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उप राष्ट्रपति ने की मामलों के जल्द निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट को 4 क्षेत्रीय खंडपीठ में बांटने की पैरवी

नई दिल्ली 29 सितम्बर 2019 । उप राष्ट्रपति एम.वेंकैया नायडु ने न्याय मिलने में अनवरत देरी पर गंभीर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट को बांट देने की वकालत की है। उन्होंने सुझाव दिया कि समय रहते सुधार और कम खर्च में न्याय के लिए देश में सुप्रीम कोर्ट की चार क्षेत्रीय खंडपीठ स्थापित की जानी चाहिए। एक पुस्तक विमोचन के दौरान शुक्रवार को उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडु ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक मामले और अपील अलग-अलग देखी जाएं। साथ ही सर्वोच्च अदालत में मामलों के जल्द निपटारे के लिए क्षेत्र के आधार पर चार बेंच बनाई जाएं।उन्होंने कहा कि इस कदम को उठाने के लिए संविधान में संशोधन की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। उन्होंने इस सुधारवादी कदम के लिए संविधान के अनुच्छेद 130 का पालन किए जाने की सलाह दी।

उप राष्ट्रपति ने कहा कि इस अनुच्छेद के अनुसार राष्ट्रपति की मंजूरी से समय-समय पर होने वाली नियुक्तियों के जरिए सुप्रीम कोर्ट दिल्ली या किसी अन्य स्थान या स्थानों पर भी बैठ सकता है। उन्होंने प्रख्यात न्यायविद् दिवंगत पीपी राव के लेखों पर आधारित एक पुस्तक का विमोचन करने के दौरान सुप्रीम कोर्ट पर यह बड़ी टिप्पणी की। उनके इस वक्तव्य के दौरान कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस आरएफ नरिमन, अटर्नी जनरल केके वेणुगोपाल और जस्टिस एआर दवे समेत कई पूर्व जज मौजूद थे। संविधान पीठ और अपीलों की सुनवाई के आधार पर सुप्रीम कोर्ट को बांटने की विधि आयोग की सिफारिश का समर्थन करते हुए उन्होंने सर्वोच्च अदालत को चार रीजनल बेंच के आधार पर बांटे जाने की भी पैरवी की।

उन्होंने कहा कि देरी के बजाय समय से न्याय देने के लिए न्यायिक प्रक्रिया के कुछ मानक निर्धारित किए जाने चाहिए। सुनवाई स्थगित होने की सीमा तय की जाए और मामले की प्रकृति को देखते हुए उसके निस्तारण की अवधि भी निर्धारित हो। उन्होंने न्याय पालिकाओं में बड़ी तादात में लंबित मामलों के निस्तारण के लिए सरकार से इस मामले में और सक्रिय होने की अपील की। उप राष्ट्रपति ने योग्य जजों और बेहतरीन वकीलों को कानूनी शिक्षा में सुधार के लिए नियुक्त करने की सिफारिश की। साथ ही कहा कि चुनाव संबंधित मामलों और नेताओं के खिलाफ आपराधिक मामलों की सुनवाई हाईकोर्टो के विशेष बेंच में हो और उस पर फैसला छह महीने के अंदर हो जाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ कई दफा दिल्ली के बाहर अदालत स्थापित करने की याचिकाओं को ठुकरा चुकी है। सर्वोच्च अदालत ने अगस्त 2009 में विधि आयोग की सुप्रीम कोर्ट को दिल्ली की संवैधानिक पीठ और अपीलों के आधार पर दिल्ली (उत्तर), चेन्नई/हैदराबाद (दक्षिण), कोलकाता (पूर्व) और मुंबई (पश्चिम) चार हिस्से करने की सिफारिश को पूरी तरह से खारिज कर दिया था।

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