिंधिया को किनारे कर दिया और फिर राजनीति में वो हुआ जिसकी शायद कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। 18 साल तक कांग्रेस में बने रहने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा के हो लिए और कमलनाथ ने अपनी सरकार को खुद गिरने दिया।

लेकिन प्रदेश की सियासत में रियासत का भी काफी बड़ा योगदान है। देश के दिल यानी कि मध्य प्रदेश में अभी भी जनता महाराज, कुंवर सा, रानी सा जैसा सम्मान करते हैं। लोकतंत्र में भले ही अब जनता को राजा माना जाता है लेकिन यहां की ग्रामीण जनता अभी भी राजघराने के लोगों को अपना राजा मानती है और उनके आदेशों का पालन करती है। तभी तो कांग्रेस के 22 बागी विधायकों ने सिंधिया की मौजूदगी में भाजपा का दामन थाम लिया और प्रदेश की कमलनाथ सरकार को गिरा दिया। तीन रियासतों ने की केंद्र की सियासत…
ग्वालियर का सिंधिया घराना -मध्य प्रदेश में जनसंघ और फिर भारतीय जनता पार्टी को मजबूत बनाने में ग्वालियर के सिंधिया खानदान का अहम योगदान रहा है। राजमाता विजयराजे ने भाजपा को सींचना शुरू किया था और अब ज्योतिरादित्य सिंधिया उसे आगे बढ़ा रहे हैं। सिंधिया खानदान में माधवराव सिंधिया और ज्योतिरादित्य के अलावा हर शख्स भाजपा की ही राजनीति करता आया था। लेकिन अब ज्योतिरादित्य सिंधिया भी अपनी दादी मां के सपने के साथ जुड़ गए।
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ दोस्ती और 18 सालों के कमजोर पड़ते कांग्रेसी रिश्तों को छोड़कर सिंधिया ने विकास पुरुष नरेंद्र मोदी को अपनाया और अपने सफर में निकल गए।
सियासी संकट के बीच भाजपा और कांग्रेस के अपने अपने दाव पेच
राघौगढ़ का राजघराना -राघौगढ़ राजघराने ने तो प्रदेश की सत्ता को भी संभाला था। एक वक्त था जब मध्य प्रदेश में माधवराव सिंधिया और दिग्विजय सिंह की अच्छी पकड़ थी लेकिन पार्टी ने दिग्विजय सिंह को प्रदेश की कमान सौंपी और उन्होंने 10 साल तक जनता की सेवा की। इसके बाद दिग्विजय सिंह राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हुए और राहुल गांधी को राजनीति के गुर सिखाए। दिग्विजय सिंह के अलावा उनके भाई लक्ष्मण सिंह अभी विधायक हैं और पूर्व में सांसद भी रह चुके हैं। जबकि दिग्विजय के बेटे जयवर्धन अभी प्रदेश सरकार में मंत्री थी और भतीजा जिला पंचायत का अध्यक्ष है।
अर्जुन सिंह की रियासत चुरहट -यूं तो अर्जुन सिंह का नाम भारतीय राजनीति के इतिहास में जाना माना नाम है। लेकिन उनकी रियासत चुरहट का हाल कुछ बेहाल है। 6 साल तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे अर्जुन सिंह केंद्र में मंत्री भी रह चुके हैं और पंजाब के राज्यपाल का पद भी संभाला था। एक समय ऐसा भी था जब उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी माना जा रहा था। फिलहाल अर्जुन सिंह की सियासत को उनके बेटे अजय सिंह चला रहे हैं। जो शिवराज सिंह की सरकार में नेता प्रतिपक्ष हुआ करते थे। हालांकि 2018 का विधानसभा और 2019 का लोकसभा चुनाव अजय सिंह ने गंवा दिया था। फिर भी उनकी पकड़ प्रदेश के लोगों में काफी है।
ये थी प्रदेश की वो बड़ी रियासतें जिनका राजनीति में बोलबाला है। हालांकि इनके अलावा भी कई सारे राजघराने हैं जो राजनीति में एक्टिव है। जैसे रीवा राजघराने के पुष्पराज सिंह, नागौद राजघराने के नागेंद्र सिंह, छतरपुर राजघराने के कुंवर विक्रम सिंह उर्फ नाती राजा, हरसूद राजघराने के विजय शाह इन तमाम राजघरानों ने प्रदेश की सियासत में अहम योगदान निभाया है और महत्वपूर्ण पदों पर भी बने रहे।

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