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एमपी में जीत के सर्वे भी बीजेपी नेताओं के चेहरों पर नहीं ला पा रहे मुस्कान

नई दिल्ली 10 अक्टूबर 2018 । मध्यप्रदेश में 28 नवंबर को विधानसभा चुनाव के लिए मतदान है और इसके लिए राजनीतिक दलों ने अपनी बिसात बिछानी शुरु कर दी है। मध्यप्रदेश में बीजेपी पिछले 15 साल से सत्ता में है और इस बार उसके सामने वापसी को लेकर कड़ी चुनौती है। हाल में दो मीडिया संस्थानों द्वारा कराए गए सर्वे में एक में बीजेपी की हार तो एक में उसकी जीत होना बताया गया है। जीत की संभावा से बीजेपी को खुश होना चाहिए लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। पार्टी को लग रहा है कि इस वक्त जमीनी हकिकत कुछ और है। प्रदेश में उसका संगठनात्मक ढांचा बिगड़ चुका है और इसका असर उसके चुनाव प्रबंधन पर दिखने लगा है। इससे पहले पार्टी हमेशा ये दावा करती रही है कि मध्यप्रदेश में उसकी संगठनात्मक संरचना सबसे बेहतर रही है।

संगठनात्मक ढांचा हुआ ध्वस्त

सूत्रों का कहना है कि कभी सबसे बेहतर संगठन के लिए जाना जाने वाला राज्य मध्यप्रदेश इस वक्त संगठन को लेकर बुरी स्थिति से गुजर रहा है। इस वक्त मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और संगठन के नेताओं के बीच समन्वय की भारी कमी है और ये पार्टी के लिए चुनाव में संकट पैदा कर सकता है।

नहीं है कोई आपसी समन्वय
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का यहां तक कहना है कि समन्वय की बात तो दूर इस वक्त सरकार और संगठन के बीच किसी भी मामले को लेकर कोई आपसी समझ तक नहीं हैं। पार्टी की ओर से निर्णय लेने के लिए कोई नहीं है। पार्टी में ये गिरावट महीनों में नहीं बल्कि कई सालों से हो रही है। सरकार और संगठन के बीच समन्वय की कमी पिछले दो-तीन साल पहले शुरू हुई और अब जब चुनाव सिर पर हैं तो ये अपने चरम पर है। पार्टी ने इसमें सुधार के लिए कोई कदम नहीं उठाया। इसके विपरीत राजस्थान में जहां संगठन और सरकार के बीच कोई समन्वय नहीं था वहां मामले को बेहतर तरीके से संभला गया है।

फिसल रहा है वक्त
पार्टी के अंदरूनी सूत्र कह रहे हैं कि मध्यप्रदेश में संगठन की संरचना इस वक्त लगभग ध्वस्त हो गई है और इसका असर चुनाव प्रबंधन और इससे जुड़े कामों पर दिख रहा है। ये तक कहा जा रहा है कि समन्वय की कमी के कारण पार्टी के कई कार्यकर्ता घर पर बैठे हैं और यही कारण है की बीजेपी की रैलियों में भीड़ नहीं आ रही है। राज्य में संगठन इस वक्त बड़े बदलाव से गुजर रहा है। इस संबंध में जानकारी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को भी भेजी गई है लेकिन राज्य में पार्टी के हाथ से वक्त बड़ी तेजी से फिसल रहा है।

लोग चाहते हैं बदलाव
अंदरखाने राज्य में बीजेपी नेतृत्व चिंतित हैं क्योंकि उसे लग रहा है कि कम से कम मध्य प्रदेश में कांग्रेस की तरफ लोग झुक रहे हैं और बीजेपी की सत्ता में वापसी संभव नहीं है। यदि उसे वापसी करनी है तो उसे गुजरात विधानसभा चुनाव की तरह कोई करिश्मा करना होगा। कहा जा रहा है कि भले ही राज्य में कांग्रेस नेतृत्व में मतभेद हो और एकजुटता की भी कमी हो लेकिन लोग इस बार भाजपा को हटाकर कांग्रेस को मौका देना चाहते हैं

मालवा-निमाड़ के 42 सीटों पर चुनौतियों भरा सफर

इंदौर के ८ व उज्जैन संभाग में देवास जिलों की ८० प्रतिशत सीटें बीजेपी के पास

आरक्षण, किसान, औद्योगिक विकास, पिछड़ापन, चिकित्सा -शिक्षा रहेंगे प्रमुख मुद्दे

आदिवासी अंचल के धार-झाबुआ-अलीराजपुर-बड़वानी जिलों में जयस से मिलेगी चुनौती

सपाक्स आंदोलन भी करेगा प्रभावित

इंदौर.

