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तो कांग्रेस के भय में नए जुमले गढ़ने के लिए 25 दिसबंर को हो जाएगी लोकसभा चुनाव की घोषणा !

नई दिल्ली 22 दिसंबर 2018 । क्या पांच राज्यों में भाजपा की अभूतपूर्व हार से मोदी-शाह कंपनी अंदर तक हिल गई है और भाजपा में मोदी के लिए कोई चुनौती न बनने पाए और तेजी से उभरती कांग्रेस से निपटने के लिए 25 दिसंबर को चुनाव की घोषणा हो सकती है?

जी हाँ ऐसा हो सकता है क्योंकि एक तो इससे छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश की सरकारों को कां करने के लिए 10 दिन से भी कम समय मिलेगा और जिस तरह तीनों सरकारों ने किसानों का कर्ज माफ करने के ताबड़तोड़ फैसले लिए हैं उससे भाजपा में बेचैनी है और पार्टी के अंदर ही मोदी को हटाकर गडकरी या किसी और को नेतृत्व देने की मांग उठने लगी है। इससे बचने के लिए 25 दिसंबर को चुनाव की घोषणा हो सकती है?

चर्चित एंकर पुण्य प्रसून बाजपेयी “स्वयंसेवक की बेबाक चाय” के नाम से अपने ब्लॉग पर एक श्रंखला लिख रहे हैं। एक स्वयंसेवक के बहाने वह लगातार भाजपा की अंदरूनी राजनीति को ऊपरी फलक पर ला रहे हैं। इस बार उन्होंने स्वयंसेवक के बहाने मोदी-शाह का कांग्रेस से लड़ने का ब्रह्मास्त्र खोज लिया है जिसके मुताबिक 25 दिसंबर को चुनाव की घोषणा हो सकती है।

हम यहाँ पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लॉग से उनके लेख का संपादित अंश साभार पकाशित कर रहे हैं।

पुण्य प्रसून बाजपेयी

स्वयंसेवक की बेबाक चाय : चुनाव का एलान 25 दिसबंर को हो जाए या मोदी अयोध्या चले जाए जाए तो ……..

इस बार तो चाय कहीं ज्यादा ही गर्म है।

क्यों चाय तो हर बार गर्म ही रहती है।

न-न गर्म चाय का मतलब चाय का मिजाज नहीं पिलाने वाले की गर्माहट है।

क्यों ऐसे क्या कह दिया हमने।

आप जिस तरह पानी पर लकीरें खींच रहे हैं …. मुझे लगता नहीं है कि ये लकीरे टिकेगी।

आपको इसलिए नहीं लगता क्योंकि आप भीतर नहीं है बल्कि बाहर से देख रहे हैं।

ऐसा क्या देख लिया आपने ….

मेरे और स्वयंसेवक महोदय की गोल-मोल बातों पर प्रोफेसर साहेब सीधे बोल पड़े… आप जो देख रहे हैं वह कहाँ तक सही होगा, कह नहीं सकता लेकिन 15 बरस की सत्ता जिस अंदाज में बीजेपी ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ में गंवायी है उसने झटके में शिवराज और रमन सिंह की काबिलियत को मोदी-शाह से बेहतर करार दे दिया है।

दरअसल चाय पर जिस तरह स्वयंसेवक महोदय ने पहली बार 2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर अलग-अलग कयास का जिक्र किया, वह वाकई चौंकाने वाला था। क्योंकि स्वयंसेवक के कयास में हार को जीत में बदलने के लिए मोदी-शाह की ऐसी ऐसी बिसात थी जो इस बात का एहसास करा रही थी कि पांच राज्यों में चुनावी हार ने सत्ता को अंदर से हिला दिया है …और अब जीत के लिए कोई भी रास्ता पकडने की दिशा में चिंतन मनन हो रहा है। और जैसे ही मंगलवार की शाम चाय पर बैठे, वैसे ही स्वयंसेवक महोदय ने ये कहकर हालात गंभीर कर दिए कि मान लीजिये अटलबिहारी वाजपेयी की जन्मतिथि के दिन यानी 25 दिंसबर को ही आम चुनाव का एलान हो जाए तब आप क्या कहेंगें।

जाहिर है इस वक्तव्य ने चौंकाया भी और चौंकाने से ज्यादा इस सोच का कोई मतलब भी नहीं लगा। लेकिन स्वयंसेवक महोदय एक के बाद एक कर तर्क गढ़ने लगे।

देखिए कांग्रेस ने किसानों की कर्ज माफी का जो दावं फेका है उसका जवाब मोदी सत्ता कैसे दे सकती है। सरकार का खजाना तो खाली है। और अगर किसानों को राहत देने के लिए तीन लाख करोड़ रुपये लुटा भी देती है तो भी मैसेज तो यही जाएगा कि कांग्रेस ने किया तो मोदी सत्ता को भी करना पड़ा।

