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पहले संपादक अख़बार की पहिचान होते थे अब मालिक चेहरा बने

नई दिल्ली 22 मई 2020 । कोरोना के कारण यूँ तो सभी उद्योग व्यवसाय ठप्प पड़ गये लेकिन पहली बार ऐसा हो रहा है कि समाचार पत्रों का व्यवसाय भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है | वरना कर्फ्यू के समय तक में अख़बारों का वितरण निर्बाध रूप से चलता रहता था | प्रशासन को भी किसी उपद्रव के समय ये डर होता है कि यदि अख़बार जनता तक नहीं पहुंचे तो अफवाहें पहुंचेंगीं और इसीलिए वह खुद ये सुनिश्चित करता रहा कि समाचार पत्र लोगों तक पहुंचें | दूसरी तरफ आम जनता भी चाहती है कि किसी भी विषम परिस्थिति में अख़बार उसे मिले जिससे उसे वास्तविक स्थिति का पता चल सके | लेकिन आजाद भारत के इतिहास में ये सम्भवतः पहला ऐसा अवसर होगा जब अख़बारों के वितरण को लेकर जबर्दस्त रुकावटें आने से वे पाठकों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं | उल्लेखनीय बात तो ये हुई कि उसको बाँटने वाले हॉकर्स जो कि गर्मी , सर्दी , बरसात , दंगा – फसाद , कर्फ्यू जैसे किसी भी हालात में अपने काम के प्रति समर्पित रहते थे , वे भी कोरोना संकट के समय कुछ ढीले पड़ गये | बड़े शहरों में तो अखबार वितरण में भारी परेशानियाँ उठ खडी हुईं |

सबसे पहले तो अख़बार से कोरोना संक्रमण का खतरा होने की बात प्रचारित होने से खरीददार बिदक गये | जैसे – तैसे वह भ्रम दूर हुआ तो हॉट स्पॉट और कनटेनमेंट जोन के भीतर वितरण की समस्या आ गई | विभिन्न आवासीय सोसायटियों में तो किसी को भी भीतर जाने की अनुमति नहीं होने से हॉकर भी लौट आया | सार्वजनिक परिवहन पूरी तरह रोक दिये जाने से उनमें अख़बार बेचने वाले लाखों बेकार हो गये | दफ्तर , दुकानें , होटल , चाय- पान की गुमटियां सब बंद पड़े हैं | ऐसे में अखबार और जनता का प्रत्यक्ष नाता पहली बार टूटता दिखा |

हालांकि तकनीक ने काफी हद तक ये कमी दूर की और ई संस्करण तथा एप के जरिये अख़बार पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास तेज हो गया | वैसे तो ये पहले भी चल रहा था किन्तु छपा हुआ अख़बार पढ़ने के अभ्यस्त पाठकों , विशेष रूप से जो डिजिटल तकनीक में पारंगत नहीं हैं , के लिए इस परिवर्तन से खुद को समायोजित करना सम्भव नहीं हो पा रहा |

वाकई ये एक अभूतपूर्व स्थिति है | आर्थिक मंदी के कारण निजी कम्पनियों के साथ ही सरकारी विज्ञापनों में उल्लेखनीय कमी आ चुकी थी | ऊपर से टीवी , इन्टरनेट , यू ट्यूब और ऐसे ही दूसरे प्रचार माध्यम विज्ञापन के क्षेत्र में अखबारों का बड़ा हिस्सा बांटने में सफल होने लगे | इसकी वजह से भी समाचार पत्रों के समक्ष आर्थिक संकट गहराता गया | विशेष रूप से लघु और मध्यम अखबारों की तो कमर ही टूटने लगी | केंद्र के साथ ही राज्य सरकारों की नीतियाँ भी संकट को बढ़ाने का कारण बनीं | एक समय था जब हर घर में साप्ताहिक , पाक्षिक , मासिक पत्रिकाएँ , आया करती थी. | इसी तरह कुछ साप्ताहिक पत्रों का तो देश भर के पाठक इंतजार करते थे | लेकिन वे सब भी प्रतिस्पर्धा में फंसकर मैदान से बाहर हो गए। |

