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कौन है महाराष्‍ट्र की राजनीति का ‘चाणक्‍य’? बेदाग निकले शरद पवार

मुंबई 27 नवम्बर 2019 । महाराष्‍ट्र में बीजेपी-एनसीपी की सरकार बनने के बाद सबसे ज्‍यादा परेशान शरद पवार (Sharad Pawar) दिखे. कारण था नई सरकार के गठन में पर्दे के पीछे कहीं उनकी कोई योजना तो नहीं थी? कई कयास लगाए गए. एक खबर आई कि बीजेपी की ओर से शरद पवार (Sharad Pawar) को राष्‍ट्रपति पद का ऑफर किया गया है इसलिए महाराष्‍ट्र में खेल पलट सकता है. पीएम मोदी (PM Narendra Modi) ने राज्‍यसभा में एनसीपी और शरद पवार (Sharad Pawar) की तारीफ कर दी थी तो उसके बाद आई इस खबर पर लोगों को संदेह नहीं हुआ. राष्‍ट्रपति शासन लगने के बाद शरद पवार पीएम मोदी से मिलने गए और कहा कि वो किसानों की समस्‍याओं पर बात करने के लिए गए थे. इन सब घटनाओं के बाद 23 नवंबर की सुबह महाराष्‍ट्र की सियासी तस्‍वीर एकदम से बदल गई थी. लोगों का जो शक था वो यकीन जैसा होने लगा था.23 नवंबर की घटना के बाद शरद पवार के बयान की प्रतीक्षा सबको थी. दोपहर में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) के साथ शरद पवार ने प्रेस कॉन्‍फ्रेंस की. उन्‍होंने कहा कि हम एकजुट हैं और एकजुट रहेंगे. अजित पवार (Ajit Pawar) के विषय में कहा कि जो भी हुआ वो उनका निर्णय था. इसमें मेरी या एनसीपी की कोई सहमति नहीं थी. उन्‍होंने जो किया उसकी सजा उनको मिलेगी. शिवसेना (Shiv Sena) प्रमुख ने भी शरद पवार की बातों पर भरोसा दिखाया. इस दौरान शरद पवार ने उन विधायकों को भी प्रेस के सामने किया जो सुबह राजभवन में दिखे थे. उन्‍होंने कहा कि अजित के साथ 10 या 11 विधायक होंगे जो वापस आ जाएंगे. उनको गलत जानकारी देकर राजभवन बुलाया गया था. इस बात पर भी जोर दिया कि एनसीपी के सभी विधायक हमारे साथ हैं. शरद पवार ने अगले दिन एनसीपी विधायकों की बैठक बुलाई. उस बैठक में चार विधायकों को छोड़ कर सभी आए. अब यह साफ हो गया था कि अजित पवार के साथ कोई नहीं है. अजित पवार ने सभी विधायकों के हस्ताक्षर वाले उस पत्र का दुरूपयोग किया था जो कि कांग्रेस-एनसीपी-शिवसेना की सरकार गठन के लिए तैयार किए गए थे. अगले दिन शाम में कांग्रेस-एनसीपी-शिवसेना के 162 विधायक होटल में जमा हुए और एकता का प्रदर्शन किया. सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई हुई और अगले दिन फैसला आ गया. इस दौरान अजित पवार को मनाने की कोशिश जारी रही. शरद पवार ने भी अजित से बात की. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अजित पवार ने अपने पद से इस्‍तीफा दे दिया और इस तरह यह साफ हो गया कि महाराष्‍ट्र में बीजेपी की सरकार फ्लोर टेस्‍ट से पहले ही गिर गई है. देवेंद्र फडणवीस को अपने पद से इस्‍तीफा देना पड़ा. बीजेपी-एनसीपी की सरकार बनने और सरकार गिरने के बीच शरद पवार अपनी बात पर कायम रहे और महाराष्‍ट्र के पूरे सियासी समीकरण को अपने अनुसार तैयार कर लिया. महाराष्‍ट्र की राजनीति में शरद पवार ने अपनी बात को भी सही साबित किया कि एनसीपी गठबंधन के साथ एकजुट है. बीजेपी सरकार 72 घंटे में धाराशायी हो गई और अजित पवार वापस एनसीपी में आ गए.