तो क्या सिर्फ इसी डर से जल्द चुनाव कराने का एलान हो जाएगा।

मेरे ये कहते ही स्वयंसेवक महोदय बोल पड़े। आप सवाल ना करें तो हालात को समझें। बात सिर्फ कर्ज माफी की नहीं है। चुनाव में जीत के लिए वह कौन सा पर्सेप्शन है जो बीजेपी के पारंपरिक वोटरों के जहन में रेंग सकता है और वह मोदी की सत्ता के जीत के लिए कमर कस लें।

राम मंदिर है ना।

देखिए आप बीच में ना टोकें। इस बार प्रोफेसर साहेब को स्वयंसेवक महोदय ने टोका। और फिर बोल पड़े ..राम मंदिर ही है, लेकिन पहले ये हालात समझें…सरकार को अंतरिम बजट देश के सामने रखना है। उससे पहले आर्थिक समीक्षा आएगी। जो विकास दर के संकेत देगी। या कहें देश की माली हालत को बतायेगी। जाहिर है जो हालात पांच राज्यों के चुनाव में उभरे। खासकर ग्रामीण वोटरों के वोट बीजेपी को सिर्फ 35 फीसदी ही मिले और कांग्रेस को 55 फीसदी वोट मिले। फिर शहरी वोटरों में भी कांग्रेस से बीजेपी पिछड गई। तो इसके मतलब समझें।

एक तरफ बजट में बताने-दिखाने के लिए कुछ भी नहीं है तो दूसरी तरफ जिस लिबरल इकोनॉमी को मोदी सत्ता अपनाये हुए है, वह राजनीतिक तौर पर फेल हो चली है। और राहुल गांधी की राजनीति ने अब आर्थिक खेल में भी मोदी को फंसा दिया है।

यानी…

यानी जो खेल बीचे चार बरस से अलग-अलग रियायत या सुविधा के नाम पर मोदी सत्ता खेल रही थी, पांचवे बरस या कहें चुनावी बरस में उसी खेल को अपनी बिसात पर खेलने के लिए कांग्रेस ने मोदी को मजबूर कर दिया है। लेकिन फिर सवाल वही है कि 2013-14 में मोदी कुछ भी कहने के लिए खुले आसमान में उड़ रहे थे, क्योंकि वह सत्ता में नहीं थे। तो अब राहुल गांधी उसी भूमिका में हैं और मोदी सत्ता में हैं तो वह जवाबदेही के लिए बाध्य हैं।

पर मोदी किसी भी जवाबदेही को अपने मत्थे कहाँ लेते हैं। वह तो कांग्रेस को ही निशाने पर लेकर अतीत के हालात को ज्यादा जोर-शोर से उठाते हैं।

ठीक कह रहे हैं प्रोपेसर साहेब….लेकिन पांच राज्यों के चुनाव परिणाम ने बता दिया आपका काम ही मायने रखता है। और तेलंगना इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। जहाँ ना राहुल – चन्द्रबाबू की दाल गली, ना ही हिन्दुत्व की बाँसुरी बजाते योगी आदित्यनाथ की। फिर तुरंत चुनाव मैदान में कूदने के हालात विपक्ष को एकजुट होने भी नहीं देंगे, खासकर यूपी में गठबंधन बनेगा नहीं।

जल्दी चुनाव बेहद घातक साबित हो सकता है महोदय। अब प्रोफेसर बोले, तो तथ्यों को गिनाने के लिहाज से बोले। और तल्खी भरे अंदाज में कहा बंगाल में ममता कांग्रेस के साथ नहीं आए तो मुस्लिम वोट बैंक क्या सोचेगा। यूपी में अखिलेश-मायावती कांग्रेस के साथ ना आए तो दलित-मुस्लिम वोट बैक क्या सोचेगा। अजित सिंह अगर कांग्रेस के साथ ना आए तो जाट वोट बैंक क्या राजस्थान में कांग्रेस के साथ जाकर यूपी में कांग्रेस के विरोध में खडा हो पाएगा। यानी खाप भी बंटेगी क्या। नवीन पटनायक को उडीसा में बीजेपी से ही दो दो हाथ करने हैं तो रणनीति के तौर पर वह कांग्रेस का विरोध कैसे करेंगें। चन्द्रशेखर राव की भूमिका ममता के साथ खड़े होकर कांग्रेस विरोध की कैसी होगी। 2019 के लिए बिछती बिसात में गठबंधन की जरुरत क्षत्रपों को है या फिर कांग्रेस को। और जनादेश का मिजाज ही जब बीजेपी विरोध का ये हो चला है कि 15-15 बरस पुरानी बीजेपी सत्ता हवा हवाई हो रही है तो फिर क्षत्रपों की सत्ता कैसे टिकेगी, अगर ये मैसेज जनता के बीच जाता है कि कांग्रेस का विरोध बीजेपी को लाभ पहुंचा सकता है। तो क्या जिन हालातो में मोदी सत्ता चली उसने अपने आप को एक ऐसी धुरी बना लिया जहां तमाम विपक्ष तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद मोदी सत्ता के खिलाफ एकजुट होगा ही। और मोदी सत्ता बीजेपी या संघ परिवार के तमाम अंतरविरोध के बीच भी अपनी 4 बरस से खिंच रही लीक छोड़ेगी नहीं तो चुनाव भी जल्द कैसे होंगें।