और अब बात बढ़ते – बढ़ते यहाँ तक आ गयी कि खुद अख़बार जगत में आपसी चर्चा के दौरान पूछा जाने लगा कि क्या उसका भविष्य अंधकारमय है ? कोरोना के कारण उत्पन्न हालातों में तो ये सवाल और भी प्रासंगिक हो उठा है | यद्यपि प्रिंट मीडिया के नाम से विख्यात समाचार पत्रों की गरिमा और विश्वसनीयता उस समय से ही ढलान पर आने लगी जब संपादक नामक संस्था का अवमूल्यन करते हुए मालिक खुद उसके काम में दखल देने लगे | ये कहना गलत नहीं होगा कि पहले किसी अखबार की पहिचान और प्रतिष्ठा उसके संपादक के नाम से होती थी लेकिन अब मालिक सम्पादक को पीछे धकेलकर खुद अखबार का चेहरा बन बैठे | अनेक ने तो बाकायदा खुद को संपादक बना लिया | इसका दुष्परिणाम ये हुआ कि समाचार पत्रों का मूल उद्देश्य ही लुप्त होता चला गया और व्यावसायिकता उस पर पूरे तौर पर हावी होती गई |

एक बड़ा बदलाव 24 घंटे सक्रिय रहने वाले टीवी न्यूज चैनलों के कारण भी आया | लेकिन उनकी खास बात ये है कि फिल्म की तरह उनका प्रोड्यूसर नुमा मालिक तो नजर आता नहीं किन्तु उनके एंकर का चेहरा उनकी पहिचान होता है | इन एंकरों का क्या – क्या उपयोग होता है ये किसी से छिपा नहीं है | बड़े – बड़े घोटालों में उनकी लिप्तता उजागर होने से पत्रकारिता की अवधारणा ही बदल गयी |

यही वजह है कि जब बिकाऊ मीडिया जैसे आरोप खुलकर उछलते हैं तब पत्रकार बिरादरी में उसका खंडन करने का साहस नहीं होता | और इसी कारण से आज पत्रकारिता और उसके सभी अंग विश्वसनीयता के अभूतपूर्व संकट से गुजर रहे हैं | मिशन से पेशा बनी पत्रकारिता जबसे उद्योग बनी तबसे उसका चरित्र ही बदल गया | ये कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि लोकमान्य तिलक , महात्मा गांधी और माखनलाल चतुर्वेदी जैसे लोग वर्तमान में अखबार निकालने की हिम्मत नहीं कर पाते | ये कहना भी गलत नहीं होगा कि टीवी चैनलों के अलावा भी संचार के अन्य माध्यमों ने समाचार पत्रों के कार्यक्षेत्र में अतिक्रमण किया है | लेकिन ये भी उतना ही सही है कि पत्रकारिता भी अपने उद्देश्य से भटकी है | गुरु – शिष्य परंपरा से परे अब उसका विधिवत प्रशिक्षण भी मिलने लगा है परंतु इस वजह से पत्रकारिता में व्यावसायिकता भी बढ़ चली है और वह एक कैरियर बनती जा रही है |

वैसे नई पीढ़ी में उत्साह भी है और वह चुनौती स्वीकार करने से भी नहीं डरती किन्तु प्रतिस्पर्धा अब गुणात्मक न होकर चूँकि आर्थिक संदर्भों पर आकर केन्द्रित होने लगी है इसलिए पत्रकार को अपना धर्म निभाने में धर्मसंकट से गुजरना पड़ता है | मालिक की खुशी या नाराजगी पर ही उसका भविष्य टिका होता है | ये भी कह सकते हैं कि उसकी पहिचान उसकी प्रतिभा से ज्यादा उस ब्रांड पर अवलम्बित है जिसका वह चाहे – अनचाहे हिस्सा बनकर रह जाता है |

