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1000 सीटों वाली लोकसभा बनी तो क्या होगा फ़ायदा

नई दिल्ली 22 दिसंबर 2019 । पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने हाल में ये सवाल उठाए हैं कि आख़िर कोई सासंद कितने लोगों की आबादी का प्रतिनिधित्व कर सकता है.

इंडिया फाउंडेशन द्वारा आयोजित द्वितीय अटल बिहारी वाजपेयी स्मृति व्याख्यान में उन्होंने कहा कि भारत में निर्वाचित प्रतिनिधियों को देखें, तो मतदाताओं की संख्या उसके अनुपात में बहुत ज़्यादा है.

उनका कहना था, “लोकसभा की क्षमता के बारे में आख़िरी बार 1977 में संशोधन किया गया था, जो 1971 में हुई जनगणना पर आधारित था और उस वक़्त देश की आबादी केवल 55 करोड़ थी. लेकिन इसे अब 40 साल से अधिक का वक़्त हो चुका है. उस वक़्त के मुक़ाबले अब आबादी दोगुने से ज़्यादा बढ़ गई है और इस कारण अब परिसीमन पर लगी रोक को हटाने के बारे में सोचा जाना चाहिए.”

उन्होंने कहा, “आदर्श रूप से संसद में लोकसभा और राज्यसभा सदस्यों की संख्या पर लगी रोक को ख़त्म किया जाना चाहिए. लेकिन जब भी लोकसभा की सीटें बढ़ा कर 1000 करने और इसी के अनुपात से राज्यसभा की सीटें बढ़ाने की बात होती है तो ऐसा न करने के पक्ष में व्यवस्थागत समस्याओं की दलील दी जाती है.”

हालांकि उनके इस बयान में उनका निशाना इस बात पर था कि बहुमत किसे कहा जाए. उन्होंने सबको साथ लेकर चलने वाले नेता की बात की और कहा कि 1952 से लोगों ने अलग-अलग पार्टियों को मज़बूत जनादेश दिया है लेकिन कभी भी एक पार्टी को 50 फ़ीसदी से ज्यादा वोट नहीं दिए हैं.

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