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पुलिस कमिश्नर सिस्टम का मध्य प्रदेश में इंतजार खत्म हुआ, भोपाल-इंदौर को ADG-IG बनेंगे पुलिस कमिश्नर

भोपाल 10 दिसंबर 2021 । देश के अधिकांश बड़े राज्यों में लागू पुलिस कमिश्नर सिस्टम का मध्य प्रदेश में इंतजार समाप्त हो गया है। आज से भोपाल-इंदौर में पुलिस कमिश्नर सिस्टम को लागू कर दिया गया है। पुलिस कमिश्नर ADG या IG स्तर के अधिकारी होंगे। 40 सालों के इतंजार के बाद पुलिस अधिकारियों को पुलिस कमिश्नर सिस्टम मिल सका है। इस बारे में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 21 नवंबर को नए सिस्टम को लागू करने का ऐलान किया था और मात्र 18 दिनों के भीतर इस फैसले पर अमल कर दिया गया है। गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने गुरुवार को पुलिस मुख्यालय में पत्रकारों से चर्चा करते हुए इस नई व्यवस्था को लागू करने की घोषणा की। गुरुवार को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पुलिस कमिश्नर सिस्टम की अधिसूचना पर हरी झंडी दी थी। पुलिस कमिश्नर सिस्टम में अब डीआईजी पुलिस कप्तान नहीं रहेगा बल्कि ADG या IG स्तर के अधिकारी होंगे। मिश्रा ने बताया है कि भोपाल और इंदौर के बाद जल्द ही मध्य प्रदेश के अन्य बड़े शहरों में भी पुलिस कमिश्नर सिस्टम व्यवस्था को लागू किया जाएगा।

नई व्यवस्था में कितने अधिकारी होंगे तैनात
मिश्रा ने पत्रकारों से चर्चा में बताया कि भोपाल में जहां 38 शहरी पुलिस थानों को पुलिस कमिश्नर के अधीन किया गया है तो इंदौर में 36 शहरी थाने पुलिस कमिश्नर के अधीन रहेंगे। दोनों जिलों के ग्रामीण थानों को पुलिस कमिश्नर से अलग रखा गया है और वहां पुलिस अधीक्षक स्तर के आईपीएस अधिकारी की पृथक से तैनाती रहेगी। भोपाल और इंदौर में पुलिस कमिश्नर के नीचे दो-दो DIG स्तर के अधिकारी होंगे जो अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर होंगे और आठ-आठ SP स्तर के आईपीएस अधिकारी होंगे जो डिप्टी पुलिस कमिश्नर कहलाएंगे। इनके बाद भोपाल में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक स्तर के 10 तो इंदौर 13 एएसपी स्तर के अधिकारी असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर होंगे और उप पुलिस अधीक्षक स्तर के 20 अधिकारी भोपाल व इंदौर में 30 अधिकारी होंगे। नए सिस्टम में नौ अधिनियम के अधिकार मिलेंगे
भोपाल और इंदौर में लागू हुए पुलिस कमिश्नर सिस्टम में पुलिस को नौ अधिनियमों के अधिकार मिलेंगे। जिनमें प्रतिबंधात्मक कार्रवाई में 107-116 सहित रासुका, धारा 144 व 133 के अधिकार भी मिलेंगे। साथ ही मोटरयान अधिनियम, पुलिस एक्ट, राज्य सुरक्षा अधिनियम, प्रिजनर एक्ट, अऩैतिक, शासकीय गोपनीय अधिनियम जैसे कानून के अधिकार मिलेंगे।

पुलिस कमिश्नर प्रणाली का ऐसा रहा इंतजार
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अपने चौथे कार्यकाल में यह करना संभव हो पाया है। उनके पहले कार्यकाल में 2008 में पहली बार ऐसी उम्मीद जागी थी। तब उप समिति की रिपोर्ट में हरी झंडी मिलने के बाद भी निर्णय लेने के लिए केंद्र सरकार को अनुशंसा भेज दी थी। तब मंत्रिमंडलीय उप समिति में जयंत मलैया, हिम्मत कोठारी, नरोत्तम मिश्रा और नागेंद्र सिंह थे और मलैया की अध्यक्षता में बनी उपसमिति ने चुनावी साल में रिपोर्ट सौंपी थी। शिवराज ने 2012 में विधानसभा में भी किया था ऐलान
शिवराज सिंह चौहान ने अपने दूसरे कार्यकाल में भी फरवनरी 2012 में विधानसभा सत्र में पुलिस आयुक्त प्रणाली को लागू करने का ऐलान किया था। मगर तब भी मामला उससे आगे नहीं बढ़ा और घोषणा तक ही रह गया। उनके तीसरे कार्यकाल में भौंरी पुलिस अकादमी में भी शिवराज सिंह चौहान ने अपने संबोधन में इस पर विचार की बात कहकर पुलिस को उम्मीद जगाई थी। तब वहां गृह विभाग के आईएएस अधिकारी भी मौजूद थे और आईएएस लॉबी ने इस विचार को पंचर कर दिया था।

