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सियाचिन में सैनिकों को नहीं मिल रहे कपड़े और खाने के सामान…

नई दिल्ली 4 फरवरी 2020 । देश की सुरक्षा के लिए सियाचिन, लद्दाख, डोकलाम जैसे ऊंचे क्षेत्रों में सरहदों पर तैनात सैनिकों को जरूरत के मुताबिक कैलरी नहीं मिल पाई। साथ ही उन्हें वहां के मौसम से निपटने के लिए जिस तरह के खास कपड़ों की जरूरत होती है उसकी खरीदी में भी काफी देरी हुई। पुराने स्पेसिफिकेशन के कपड़े और उपकरण मिलने से सैनिक को बेहतर कपड़े और उपकरण नहीं मिल पाया। संसद में सोमवार को पेश की गई सीएजी रिपोर्ट में इस मामले का खुलासा हुआ है। सीएजी की यह रिपोर्ट 2017-18 के दौरान की है, जिसे संसद में पेश किया गया।

क्या है रिपोर्ट में ?

सीएजी रिपोर्ट में कहा गया है कि हाई एलटीट्यूट एरिया में सैनिकों के लिए राशन का स्पेशल स्केल उनकी डेली एनर्जी जरूरत को ध्यान में रखकर तय किया जाता है। हालांकि बेसिक आइटम के बदले में सब्स्टिट्यूट को सीमित प्रतिशत और ‘लागत के आधार’ पर भी ऑथराइज्ड किया गया। बेसिक आइटम की जगह पर महंगे विकल्पों को समान कीमत पर सेंग्शन करने की वजह से सैन्य दलों द्वारा ली जाने वाली कैलरी की मात्रा कम हुई।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सेना की ईस्टर्न कमांड ने तो ओपन टेंडर सिस्टम के जरिए कॉन्ट्रैक्ट दिया लेकिन नॉर्दन कमांड में लिमिटेड टेंडरिंग के जरिए खरीद की गई जिससे निष्पक्ष कॉम्पिटिशन बाधित हुआ। सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक हाई एल्टीट्यूट एरिया में तैनात सैनिकों को वहां की जरूरतों के हिसाब के कपड़े खरीदने के लिए मंत्रालय ने 2007 में एक एंपावर्ड कमिटी बनाई ताकि क्लोदिंग आइटम की खरीद में तेजी आ सके। बावजूद इसके खरीदी में चार साल तक की देरी हुई। रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि रक्षा मंत्रालय के तहत आने वाली ऑर्डिनेशन फैक्ट्री से लिए जाने वाले सामान को मिलने में भी देरी हुई। खरीदने की प्रक्रिया में हुई देरी और कॉन्ट्रैक्ट के बाद भी सामान मिलने में हुई देरी से वहां तैनात सैनिकों को जरूरी कपड़े और उपरकण की भारी कमी झेलनी पड़ी।

सैनिकों का स्वास्थ्य प्रभावित

CAG की रिपोर्ट में बताया गया है कि फेस मास्क, जैकेट और स्लीपिंग बैग भी पुराने स्पेसिफिकेशन के खरीद लिए गए जिससे सैनिक बेहतर प्रॉडक्ट का इस्तेमाल करने से वंचित रहे। खरीद प्रक्रियाओं में देरी की वजह से सैनिकों का हेल्थ और हाइजीन भी प्रभावित हुआ। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि डिफेंस लैब में रिसर्च और डिवेलपमेंट की कमी और स्वदेशीकरण में विफलता की वजह से सामान आयात करने पर ही निर्भरता रही।

सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक हाई एल्टीट्यूट में रहने वाले सैनिकों के आवास की स्थिति को सुधारने के लिए प्रॉजेक्ट को अडॉक तरीके से लागू किया गया। सक्षम अथॉरिटी की इजाजत नहीं ली गई और पायलट प्रॉजेक्ट को फेस वाइज सेंग्शन दिया गया। जिसकी वजह से 274 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी पायलट प्रॉजेक्ट सफल नहीं रहा।

बिना आकलन के प्लान बना कारण

रिपोर्ट के मुताबिक जरूरतों का सही आकलन किए बगैर सालाना प्लान बनाए जा रहे हैं और काम सेंग्शन किया जा रहा है। काम पूरा होने में तय समय सीमा से बहुत ज्यादा देरी हो रही है। फिजिकल कंप्लीशन के बाद भी असेस्ट को यूनिट को सौंपने में एक साल से भी ज्यादा का वक्त लगा। जिसकी वजह से सैनिक को अत्यधिक चुनौतीपूर्ण वाले क्लाइमेट कंडीशन में सुविधाओं से वंचित रहना पड़ा।