भाजपा के हाथ से फिसलते बड़े राज्य

निश्चित तौर पर मोटा भाई यानि अपने अमित शाह के लिए यह सिरदर्द और चुनौती दोनों हैं। पिछले दो साल में भाजपा के हाथ से छह बड़े राज्य फिसल गए हैं। बिहार और झारखंड में तनाव है। कर्नाटक के बाद महाराष्ट्र में जिस तरह भाजपा की फजीहत हुई है। वह भी भाजपा और संघ के लिए चिंतन और चिंता का विषय हो गया है।
दो साल पहले भाजपा का ग्राफ पूरे देश में जिस तरह ऊपर जा रहा था, वह अब ढलान की ओर दिखाई देने लगा है। इसकी शुरुआत मई 2017 में पंजाब से होती हुई नवंबर 2019 में महाराष्ट्र तक पहुंच गई है। कांग्रेस ने सबसे पहले भाजपा और शिरोमणि अकाली दल से पंजाब छीना। इसके बाद कांग्रेस का विजयी रथ मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ पहुंचा। भाजपा के दिग्गज मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे सिंधिया और रमन सिंह एक झटके में कुर्सी से उतर गए। इसके बाद जम्मू-कश्मीर में भाजपा ने मेहबूबा मुफ्ती से मुक्ति पाई। वहां भी भाजपा की सरकार नहीं रही। यह बाद दूसरी है कि अब गृहमंत्री के रूप में अमित शाह इस राज्य की सरकार को उपराज्यपाल के जरिए चला रहे हैं, लेकिन फिलहाल भाजपा का झंडा तो उतर ही चुका है।
भाजपा को सबसे बड़ा झटका महाराष्ट्र और हरियाणा से लगा है। इन चुनावों से पहले नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाकर पूरी दुनिया में वाह-वाही पाई थी, लेकिन इतने बड़े फैसले को महाराष्ट्र और हरियाणा की जनता ने ही कोई भाव नहीं दिया। हरियाणा के परिणाम में पहली पराजय भाजपा की तब हुई जब वह बहुमत से बहुत पिछले रह गई। पार्टी की दूसरी पराजय इसे माना जा रहा है कि जिस चौटाला परिवार को भाजपा भ्रष्टाचार की गंगौत्री बताती थी, मजबूरी में भाजपा उसी चौटाला परिवार के साथ सरकार बनाने के लिए विवश हुई। बेशक हरियाणा में भाजपा की साख बच गई, लेकिन पार्टी ने खुले तौर पर सिद्धांतों से समझौता तो किया।
महाराष्ट्र में शिवसेना पहले दिन से तेवर दिखाने लगी थी। मुंबई से 1800 किलोमीटर दूर बैठा भाजपा का नेतृत्व यह समझता रहा कि शिवसेना को झक मारकर उसके पास आना पड़ेगा, लेकिन कहावत है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त बन जाता है। महाराष्ट्र ऐसा ही हुआ। भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए एनसीपी और कांग्रेस ने अपने सारे सिद्धांतों को ताक पर रखकर शिवसेना शरणं गच्छामि कर दिया। तिलमिलाई भाजपा ने अपने सुझाव के अनुरूप पहले ईडी की धमकी दी फिर सीडी की बातें चलीं, लेकिन सोनिया और शरद पर इसका असर नहीं हुआ तो राजभवन का उपयोग किया गया। महाराष्ट्र में चोरी छिपे सरकार बनाने को लेकर आने वाले समय में भाजपा को जवाब तो देना होगा। लेकिन चोरी छिपे बनी यह सरकार कुछ घंटे भी नहीं चल पाई। सुप्रीम कोर्ट ने हंटर फटकारा तो देवेंद्र फडणवीस और अजीत पवार औंधे मुंह गिरे दिखाई दिए।
भाजपा का संकट महाराष्ट्र हाथ से निकलने के बाद खत्म होता दिखाई नहीं दे रहा। झारखंड में एनडीए तार-तार हो चुका है। सभी अपनी ढपली अपना राग बजा रहे हैं। बिहार भी आंखे दिखा रहा है। पश्चिम बंगाल से भाजपा को कुछ ज्यादा ही उम्मीद हैं। समय बताएगा कि उत्तर और पश्चिम के महत्वपूर्ण राज्य गंवाने वाली भाजपा पश्चिम बंगाल में पांव जमा पाती है कि नहीं?

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