त्रिखा कमेटी से लेकर आईपीएस ने कई बार बनाए प्रस्ताव
पुलिस सुधार के नाम पर त्रिखा कमेटी बनाई गई थी तो पीएचक्यू में एक वरिष्ठ अधिकारी को ही पुलिस सुधार शाखा में बैठा दिया गया। पुलिस आयुक्त प्रणाली के विचार आते ही पुलिस के कुछ अधिकारियों को प्रस्ताव बनाए जाने का काम भी समय समय पर सौंपा गया था। रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी संजय राणा से लेकर मौजूदा एडीजी संजीव शमी तक ने पुलिस आयुक्त प्रणाली वाले शहरों का अध्ययन कर उनके बेहतर बिंदुओं के आधार पर प्रस्ताव बनाए लेकिन उनका हश्र रद्दी की कोठरी में ही हुआ। दिग्विजय ने भी केंद्र को भेजा था प्रस्ताव
दिग्विजय सिंह के दस साल के मुख्यमंत्रित्वकाल में भी पुलिस कमिश्नर सिस्टम के प्रस्ताव दो बार आए और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते उनका हश्र अच्छा नहीं रहा। एक बार उनके कार्यकाल में केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा जो वहां काफी समय तक लंबित रहा और आखिरकार निरस्त कर लौटा दिया था। सुभाषचंद्र त्रिपाठी के डीजी रहते उन्होंने पुलिस सुधार के लिए तब राजेंद्र चतुर्वेदी को काम सौंपा था जिसमें पांच लाख आबादी वाले शहरों में इस सिस्टम को लागू करने की रिपोर्ट दी थी। मगर उस रिपोर्ट पर आगे कोई कार्रवाई नहीं हुई। कमोबेश कमलनाथ सरकार के समय भी पुलिस आयुक्त प्रणाली की भ्रूण हत्या हो चुकी है। उस समय स्वतंत्रता दिवस में मुख्यमंत्री के संबोधन में इसका ऐलान होने की चर्चा थी लेकिन सीएम के भाषण में वह शामिल ही नहीं किया गया।

2009 में एसएसपी सिस्टम अपनाया
पुलिस आयुक्त प्रणाली की केंद्र सरकार के पाले में गेंद फेंके जाने के बाद शिवराज सरकार ने 2009 में एसएसपी (वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक) सिस्टम को अपनाया। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर में एसएसपी बैठाए गए लेकिन इस सिस्टम का कोई विशेष अंतर दिखाई नहीं दिया है। आज भी पुलिस को कार्यपालिक दंडाधिकारी और परिवहन विभाग सहित कुछ अन्य अधिकारों नहीं होने जिनसे अपराधियों और सड़क दुर्घटनाओं के बाद भी ड्राइविंग लायसेंस पर उचित कार्रवाई नहीं हो पा रही है।

क्या है पुलिस आयुक्त प्रणाली
पुलिस आयुक्त प्रणाली में पुलिस को वो अधिकार मिल जाते हैं जो आमतौर से जिले के कलेक्टर व उनके अधीनस्थों के पास होते हैं। इसमें पुलिस महानिदेशक से लेकर पुलिस अधीक्षक स्तर तक के आईपीएस अधिकारी कमिश्नर (सीपी) बनाए जाते हैं। इनके अधीन संयुक्त आयुक्त (जेसीपी), उपायुक्त (डीसीपी), सहायक आयुक्त (एसीपी) व अन्य अधिकारी होते हैं। पुलिस कमिश्नर सिस्टम में कार्यपालिक दंडाधिकारी के अधिकार मिल जाते हैं। इनमें अपराधियों के खिलाफ प्रतिबंधात्मक कार्रवाई 107-116 से लेकर जिलाबदर, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की कार्रवाई तक करने, धरना-प्रदर्शन व भीड़ जुटाने वाली गतिविधियों की अनुमति देने, शस्त्र लायसेंस देने अधिकार भी शामिल हैं। भीड़ के उग्र होने पर लाठीचार्ज और गोली चलाने का भी फैसला पुलिस आयुक्त या उसके अधीनस्थ अधिकारी ले सकता है।

किन-किन राज्यों में पुलिस कमिश्नर सिस्टम
जानकारी के मुताबिक देशभर में दिल्ली, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, पंजाब, केरल, असम, हरियाणा, नागालैंड, ओडिसा के 77 शहरों में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू है। इनमें डीजी से लेकर एसपी स्तर तक के अधिकारियों को पुलिस कमिश्नर के पद पर पदस्थ किया जाता है। दिल्ली, मुंबई और बंगलुरू में डीजी स्तर के पुलिस कमिश्नर प्रणाली है जबकि चेन्नई और कोलकाता में सबसे पुरानी पुलिस आयुक्त प्रणाली होने के बाद भी यहां अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक पुलिस कमिश्नर बनाए जाते रहे हैं।

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