टीवी चैनलों में ग्लैमर बिखेरते बड़े – बड़े चर्चित एंकर नामक पत्रकार वहां से हटने के बाद किस तरह चमक खो बैठते हैं इसका उदाहरण कुछ साल पहले जबलपुर के शास. इंजीनियरिंग महाविद्यालय में देखने मिला | वहां के एक आयोजन का आमन्त्रण प्राचार्य ने मुझे भी दिया | मैं समय से कुछ पहले पहुंचकर प्राचार्य कक्ष की तरफ जा रहा था तभी मेरी नजर एक व्यक्ति पर पड़ी तो मैं चौंका | वे देश के एक बड़े चैनल के चर्चित और प्रतिष्ठित सम्पादक थे जिन्हें किसी घोटाले में नाम आने के बाद हटा दिया गया | प्राचार्य कक्ष के सामने वरांडे में अकेले उन्हें खड़ा देख मुझे अटपटा लगा | पास जाकर अभिवादन के साथ उनके वहां खड़े होने का कारण जानने पर ज्ञात हुआ कि प्राचार्य सभागार में उस आयोजन का इंतजाम देखने गये हुए थे जिसमें वे पत्रकार महोदय भी अतिथि वक्ता थे | सर्दियां थीं इसलिए धूप में आकर खड़े हो गये | मैने एक भृत्य को बुलाकर वरांडे में कुर्सियां लगवाकर बैठने की व्यवस्था की और उनसे चर्चा की तो वे बताने लगे कि पहले वे मुख्यमंत्री के हेलीकाप्टर से जबलपुर आ चुके थे | शायद वे अपने वर्तमान को छुपाने के लिए पुराने दिनों का उल्लेख कर रहे थे | उस समय भी वे चैनल में रहते तो राज्य सरकार के अतिथि बनते किन्तु हटने पर अकेले खड़े रहने मजबूर हो गए।

उस दिन मुझे लगा कि जब कोई पत्रकार अपनी प्रतिभा को बंधुआ बना लेता है तब मुक्त होने के बाद भी उसकी नैसर्गिकता वापिस नहीं आती | उक्त पत्रकार महोदय कभी – कभी किसी साधारण चैनल पर दिख जाते हैं लेकिन उनके नाम का जो डंका बजता था वह गुजरे जमाने की बात होकर रह गई |

ऐसे में कोरोना के बाद का समाचार जगत भी काफी बदला हुआ होगा | जिसमें बहुत से नाम अतीत बनने के लिए मजबूर हो जायेंगे | जिस तकनीक को अपनाकर अख़बारों ने खुद को आधुनिक साबित करने का प्रयोग किया , वही उनके लिए घातक होने जा रही है | हालांकि दौर बदलने के साथ पुराना पीछे छूटता ही है परन्तु समाचार पत्रों के भविष्य पर संकट के बादल इतनी जल्दी घने हो जायेंगे , ये नहीं सोचा गया था | ऐसे में उन हजारों पत्रकारों के सामने भी रोजी – रोटी का संकट आने वाला है जो आज प्रवासी मजदूरों की बेरोजगारी और बदहाली से पूरी दुनिया को अवगत करवा रहे हैं | और उनके दर्द को कौन उजागर करेगा ये बड़ा सवाल है |

डिजिटल के इस दौर में टीवी और समाचार पत्र तो बहुरंगी हो गए लेकिन संवेदनाएं बेरंग होकर रह गईं हैं | एक राष्ट्रीय पार्टी की सर्वोच्च नेत्री ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर दो साल के लिए सरकारी विज्ञापन रोककर पैसा बचाने का जो सुझाव दिया वह निश्चित रूप से सरकार को रास आया होगा | लेकिन उन्होंने नेताओं के सरकारी खर्च पर विदेशों में इलाज पर रोक की मांग नहीं की |

समाचार जगत को ये बात समझ लेनी चाहिए कि उसकी गर्दन दबाने में सत्ता और विपक्ष दोनों एक मत हैं | ऐसे में उसे अपना अस्तित्व बचाने के लिए चिंता और चिंतन दोनों शुरू कर देना चाहिए |

वरना उसकी स्थिति तमाशा बन गये खुद ही तमाशा देखने वाले जैसी हो जायेगी |

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