प्रदेश की सत्ता में अपनी ८० प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ दबदबा रखने वाले मालवा-निमाड़ अंचल में इन दिनों चुनावों को ले कर हलचल तेज है। शनिवार को मतदान तिथी की घोषणा के बाद से उम्मीदवार पॉलिटिकल अलर्ट पर आ गए है। प्रदेश में इंदौर-उज्जैन संभाग के १५ जिलों की ६५ सीटें इस हिस्से में आती है। इसमें इंदौर संभाग की ३७ सीटें शामिल है। मालवा-निमाड़ अंचल के ९ जिलों की स्थिति देखें तो इंदौर को छोड़ कर अधिकांश हिस्सा आरक्षित वर्ग मंे है। इसमंे भी अनुसूचित जनजाति का बड़ा हिस्सा आता है। इंदौर संभाग के ८ व देवास जिलें की ४२ सीटों में से २५ सीटें इन दोनों वर्गों के लिए आरक्षित है। इसमें अजजा वर्ग की २१ सीटें व ४ अजा वर्ग की है। बीजेपी-कांग्रेस की जीत को देंखें तो

– ५३ दिन मिलेंगे हर उम्मीदवार को अपने मतदाता तक पहुंचनें के लिए

– वर्तमान में ४२ में से ३४ सीटें बीजेपी के पास और ८ सीटें कांग्रेस के पास
– ४२ सीटों में १७ सामान्य वर्ग व २५ सीटें अजजा व अजा वर्ग की

सबसे ज्यादा मतों से जीत – इंदौर क्षेत्र क्रमांक दो में बीजेपी उम्मीदवार रमेश मैंदोला ९१०१७ मतों से

सबसे कम अंतर की जीत – धार जिले में सरदारपुर सीट पर बीजेपी उम्मीदवार वेलसिंह भूरिया ५२९ मतों से

कांग्रेस के कब्जें की सीट – राउ, भीकनगांव, भगवानपुरा, कुक्षी, गंधवानी, कसरावद, राजपुर, बड़वानी।

बीजेपी के कब्जें की सीट – इंदौर क्षेत्र क्रमांक १ से ५, महू, देपालपुर, सांवेर, खंडवा, मांधाता, पंधाना, हरसूद, नेपानगर, बुरहानपुर, बड़वाह, महेश्वर, खरगौन, सेंधवा, मनावर, धरमपुरी, धार, बदनावर, सरदारपुर, पेटलावद, झाबुआ, थांदला, अलीराजपुर, जोबट, पानसेमल, बागली, हाटपिलल्या, खातेगांव, देवास और सोनकच्छ।

१० हजार से अधिक अंतर से जीत – २८
१० से ५ हजार अंतर से जीत – ७

५ हजार से कम अंतर की जीेत -७

खतरे में है शिवराज की संबल योजना! चुनाव आयोग ने मांगी रिपोर्ट

मध्य प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी संबल योजना में रुकावट आ सकती है. चुनाव आयोग ने संबल योजना को लेकर जांच रिपोर्ट तलब की है. दरअसल संबल योजना के तहत बांटे जा रहे स्मार्ट कार्ड्स पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तस्वीर की शिकायत चुनाव आयोग से की गई थी.

मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी वीएल कांताराव के मुताबिक संबल योजना को लेकर की गई इस शिकायत का परीक्षण किया जा रहा है और मामले में एक जांच रिपोर्ट शासन से तलब की गई है. रिपोर्ट आने के बाद उसे भारत निर्वाचन आयोग भेज दिया जाएगा. (इसे पढ़ें- ना ये खुश हैं ना वो संतुष्ट, नये समीकरण बना सकती है इनकी मुलाक़ात)

बता दें कि इससे पहले भी संबल योजना पर सवाल उठते रहे हैं. संबल योजना के कार्ड पर शिवराज की तस्वीर लगने के बाद कांग्रेस ने इसे लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर निशाना साधा था. वहीं अब इसे राज्य चुनाव आयोग ने इसे संज्ञान में लिया है और इस पर रिपोर्ट मांगी है.

संबल योजना मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सबसे महत्वाकांक्षी योजना मानी जाती है. इस योजना का नाम मुख्यमंत्री जन कल्याण (संबल) योजना रखा गया. योजना की शुरुआत में बताया गया था कि इसके तहत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को 200 रुपये महीने चुकाकर बिजली इस्तेमाल करने की सुविधा मिलेगी.

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