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…तो क्या कश्मीर से नहीं, जम्मू से बनेगा राज्य का मुख्यमंत्री?

नई दिल्ली 5 जून 2019 । आरएसएस और बीजेपी के लोग बहुत पहले से तर्क देते हैं कि कश्मीर घाटी से 3 सासंद और पूरे जम्मू और लद्दाख से 3 सांसद और इसके अलावा विधानसभा सीटों में भी घाटी का वर्चस्व पूरी तरह है. लेकिन अगर अमित शाह अपने एजेंडे पर आगे चले तो भविष्य में सूबे का मुख्यमंत्री जम्मू या लद्दाख क्षेत्र का हो सकता है.

परिसीमन के विरोध में उतरे सियासी दल

हालांकि, सुगबुगाहट मिलते ही नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी विरोध मे उतर चुकी है. लेकिन अमित शाह के इस एजेंडे पर आगे बढ़ने की पुख्ता वजहें भी हैं. साल 2014 में बीजेपी को जम्मू-कश्मीर में 34 फीसदी वोट मिले जो अब बढ़कर 2019 लोकसभा चुनाव में 46.4 फीसदी पहुंच गया. राज्य में कुल पड़े वोटों की संख्या करीब 35 लाख के आस-पास है और बीजेपी को अकले 17 लाख के आस-पास वोट मिले हैं. बीजेपी को जितने वोट मिले उतने कांग्रेस, पीडीपी , नेशनल कॉन्फ्रेंस को मिला कर नहीं मिले. नेशनल कॉन्फ्रेंस को तो कुल 07.89 फीसदी ही वोट मिले और उसके तीन सांसद जीते जबकि बीजेपी को 46 फीसदी से ज्यादा वोट मिले और उसे भी लोकसभा की तीन सीटें ही मिलीं.

क्या होता है परिसीमन?

परिसीमन का अर्थ किसी देश में या प्रांत में निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है. संविधान के अनुच्छेद 82 के मुताबिक सरकार 10 साल बाद परिसीमन आयोग का गठन कर सकती है. इसके तहत जनसंख्या के आधार पर विभिन्न विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों का निर्धारण होता है. इसकी वजह से राज्य में प्रतिनिधियों की संख्या नहीं बदलती, लेकिन जनसंख्या के हिसाब से अनुसूचित जातियों की संख्या बदल जाती है.

बता दें कि जम्मू-कश्मीर में इससे पहले 1995 में परिसीमन किया गया था. जब गवर्नर जगमोहन के आदेश पर जम्मू-कश्मीर में 87 सीटों का परिसीमन किया गया था. जम्मू-कश्मीर में विधानसभा की कुल 111 सीटें हैं, इनमें से 24 सीटें पाक अधिकृत कश्मीर के लिए खाली छोड़ी गई है. इस तरह से यहां 87 सीटों पर ही चुनाव होता है.

जम्मू-कश्मीर का संविधान कहता है कि हर 10 साल बाद सीटों का परिसीमन किया जाए और जनसंख्या के पैटर्न में हुए बदलाव का ध्यान रखा जाए. इस कानून के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में 1995 के बाद साल 2005 में सीटों का परिसीमन होना चाहिए था, लेकिन 2002 में फारुक अब्दुल्ला सरकार ने कानून में बदलाव करते हुए साल 2026 तक इस पर रोक लगा दी थी.

जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव, निर्वाचन आयोग ने कर दिया ऐलान

जम्मू-कश्मीर के विधान सभा चुनाव अमरनाथ यात्रा के बाद इस साल के अंत तक करवाये जा सकते हैं। यह महत्वपूर्ण बयान निर्वाचन आयोग ने जारी किया है। लगभग एक साल पहसे भाजपा-पीडीपी का गठबंधन टूटने के बाद राज्य में राज्यपाल शासन लागू करदिया गया था है। राज्य में करीब एक साल से निर्वाचित सरकार नहीं है। मुख्य विपक्षी दल पीडीपी, कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस ने लोक सभा चुनावों के साथ ही विधानसभा चुनावों की मांग की थी, लेकिन सरकार ने दोनों चुनाव एक साथ कराये जाने की मांग को ठुकरा दिया था।

फिल्हाल, चुनाव आयोग ने संकेत दिया है कि अमरनाथ यात्रा खत्म होने के बाद जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराए जा सकते हैं। चुनाव आयोग ने इस वर्ष के अंत तक जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराने की बात कही है। चुनाव आयोग ने कहा है कि अमरनाथ यात्रा खत्म होने के बाद राज्य में विधानसभा चुनाव की घोषणा कर दी जाएगी।

बीते वर्ष 19 जून 2018 को भाजपा ने जम्मू-कश्मीर में अपनी गठबंधन की सरकार को लेकर बयान दिया था कि ‘जम्मू-कश्मीर में बढ़ते कट्टरपंथ और चरमपंथ के चलते सरकार में बने रहना मुश्किल हो गया है।’ इसके साथ ही भाजपा ने राज्य में पीडीपी से समर्थन वापस ले लिया था। भाजपा ने करीब तीन साल तक जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार चलाई थी। ये पहला मौका था जब भाजपा जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने में कामयाब हुई थी।

जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन के बाद से सुरक्षाबलों ने आतंकियों और अलगाववादियों पर सख्ती शुरू कर दी थी। इसका पीडीपी की महबूबा मुफ्ती सहित सभी विपक्षियों ने विरोध भी किया था। विपक्षीदलों ने तो लोकसभा के चुनावों के साथ ही विधानसभा चुनावों की मांग की थी, लेकिन सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार संघीय सरकार ने चुनाव कराने की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग के ऊपर छोड़ दी थी।

जम्मू कश्मीर में परिसीमन आयोग गठित कर सकती है मोदी सरकार

गृह मंत्रालय जम्मू-कश्मीर के विधानसभा क्षेत्रों के नए सिरे से परिसीमन की तैयारी में है। सूत्रों के हवाले से खबर मिली है कि नए परिसीमन आयोग के गठन पर विचार जारी है। इसके तहत राज्‍य में कुछ सीटें एससी/एसटी के लिए आरक्षित हो सकती हैं। ऐसा होने पर जम्मू-कश्मीर का राजनीतिक नक्शा बदल जाएगा।

सूत्रों के हवाले से आ रही खबर के मुताबिक, गृह मंत्रालय का जिम्मा संभालते ही गृह मंत्री अमित शाह जम्मू-कश्मीर की तस्वीर बदलने की कोशिशों में जुट गए हैं। लिहाजा, जम्मू-कश्मीर को लेकर लगातार बैठकों का दौर जारी है। इन बैठकों में अमित शाह के अलावा आईबी चीफ और गृह सचिव की हिस्सेदारी भी देखने को मिल रही है।

दरअसल, तीन दिन पहले जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। सूत्रों के मुताबिक, राज्यपाल मलिक ने शाह से मुलाकात में जम्मू-कश्मीर पर तीन पन्नों की एक रिपोर्ट भी सौंपी थी। सूत्रों का कहना है कि इस रिपोर्ट में जम्मू-कश्मीर के नए सिरे से परि

शाह के एजेंडे में कश्मीर सबसे ऊपर

इस बैठक के दौरान जम्मू-कश्मीर में नए सिरे से परिसीमन और इसके लिए आयोग गठन पर विचार किया गया. रिपोर्ट के बाद कुछ सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित की जा सकती हैं. सूत्रों के मुताबिक अमित शाह के एजेंडे में सबसे ऊपर जम्मू-कश्मीर है. वह जल्द ही जम्मू-कश्मीर की विधानसभा सीटों के नए परिसीमन के लिए एक परिसीमन आयोग का गठन कर सकते हैं. आयोग की रिपोर्ट के बाद इस पर फैसला किया जाएगा और अगर ऐसा हुआ तो ये बहुत बड़ा फैसला होगा. आखिर एक बार फिर प्रदेश के नए सिरे परिसीमन के पीछे की मंशा क्या है? जो कोई नहीं कर सका वो अमित शाह करेंगे? तो क्या कश्मीर से नहीं जम्मू से बनेगा राज्य का मुख्यमंत्री?

जम्मू-कश्मीर के इलाकों में धार्मिक स्थिति

दरअसल, जम्मू-कश्मीर में जम्मू, कश्मीर घाटी और लद्दाख तीन क्षेत्र आते हैं. अगर 2011 की जनगणना के आंकड़ों के पर गौर करें तो कश्मीर मुस्लिम बाहुल्य इलाका है. यहां 96.40 फीसदी मुस्लिम, 2.45 फीसदी हिंदू, 0.98 फीसदी सिख और 0.17 फीसदी बौद्ध और अन्य धर्म के लोग हैं. वहीं जम्मू में हिंदुओं की संख्या ज्यादा है. जम्मू में हिंदुओं की तादाद 62.55 फीसदी है जबकि 33.45 फीसदी मुस्लिम, 3.30 फीसदी सिख और 0.70 फीसदी बौद्ध और अन्य धर्म के शामिल हैं.

 जम्मू-कश्मीर के बीते 20 साल के शासन को देखें तो कश्मीर घाटी से ही राज्य का मुख्यमंत्री बना. फिर चाहे मुफ्ती मोहम्मद सईद, उमर अब्दुल्ला, फारूख अबदुल्ला या फिर महबूबा मुफ्ती इन सबका ताल्लुक कश्मीर घाटी से है. 2014 में बीजेपी-पीडीपी गठबंधन के तहत मुफ्ती मोहम्मद सईद जम्मू-कश्मीर के सीएम बने लेकिन उनके निधन के बाद उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती ने प्रदेश की कमान सम्भाली. ये दोनों ही नेता अनंतनाग से विधायक रहे. अनंतनाग भी कश्मीर घाटी में आता है.

2014 में पार्टियों को मिली सीटों की संख्या

बता दें कि साल 2014 के विधानसभा चुनावों में यहां बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. उसने 25 सीटों पर जीत हासिल की थी. बीजेपी के अलावा पीडीपी को 28, नेशनल कॉन्फ्रेंस को 12, सीपीआईएम को 1, कांग्रेस को 3, जम्मू-कश्मीर पीपल्स कॉन्फ्रेंस को 2 और जम्मू-कश्मीर डेमोक्रेटिक पार्टी फ्रंट (सेक्युलर) को 1 सीट मिली थी जबकि तीन सीटें निर्दलीयों के खाते में गई थीं.

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