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परिवार से क्यों दूरी बनाकर चल रहे हैं अखिलेश

नयी दिल्ली 27 जनवरी 2022 । समाजवादी पार्टी की स्थापना (अक्टूबर 1982) से लेकर जनवरी 2017 तक पार्टी मुलायम सिंह यादव की थी। उन्होंने इसे बनाया और अपने परिवार और पारिवारिक संबंधों को समाजवादी पार्टी का मूल बनाया। मुलायम सिंह यादव ने 2017 में विधानसभा चुनावों से पहले अखिलेश यादव के विद्रोह के सामने हार मान ली। इसके बाद समाजवादी पार्टी औपचारिक रूप से एक वंशवादी पार्टी बन गई। हालांकि, 2022 के उत्तर प्रदेश के चुनाव में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव अपनी आगामी सियासी सफर के लिए वंशवाद को खारिज करने की कोशिश कर रहे हैं। अखिलेश यादव जिस तरह से प्रचार कर रहे हैं और जिस तरह से वह परिवार को तस्वीर से दूर रख रहे हैं, यह उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के लिए अद्वितीय है। रिपोर्ट्स में कहा गया है कि अखिलेश यादव ने परिवार के नेताओं को स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टी का टिकट नहीं मिलेगा।

राजवंश को खारिज कर रहे अखिलेश
मुलायम सिंह यादव की पत्नी साधना गुप्ता के बहनोई प्रमोद गुप्ता ने पार्टी छोड़ दी। इसके बाद बहू अपर्णा यादव भी भाजपा में शामिल हो गईं। प्रमोद गुप्ता पूर्व विधायक हैं। अपर्णा यादव ने 2017 का विधानसभा चुनाव सपा के टिकट पर भाजपा की रीता बहुगुणा जोशी के खिलाफ चुनाव मैदन में थी। अपर्णा के जाने के बाद अखिलेश यादव ने कहा कि मुलायम सिंह यादव ने उन्हें मनाने की कोशिश की। भाजपा पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि सत्ताधारी पार्टी उन (रिश्तेदारों) को टिकट दे रही है जिन्हें वह उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में नहीं उतार पाए। लापता यादव वंश
अखिलेश यादव के चुनाव प्रचार में मुलायम सिंह यादव खराब स्वास्थ्य के चलते नदारद हैं। हालांकि, यादव परिवार का कोई अन्य सदस्य भी चुनाव प्रचार के दौरान नहीं दिखता है। अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव, चाचा राम गोपाल यादव और शिवपाल यादव, चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव और अक्षय यादव और उनके दिवंगत चाचा रतन सिंह यादव के पोते तेज प्रताप सिंह यादव जैसे नेता फिलहाल सीन से गायब हैं। वे पिछले चुनावों में चुनाव प्रचार के दौरान अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के साथ मंच साझा करते थे।

2017 में साथ-साथ दिखीं डिंपल
कन्नौज से पूर्व लोकसभा सांसद डिंपल यादव 2017 के चुनावी अभियान में अखिलेश यादव की लगातार साथी हुआ करती थीं। इसी चुनाव में अखिलेश यादव ने अपने पिता को समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष पद से हटा दिया था और शिवपाल यादव को पार्टी से इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया था। शिवपाल यादव ने अपनी खुद की पार्टी प्रगतिशील समाज पार्टी बनाई। 2017 के यूपी चुनावों और 2019 के लोकसभा चुनावों में विफलताओं के बाद शिवपाल यादव अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी में लौट आए हैं। अपनी वापसी की घोषणा के बाद से शिवपाल यादव भी लगातार नदारद हैं। मुलायम-शिवपाल के खिलाफ बगावत के दौरान 2017 में अखिलेश यादव के सबसे बड़े सपोर्ट सिस्टम रहे राम गोपाल यादव भी चुनाव प्रचार में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष के साथ मंच साझा करते नहीं दिख रहे हैं। धर्मेंद्र यादव, अक्षय यादव और तेज प्रताप सिंह यादव पूर्व लोकसभा सांसद हैं, लेकिन परिवार के नए नेता ने उत्तर प्रदेश में सत्ता में वापसी के लिए उन्हें शामिल नहीं करना पसंद किया है।

अखिलेश ने क्यों लिया ऐसा निर्णय?
समाजवादी पार्टी के आलोचक उनके खिलाफ वंशवाद का आरोप लगातार लगाते रहते हैं। इस आलोचना को खत्म करने का निर्णय अखिलेश यादव ने 2019 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी की हार के बाद लिया था। आपको बता दें कि इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन करने के बावजूद समाजवादी पार्टी केवल पांच सीटें जीत सकी थी। यादव परिवार के केवल दो उम्मीदवार मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव चुनाव जीते। अन्य तीन मुरादाबाद (एसटी हसन, 47 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता), रामपुर (आजम खान, 51 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता) और संभल (शफीकुर रहमान बरक, 76 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता) मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव जीते थे।

2019 के लोकसभा चुनाव की हार ने अखिलेश यादव को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया। उन्होंने अपने पिता मुलायम सिंह यादव को मौलाना मुलायम के टैग का मुकाबला करने के लिए खुद को एक हिंदू के रूप में पेश करने के लिए अलग-अलग प्रयास किए। समाजवादी पार्टी के अन्य लोकसभा सांसदों आजम खान, बरक और हसन के बयानों ने भी उन्हें उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले अपनी हिंदू पहचान अपनी आस्तीन पर पहनने के लिए मजबूर किया।

जाली दस्तावेज बनाने के आरोप में आजम खान जेल में हैं। वह पूर्व में चुनाव के दौरान अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के साथ मंच पर रहा करते थे। बराक अफगानिस्तान के तालिबान का समर्थन करते हुए सार्वजनिक हुए। हसन ने हाल ही में 2021 में स्वतंत्रता दिवस पर ध्वजारोहण समारोह के दौरान राष्ट्रगान के शब्दों को भूलकर और बाद में बाल विवाह का समर्थन कर पार्टी को शर्मिंदा होने के लिए मजबूर किया।

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