मुख्य पृष्ठ >> अमीर गरीब के बीच की खाई का बढ़ती जा रही है देश के 1% अमीरों के पास देश के 70% लोगों की संम्पत्ति की 4 गुना संम्पति

अमीर गरीब के बीच की खाई का बढ़ती जा रही है देश के 1% अमीरों के पास देश के 70% लोगों की संम्पत्ति की 4 गुना संम्पति

नई दिल्ली 23 जनवरी 2020 । हमारे देश का अमीर कितना आगे बढ़ रहा है इसका एक परिणाम देखिए । सरकार किसी भी दल की हो ये अमीर और अमीर होते जा रहे है गरीब बेचारा दर दर की ठोकरे खा रहा है । गरीब और ज्यादा गरीब होता जा रहा है और अमीर तेजी से अमीर हो रहा है. यह आर्थिक विषमता अब चिन्ताजनक स्थिति तक बढ़ गयी है और गणतंत्र का स्थान अमीरतंत्र ने ले लिया है. अशिक्षा, बेरोजगारी और बढ़ती मंहगाई ने गरीब की कमर तोड़ दी है। दुनिया से गरीबी खत्म करने के लिए काम करने वाली संस्था ऑक्सफेम की
जारी रिपोर्ट ‘टाइम टू केयर’ में ये आंकड़े सामने आए हैं।
देश के 63 अरबपतियों की संपत्ति देश के एक साल के बजट से भी अधिक है। 2018-19 में देश का बजट 24 लाख 42 हजार 200 करोड़ रुपए था । फिर भी गरीबो को ही दबाया जाता है अमीरों को अभी भी हर सरकार आंखों पर बैठाती है । किसान को ही देख लीजिए उसकी प्याज की फसल आती है तो सिर्फ 5 रु. किलो का भाव रहता है किसान की लागत तक नही निकलती उसी फसल को अमीर लोग स्टॉक कर लेते है जिसे सामान्य भाषा मे कालाबाजारी कहाँ जाता है फिर जब प्याज की कीमत 100 रु किलो होती है तो यह व्यापारी खूब धन कमाते है मेहनत करें किसान धन कमाए व्यापारी ओर यही व्यापारी फिर ब्याज का धंधा करके भी किसान मजदूर का खून चूसता है 10% पर पैसा चलाकर उसे बेइज्जत करके वसूल भी करता है । परेशान किसान आत्महत्या करता है और सरकार कहती फिरती है आय दोगुना करेंगे ?
देश के हजारों किसानों की जमीनें कर्जे पाटने में बिक चुकी हैं. हजारों किसानी छोड़कर दूसरे शहरों में दिहाड़ी मजदूर बन चुके हैं. महानगरों में जाड़ा, गर्मी, बरसात रिक्शा खींच रहे हैं, अमीरों की गाड़ियां साफ कर रहे हैं या सड़क किनारे बने ढाबों में बरतन मांज रहे हैं, ताकि घर पर कुछ पैसा भेज सकें । ठंड में सड़क किनारे सोने को मोहताज लोगो कें लिए किसी सरकार के पास काम करने का कोई प्लान नही है । केवल दिखावा करो और वोट पाओ की राजनीति चरम पर है । शहरों में सुबह के वक्त जगह-जगह चौराहों पर जमा गरीबों की भीड़ को देखिए, जो सामने से गुजरने वाली हर मोटरगाड़ी को इस लालसा से ताकते हैं कि अभी यह उनके पास रुकेगी और ढाई सौ रुपये दिहाड़ी पर दिन भर के काम के वास्ते उन्हें ले जाएगी. इस भीड़ को हर दिन काम भी नहीं मिलता, कुछ ही खुशनसीब होते हैं जो दिहाड़ी पर ले जाए जाते हैं, बाकि दिन भर काम की बाट जोहते शाम को खाली हाथ ही लौटते हैं । गरीबों की कीमत पर बढ़ती अमीरी-गरीबी निवारण के मार्ग में बहुत बड़ी बाधा बन गई है। आधुनिक आर्थिक अवधारणा विषमता को बढ़ने से रोकने में सफल नहीं हो पाई है। गरीबी नियंत्रण के लिए सरकार को कुछ त्वरित कदम उठाने होंगे जैसे ग्रामीण अर्थव्यस्था की मजबूती के लिए,पशुपालन और कृषि में तकनीकी सुधार के साथ सुविधाएं और प्रोत्साहन देना होगा। स्वरोजगार के अवसरों में वृद्धि की जानी चाहिए। गांवो को स्वरोजगार केंद्र के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है। अधिक से अधिक महिलाओं को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध करवाने होंगे।

गरीब की थाली से गायब होता सकुन -:
आज देश की आधी सम्पत्ति देश के नौ अमीरों की तिजोरियों में बंद है और दूसरी ओर गरीब की थाली में मुट्ठी भर चावल भी बमुश्किल दिखायी देता है. गरीबी हटाओ का नारा तो आजादी के समय से ही लोग सुनते रहे है लेकिन गरीबी हटाने के नाम की माला जपने वाले गरीबी के नाम पर राजनीति ही करते रहे है। यह दुर्भाग्य ही है आज हम न्यू इंडिया और स्मार्ट सिटी के सपने तो देख रहे है लेकिन आधी आबादी को गरीबी के दाग से नहीं बचा पा रहे है। विकास की वर्तमान प्रक्रिया के कारण एक तबके के पास हर तरह की विलासिता के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध है और दूसरी तरफ गरीब लोगों की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पा रही है। भौतिकवादी प्रवृति के कारण अमीरों और गरीबों के बीच उपलब्ध संसाधनों का जो अंतर लगातार बढ़ रहा है उसमे एकरूपता लाने के लिए प्रयास नाकाफी है।

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