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12 साल में एक बार आता है वृंदावन का वैष्णवी कुंभ

वृंदावन 1 मार्च 2021 । प्रत्येक 12 साल में एक बार बसंत पंचमी से वृंदावन में वैष्णवी कुंभ (माघ मेला) का आयोजन होता है। इसमें विशेषकर वैष्णव के तीनों अखाड़ों के साधु-संत शामिल होते हैं। इस वैष्णव कुंभ में शैव (नागा साधु-सन्यासी) की भागीदारी नहीं रहती हैं। इस बार भी बसंत पंचमी से वृंदावन में वैष्णवी कुंभ आरंभ हो चुका है। यमुना तट पर साधु-संतों और श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगा है। वैष्णव अखाड़ों में अणि निर्वाणी, अणि दिगंबर, अणि निर्मोही अखाड़ों के साधु-संत शिरकत रख चुके हैं। निर्वाणी अखाड़ा के श्री महंत धर्मदास जी, दिगंबर अखाड़ा के श्री महंत कृष्ण दास जी, निर्मोही अखाड़े के श्री महंत राजेंद्र दास जी महाराज वृंदावन कुंभ के शिविरों से संबंधित व्यवस्थाओं में जुटे हुए हैं।

तीन शाही स्नान

वृंदावन में कुंभ नगर का निर्माण हो चुका है। 56 हेक्टेयर परिक्षेत्र में वैष्णवी कुंभ मेला लग रहा है। अखाड़ों से जुड़े सैंकड़ों साधु-संतों के डेरे और कैंप लग चुके हैं। प्रथम शाही स्नान 27 फरवरी 2021को हो चुका हैं। दूसरा शाही स्नान 9 मार्च 2021, तीसरा शाही स्नान 13 मार्च 2021 को होगा। वैष्णवी कुंभ का समापन 28 मार्च को होगा। कुंभ मेला 40 दिनों का रहेगा। शाही स्नान यमुना तट पर परंपरागत तरीके से होगा। यहां पर शाही स्नान घाट है। इस समय मेले में धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम मची है।

संतों की साधनाएं

यमुना तट पर साधु-संतों की कठोर तप-तपस्या और साधनाओं का दौर चल रहा है। तपस्वी कंडों को जलाकर मीरामार हैं तो कई अन्य कठिन धूनी रमा रहे हैं। साधु संतों के साथ ही श्रद्धालुजन यमुना में डुबकी लगाकर पुण्य लाभ अर्जित कर रहे हैं। इनमें विदेशी साधु-संत और श्रद्धालु भी पीछे नहीं है। वे कृष्ण की लीला में लीन दिखाई दे रहे है।

अन्य आकर्षण के केंद्र

वृंदावन में श्री बांके बिहारी का प्रमुख मंदिर है। यहां हजारों श्रद्धालु दर्शनों का लाभ ले रहे हैं। मथुरा में एक और द्वारकाधीश मंदिर है तो वृंदावन में इस्कॉन मंदिर, कृपालु महाराज का प्रेम मंदिर आदि भी है। प्रेम मंदिर परिसर को अद्भुत तरीके से सजाया संवारा गया है।यह श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना है।

वैष्णवी कुंभ क्यों लगता है

वैष्णवी कुंभ के बारे में कोई स्पष्ट प्रमाण तो नहीं मिलते हैं किंतु मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान गरुड़ भगवान अमृत कलश लेकर निकले थे। इस दौरान उन्होंने वृंदावन में कदम के पेड़ पर अमृत कलश रखकर विश्राम किया था। इसके बाद वे हरिद्वार, नासिक, प्रयागराज और उज्जैन गए थे। वहां-वहां कुंभ की परंपरा मानी जा रही है।

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