जम्‍मू-कश्‍मीर में पाकिस्‍तानी आतंकियों के पास चीन का ‘बेजोड़’ कारतूस

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हमला करने वाले आदिल डार के रिश्ते के भाई समीर डार के एक खुलासे ने सुरक्षा बलों की टेंशन बढ़ा दी है। समीर डार ने खुलासा किया है कि जैश-ए-मोहम्‍मद के आतंकवादियों के पास सामान्य स्‍टील से बने ऐसे कारतूस मौजूद हैं जिनसे बख्तरबंद गाड़ियों को भी आसानी से भेदा जा सकता है। खास बात यह है कि दुनियाभर में बैन इन कारतूसों को हमारा चिर प्रतिद्वंद्वी देश चीन बनाता है और वहीं से इसे आतंकियों को सप्‍लाइ होती है। उधर, इस खुलासे के बाद कश्‍मीर में अब तक आतंकियों की गोलीबारी से बचने के लिए बख्‍तरबंद गाड़‍ियों और बंकरों का इस्‍तेमाल करने वाले सुरक्षा बलों की चिंता बढ़ गई है। समीर डार ने दिसंबर 2019 में भी जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों को कश्‍मीर घाटी में पहुंचाया था। समीर ने बताया कि आतंकवादियों के पास सामान्य बख्तरबंद गाड़ियों को भेदने में सक्षम स्टील के कारतूस सहित भारी मात्रा में गोला-बारूद थे। समीर पुलवामा जिले के काकपोरा इलाके का रहने वाला है। उसे पुलिस ने शुक्रवार को तब पकड़ा था, जब वह जैश आतंकियों द्वारा सुरक्षाबलों पर गोलीबारी के बाद नगरोटा से भाग रहा था।

क्‍या है स्‍टील बुलेट और क्‍यों है अजेय
पिछले साल जून महीने में जम्‍मू-कश्‍मीर के अनंतनाग जिले में सुरक्षा बलों पर आतंकवादियों ने फिदायिन हमला किया। इस हमले में सीआरपीएफ के 5 जवान शहीद हो गए। सूत्रों के मुताबिक इन जवानों ने बुलेटप्रूफ जैकेट पहन रखा था, इसके बाद भी ये गोलियां जवानों को छलनी करती हुई निकल गईं। सुरक्षाबलों की जांच में खुलासा हुआ कि आतंकवादियों ने स्‍टील से बनी बुलेट का इस्‍तेमाल किया जिसके सामने सुरक्षाबलों के बुलेटप्रूफ जैकेट बेदम साबित हुए।

सूत्रों के मुताबिक पाकिस्‍तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्‍मद के आतंकियों को ये बुलेट मुहैया करा रही है। इन स्‍टील बुलेट को चीन बनाता है और वहीं से इसकी सप्‍लाइ आईएसआई को होती है। ये स्‍टील बुलेट इतनी खतरनाक होती हैं कि किसी भी बख्‍तरबंद वाहन और बंकर को भी भेद सकती हैं। अब जैश-ए-मोहम्‍मद इन स्‍टील बुलेट का इस्‍तेमाल सुरक्षा बलों पर हमले के लिए कर रहा है। जैश के आतंकियों ने 27 दिसंबर 2017 को पहली बार स्‍टील की बुलेट का इस्‍तेमाल किया था।

इस्‍तेमाल में बेहद आसान हैं स्‍टील के कारतूस
स्‍टील बुलेट इस्‍तेमाल में बेहद आसान होती हैं। इसे सामान्‍य एके-47 असॉल्‍ट राइफल से दागा जा सकता है। एक बार में मैगजीन में दो से तीन गोलियों को रखा जा सकता है। सुरक्षा बलों का मानना है कि जैश-ए-मोहम्‍मद के आतंकवादी नूर मोहम्‍मद तांत्रे उर्फ पीर बाबा ने पहली बार आतंकवादियों को यह कारतूस दिया था। जांच में पता चला है कि ये बुलेट हार्ड स्‍टील या टंगस्‍टन से बनाया जाता है। इसे कवच को भेदने वाली बुलेट कहा जाता है। आमतौर पर एके-47 की बुलेट में आगे के हिस्‍से में हल्‍के स्‍टील का इस्‍तेमाल किया जाता है जो बुलेट प्रूफ शील्‍ड को भेद नहीं पाता है लेकिन स्‍टील बुलेट इसे भेदने में सक्षम है।

सुरक्षा बलों की बढ़ी टेंशन, वीआईपी सुरक्षा में खतरा
आतंकियों के पास से स्‍टील बुलेट आने से सुरक्षा बलों की टेंशन काफी बढ़ गई है। वीआईपी सुरक्षा का जिम्‍मा संभाल रही एजेंसियों को स्‍टील बुलेट को देखते हुए अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना पड़ रहा है। खासकर तब जब ये गोलियां बुलेट प्रूफ वाहनों को भी भेदने में सक्षम हैं। इन गोलियों पर पूरी दुनिया में प्रतिबंध है लेकिन चीन इसे धड़ल्‍ले से बना रहा है और अब ये गोलियां कश्‍मीर में आतंकवादी कर रहे हैं।

कश्‍मीर में स्‍टील बुलेट के आने पर एक सुरक्षा अधिकारी ने कहा कि स्‍टील की गोलियों के इस्‍तेमाल का खुलासा होने के बाद हमने सतर्कता बढ़ा दी है। इस तरह की गोलियों को चीन की तकनीक की मदद से हार्डकोर स्‍टील से बनाया जा रहा है। उन्‍होंने कहा कि कश्‍मीर में जिन बुलेट प्रूफ जैकेटों का इस्‍तेमाल सुरक्षा बल करते हैं, वे स्‍टील बुलेट का सामना करने में अक्षम हैं।

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