…आपको तो ये बताना चाहिए कि अब मोदी-शाह के पास कौन सा ब्रह्मास्त्र है, जिसका प्रयोग 2019 के चुनाव से एन पहले होगा।

हा हा हाल हा ….ठहाके लगाते हुए स्वयंसेवक बोले … जब जनता को सपना बेच सकते हैं तो खुद के लिए भी सपना बुन सकते हैं। और सपने की ही कडी में 25 दिसबंर के चुनाव में जाने का एलान हो सकता है।

और ना हुआ तो ….

प्रोफेसर जैसे ही बोले वैसे ही स्वयंसेवक महोदय भी बोल पड़े …तब तो किसी दिन प्रधानमंत्री मोदी ही अयोध्या में राम मंदिर की ईंट को उठाते-जोड़ते नजर आ जाएंगें …. तब आप क्या सोचियेगा।

क्या कह रहे हैं आप। प्रधानमंत्री तो सबका साथ सबका विकास का नारा लगाते हुए चल रहे हैं। और पीएम बनने के बाद अयोध्या गए भी नहीं है। मेरा सवाल खत्म होता उससे पहले ही स्वयंसेवक महोदय बोल पड़े …

तो हो सकता है प्रधानमंत्री मोदी एलान कर दें राम मंदिर बनेगा। और खुद ही कार सेवक के तौर पर नजर आ जाएं..तब क्या होगा।

होगा क्या …हंगामा मच जाएगा….

और क्या चाहिए ….. संघ परिवार मोदी के पीछे एकजुट खडा हो जाएगा। वोटो का नहीं बल्कि समाज का ही ध्रुवीकरण हो जाएगा। झटके में किसान-मजदूर, बेरोजगारी या आर्थिक बदहाली के सवाल हाशिये पर चले जाएंगें।

बात हजम हो नहीं पा रही है मान्यवर …. अब मुझे टोकना पड़ा। 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वस के बाद क्या हुआ था। 1996 में सत्ता मिली तो 13 दिन में ही गिर गई। बीजेपी तब अनटचेबेल हो गई थी। और 1996 में बतौर प्रधानमंत्री वाजपेयी ने कहा भी था कि बीजेपी कोई अछूत नहीं है जो उसके साथ कोई खडा नहीं है। लेकिन फिर याद कीजिये 1998-99 में तमाम राजनीतिक दल साथ तभी आए जब राम मंदिर, धारा 370 और कामन सिविल कोड को ठंडे बस्ते में डालने का निर्णय बीजेपी ने लिया।

जो कहना है कह लीजिये …लेकिन इस सच को तो समझें क्षत्रपो की फौज सत्ता चाहती है। और सत्ता किसी की भी रहे। कौन सी भी मुद्दे रहे। क्या फर्क पड़ता है। कश्मीर में महबूबा बीजेपी के साथ सत्ता के लिए ही आईं। पासवान ने अतीत में बीजेपी को क्या कुछ नहीं कहा है। लेकिन आज वह बीजेपी के साथ सत्ता में हैं ना। नीतिश कुमार ने ही बीजेपी छोड़िये मोदी को लेकर क्या क्या नहीं कहा लेकिन आज वह मोदी के मुरीद बने हुए हैं क्योंकि सत्ता में रहना है। तो अब हालात बदल चुके हैं। सत्ता होगी तो सभी साथ होंगें। और सत्ता नहीं तो फिर कोई साथ ना होगा। अभी तो कुशवाहा ने छोड़ा है इंतजार कीजिये असम से खबर जल्द ही आएगी …मंहत ने भी बीजेपी का साथ छोड दिया।

देखिए आप जो कह रहे हैं, वह असंभव सा है। जिसे कोई मानेगा नहीं लेकिन आपकी बातों से ये तो महसूस हो रहा है कि मोदी-शाह की सत्ता पर खतरा मंडरा रहा है और वह कोई तुरप का पत्ता खोज रहे हैं जिससे सत्ता बची रह जाए।

मेरे ये कहते ही प्रोफेसर साहेब बीच में कूद पड़े….जी ठीक कह रहे हैं आप आज ही तो नागपुर से खबर आई कि कोई किसान नेता किशोर तिवारी है उन्होने बकायदा सरसंघचालक मोहन भागवत और भैयाजी जोशी को खत लिखकर कहा है कि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार नितिन गडकरी को बनाएं।

तो आप क्या कहना है कि बीजेपी या संघ के भीतर भी आवाज उठ रही है।

क्या वाकई ऐसा हो रहा है ..मुझे स्वयंसेवक महोदय से पूछना पड़ा।

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